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खूंखार नक्सलियों की जुबानी आंदोलन की कहानी: हम लड़े पर जनता का साथ छूट गया..झीरम घाटी कांड पर अफसोस है

Naxal Surrender News: झीरम घाटी हमले को अंजाम देने वाले दरभा कमेटी के खूंखार माओवादी नेता चेतु उर्फ श्याम और देश के सबसे बड़े बम-मेकर रुपेश ने एनडीटीवी से खास बातचीत में अपने गुनाहों और वैचारिक टूटन की पूरी कहानी बयां की है. जानिए क्यों आज ये बड़े नक्सली नेता कह रहे हैं कि उन्हें कांग्रेस के बुजुर्ग नेताओं की हत्या पर माफी मांगनी चाहिए.

खूंखार नक्सलियों की जुबानी आंदोलन की कहानी: हम लड़े पर जनता का साथ छूट गया..झीरम घाटी कांड पर अफसोस है

Naxals Surrender in Bastar:अब जबकि देश में सशस्त्र नक्सली आंदोलन के पूरी तरह खात्मे का दावा किया जा रहा है और सरकार की तय समयसीमा के तहत सुरक्षा बल बस्तर में नक्सलियों के शीर्ष नेतृत्व के ढांचे को ध्वस्त करने की बात कह रहे हैं, वैसी स्थिति में NDTV ने सरेंडर कर चुके बड़े माओवादी नेताओं से बेहद खास बातचीत की. कभी माओवादी आंदोलन का सबसे खौफनाक "बम-मेकर" माना जाने वाला तक्कल्लापल्ली वासुदेवा राव उर्फ रुपेश, जो संगठन की सेंट्रल कमेटी का सदस्य और विस्फोटक रणनीति का सबसे बड़ा चेहरा था, अब विद्रोह की नहीं बल्कि गहरी आत्मचिंतन की भाषा में बात कर रहा है.दरअसल रुपेश समेत 210 नक्सलियों का सरेंडर सिर्फ एक सैन्य हार नहीं है, बल्कि यह उस हिंसक आंदोलन की अंदरूनी वैचारिक टूटन की पूरी दास्तान बयां करता है जिसने बस्तर को दशकों तक लहूलुहान रखा. दशकों तक कई बड़े हमलों से जुड़े रहने और आंध्र प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री एन. चंद्रबाबू नायडू पर हमले से लेकर गृह मंत्री ए. माधव रेड्डी व युवा आईपीएस अधिकारी उमेश चंद्र की हत्या जैसे मामलों में नामजद रहने वाला यह चेहरा अब संघर्ष के दूसरी तरफ बैठकर अपनी ही असफलताओं का कच्चा चिट्ठा खोल रहा है.

“हम असफल रहे… सिर्फ दबाव से नहीं, अपने फैसलों में”

जब रुपेश से सरेंडर करने की सबसे बड़ी वजह पूछी गई, तो उसने बात की शुरुआत सुरक्षा बलों के चौतरफा बढ़ते दबाव से नहीं की. वह सीधे अपनी रणनीतिक और वैचारिक असफलता की बात कबूल करता है. रुपेश का कहना है, “हमने महसूस किया व्यक्तिगत तौर पर भी और संगठन के रूप में भी कि हम सही समय पर सही फैसले नहीं ले पाए. सिर्फ रणनीति में नहीं, हमारे पूरे अप्रोच में कमी रही. हम बदलती परिस्थितियों के अनुसार खुद को ढाल नहीं पाए.” .वह साफ मानता है कि आंदोलन में गिरावट का दौर काफी पहले शुरू हो चुका था. रुपेश के मुताबिक, “जब हमारे पास ताकत थी, तब भी हमें गिरावट दिख रही थी. हमें कम से कम 10 साल पहले रास्ता बदल लेना चाहिए था. 'लिबरेटेड ज़ोन' बनाने का जो हमारा लक्ष्य था… अब वह संभव नहीं है क्योंकि समाज पूरी तरह बदल चुका है.”

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“आखिर में सिर्फ दो रास्ते बचे... सरेंडर या मौत”

माओवादी संगठन के इस बड़े कमांडर के लिए आखिरी फैसला किसी विचारधारा के आधार पर नहीं, बल्कि सीधे-सीधे अपने वजूद को बचाने का सवाल बन गया था. रुपेश बताता है, “2024–25 के ऑपरेशनों में सुरक्षा बलों का दबाव इतना ज्यादा बढ़ गया कि हमारे पास आगे बढ़ने का कोई विकल्प ही नहीं बचा था. आखिर में हमारे सामने दो ही रास्ते शेष थे- सरेंडर या फिर मौत. हमने जिंदगी को चुनना बेहतर समझा.” वह आगे जोड़ता है, “हमें अपने साथ के दूसरे साथियों की जान के बारे में भी सोचना था. अगर हम आगे भी इसी तरह लड़ते रहते तो सिर्फ और सिर्फ हमारा नुकसान ही होता.”

माओवादी मशीनरी के अंदर की दुनिया ऐसी थी

रुपेश ने बातचीत के दौरान संगठन की अंदरूनी संरचना और काम करने के तरीके पर भी खुलकर रोशनी डाली. उसने बताया कि रणनीति बनाने के लिये संगठन में

“एक अलग सैन्य विंग होता है, जिसमें केंद्रीय स्तर पर CMC और राज्य स्तर पर SMC काम करती है. इसके अलावा जिले और सब-ज़ोन के स्तर पर तत्कालीन हालात के हिसाब से खुद फैसले लिए जाते हैं.”

हथियारों की सप्लाई को लेकर रुपेश कई पुरानी धारणाओं को भी तोड़ता है. वह साफ कहता है, “हम हथियारों के लिए किसी विदेशी सप्लाई पर निर्भर नहीं थे. ज्यादातर आधुनिक हथियार हमने या तो सुरक्षा बलों से मुठभेड़ के दौरान छीने थे या फिर उन्हें खुद वर्कशॉप में बनाया था.” वह संगठन के तकनीकी विंग का जिक्र करते हुए बताता है कि कई साथियों ने खुद पढ़-लिखकर हथियारों की गहरी समझ विकसित की थी. वे देखते थे कि सामने वाले सुरक्षा बल क्या इस्तेमाल कर रहे हैं और फिर वैसा ही बनाने की कोशिश करते थे. हिडमा जैसे बड़े लीडर्स ने भी खुद ही हथियार और विस्फोटक तैयार किए थे.

“जनता का समर्थन खो दिया और सरकार के विकास का असर पड़ा”

रुपेश यह कड़वी सच्चाई भी स्वीकार करता है कि यह पूरा आंदोलन अपने मूल रास्ते से बुरी तरह भटक गया था. वह कहता है, “जिन बुनियादी मुद्दों को लेकर हमने यह लड़ाई उठाई थी, वे मुद्दे आज भी समाज में मौजूद हैं. लेकिन हमने उन मुद्दों को सुलझाने के लिए सही तरीका नहीं अपनाया. यही वजह है कि अब हमारे पास जनता का जरा भी समर्थन नहीं बचा है.” वह यह भी मानता है कि बस्तर के सुदूर इलाकों में सरकारी योजनाओं की पहुंच और चौतरफा विकास का जमीन पर बड़ा असर पड़ा है. रुपेश के मुताबिक, “अब वहां के जमीनी हालात बदले हैं और लोग पहले के मुकाबले ज्यादा जागरूक हुए हैं.”

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हिंसा पर सवाल और झीरम घाटी हमले पर आधा स्वीकार

जब इस खूंखार बम-मेकर से बेगुनाह नागरिकों की मौत और बड़े हिंसक हमलों पर तीखे सवाल पूछे गए, तो उसका जवाब सीधा तो नहीं था लेकिन काफी महत्वपूर्ण था. रुपेश ने माना, “कुछ घटनाएं ऐसी थीं जो बिल्कुल नहीं होनी चाहिए थीं. जैसे झीरम घाटी की घटना… हमने बाद में उसकी बाकायदा समीक्षा की है. वह पूरी तरह गलत थी. इसके अलावा गांव के शिक्षा दूतों को मारना भी गलत था, हम इसके पक्ष में बिल्कुल नहीं थे.रुपेश बातचीत में आगे जोड़ता है, “इस पूरे लंबे संघर्ष के दौरान हमसे कुछ फैसले बहुत गलत हुए, जिनको लेकर हम आज भी बेहद चिंतित हैं.” हालांकि,वह बातचीत में किसी सीधी माफी मांगने से बचता नजर आया, जो यह दिखाता है कि संगठन छोड़ने के बाद भी कुछ वैचारिक दूरियां अभी बनी हुई हैं.

"हम लगातार कमजोर हो रहे थे"

दरभा कमेटी के सीनियर लीडर्स में से एक रहे और खूंखार झीरम घाटी कांड को अंजाम देने वाले चेतु दादा (जिनका संगठन में नाम श्याम है) मूल रूप से तेलंगाना के रहने वाले हैं. सरेंडर के बाद अब वे चार दिन के लिए अपने घर-परिवार से भी मिल पाए हैं. चेतु दादा ने संगठन के लगातार कमजोर होने की बात को खुलकर स्वीकारा. चेतु दादा ने बताया, “हम लगातार कमजोर चल रहे थे. हमने 2011 में भी आंकलन लगाया, 2013 में भी आंकलन लगाया और 2018 में भी आंकलन लगाया. देश भर में आंदोलन में सेटबैक (पीछे हटना) मिल रहा था. ऐसा ही अपनी कमजोरी को देखते हुए और परिस्थितियों को देखते हुए इस किस्म का निर्णय लिया गया.”

"झीरम पर कबूलनामा: बुजुर्ग नेताओं की मौत का अफ़सोस"

जब चेतु दादा से झीरम घाटी कांड को लेकर तीखे सवाल पूछे गए कि आखिर वहां क्या और कैसे हुआ, तो उन्होंने साफगोई से जवाब दिया. उन्होंने कहा,

"इससे पहले भी मैंने साफ किया है कि हमें पता लगा था कि पुलिस वाले प्रोटेक्शन में आ रहे हैं और टीसीओसी (TCOC) के माध्यम से टीसीओसी चल रहा था. हमारा लक्ष्य पुलिस को नुकसान करना और हथियार छीनना था, इसी लक्ष्य के साथ हम लोग गए थे. बाद में बड़े राजनीतिक नेता लोग आने वाले हैं ऐसा समाचार मिला, तो मुझे पता नहीं था क्योंकि मैं काफी दूर खड़ा था."


चेतु दादा ने आगे बताया, "इसलिए बाद में मैंने समीक्षा भी किया था कि कांग्रेस के बुजुर्ग नेताओं को नहीं मारना चाहिए था और वह अंतर विरोध भी है. महेंद्र कर्मा के साथ जो हुआ वह सही था लेकिन बाकी के साथ गलत हुआ. ऐसा मैंने समीक्षा किया था. ऐसे लोगों की मौत पर शोक प्रकट करना चाहिए और हमें भी माफी मांगना चहिए." आखिर-आखिर में शिक्षा दूतों के साथ जो कुछ हुआ, उस पर चेतु दादा कहते हैं, "हमने उसका विरोध भी किया. ऐसा नहीं मारना चाहिए था शिक्षा दूतों को, उसे अलग तरीके से भी हल कर सकते थे.  

 क्यों जुड़े थे लोग इस हिंसक आंदोलन से?

इस बातचीत में रुपेश और चेतु के अलावा अन्य सरेंडर कर चुके नक्सलियों ने भी दिल की बात कही. माड़ डिवीजन की सचिव रनीता, जिन्होंने रुपेश के साथ ही हथियार डाले हैं, बताती हैं, “मैं महज 15 साल की उम्र में इस संगठन से जुड़ी थी. उस वक्त मेरी मर्जी के खिलाफ जबरन शादी कराई जा रही थी और मैं जीवन में कुछ और करना चाहती थी.” वह यह भी कहती हैं कि संगठन के अंदर उन्हें महिला होने के कारण किसी भेदभाव का सामना नहीं करना पड़ा. उनके मुताबिक ज्यादातर महिलाएं समाज में असमानता और पारिवारिक दबाव की वजह से ही बंदूक उठाने को मजबूर हुईं. वहीं गड़चिरोली के रीजनल कमेटी मेंबर बाजीराव इसके पीछे सामाजिक कारणों को बड़ी वजह बताते हैं. वे कहते हैं, “इलाके में छुआछूत और जबरन वसूली जैसी कुप्रथाएं हावी थीं, जिससे लोगों में भारी गुस्सा पैदा हुआ और वे संगठन की तरफ खिंचे चले आए.” कोंडागांव के सरोज बघेल इलाके की लचर शिक्षा व्यवस्था पर सवाल उठाते हुए कहते हैं, “हमारे गांवों में शिक्षक महीने में एक-दो बार ही आते थे और ठीक से पढ़ाई नहीं होती थी. इसी खालीपन और भटकाव की वजह से लोग इस हिंसक रास्ते पर चले गए.”

गणपति और मिसिर बेसरा जैसे बड़े नेताओं से रुपेश की सरेंडर की अपील

भविष्य को लेकर रुपेश सावधानी के साथ बदलाव की बात करता है. वह कहता है, “हम अब देश के संविधान के दायरे में ही रहकर काम करेंगे. लेकिन मुख्यधारा की राजनीति में आकर तुरंत चुनाव लड़ना अभी हमारे लिए संभव नहीं है.” रुपेश ने जंगल में मौजूद गणपति और मिसिर बेसरा जैसे कुख्यात और बड़े माओवादी नेताओं के सरेंडर पर कहा, “मैं पिछले 6 महीने से लगातार अपील कर रहा हूं तो मैंने सभी को अपील किया था. अभी भी कभी भी हम पीछे नहीं हटते अपील करने से और हम पर किसी का दबाव नहीं है. पर आज की परिस्थिति को देखते हुए इस किस्म का निर्णय लेना पड़ा और बाकी लोग भी उसी रास्ते में आ गए जो बचे लोग हैं. गणपति दादा हों या मिसिर बेसरा हों, सभी लोग सोचकर सही निर्णय लें तो अच्छा है. बाकी फिर मिलकर आगे क्या करेंगे यह जरूरी है. काम करना जरूरी है क्योंकि जनता के बीच में जनता की समस्याएं आज भी हैं, इसीलिए तो यह आंदोलन यहां तक आया.”
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