छत्तीसगढ़ के बस्तर संभाग के कोंगे गांव की सीमा पर एक सूचना बोर्ड लगा दिया गया है. इस बोर्ड में मोटे-मोटे अक्षरों में लिखा है कि गांव में पादरी-पास्टर का प्रवेश प्रतिबंधित है. बस्तर में पास्टर या पादरियों के प्रवेश पर प्रतिबंध का यह पहला मामला नहीं है. इससे पहले भी कांकेर नारायणपुर कोंडागांव के दर्जनभर से अधिक गांव में इस तरह के बोर्ड लगाया जा चुके हैं. कांकेर जिले के कुड़ाल, जुनवानी, परवी, जनकपुर, टेकथोधा, और जामगांव प्रमुख रूप से शामिल हैं. ऐसे में बड़ा सवाल है कि बस्तर के इन गांव में इस तरह के बोर्ड लगाए क्यों जा रहे हैं.
कांकेर के सर्व आदिवासी समाज के अध्यक्ष कन्हैया उसेंडी का कहना है कि ये 5वीं अनुसूचित क्षेत्र है और यहां पर ग्राम सभा को अपने स्वबंधन के लिए, गांव के प्रबंधन के लिए निर्णय लेने का अधिकार है. बिना ग्राम सभा के कोई भी बोर्ड नहीं टांगा जा सकता. ग्राम सभा में निर्णय के बाद ही इस तरह के बोर्ड लगाए जा रहे हैं.
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गांव की व्यवस्था को बनाने के लिए बोर्ड
कन्हैया उसेंडी का कहना है कि ये जो बोर्ड लगाए जा रहे हैं, वो अपनी संस्कृति, अपने गांव की व्यवस्था को बनाने के लिए ही लगाया गया है. हमारे यहां परंपरा है कि बरसों से कई समाज के लोग एक साथ गांव में रहते हैं और कहीं भी आना जाना होता है तो देवी देवता, गायता, ग्राम सभा से अनुमति लेनी पड़ती है. हो सकता है कुछ हुआ होगा. इसलिए इस तरह का बोर्ड टांगा गया है.
आदिवासियों का धर्मांतरण करने का आरोप
दरअसल, बस्तर संभाग में आदिवासियों का धर्मांतरण करने का आरोप लंबे समय से लगता रहा है. बड़ी संख्या में बस्तर के मूल आदिवासी अपने धर्म से मततंरित हो चूके हैं. अपने मूल धर्म की जगह इसी धर्म में आस्था रखने वाले कई ऐसे आदिवासी और मूल आदिवासियों के बीच संघर्ष की स्थिति बनी है. कांकेर कोंडागांव नारायणपुर बस्तर दंतेवाड़ा में कई ऐसे मामले हुए जिसमें मृत्यु के बाद कफन दफन को लेकर धर्म बदल चुके लोगों और मूल आदिवासियों के बीच संघर्ष उत्पन्न हुआ.
कुछ मामलों में सुप्रीम कोर्ट तक का दरवाजा खटखटाया गया. मूल आदिवासी समुदाय का पक्ष है कि वो अपनी संस्कृति परंपरा और धार्मिक मान्यताओं से समझौता नहीं कर सकते. उनका आरोप है कि ईसाई समुदाय के लोग धर्म गांव में आकर आदिवासियों का माइंड वॉश करते हैं और उनका धर्म परिवर्तित करवाते है. ऐसे में ग्राम सभा में निर्णय लिया जा रहा है की पास्टर और पादरियों को कामों में प्रवेश न दिया जाए.
लोग परंपरा और संस्कृति को नहीं मान रहे
जनजाति गौरव समाज के धमतरी जिले अध्यक्ष खूबलाल ध्रुव गांव में पादरी और पास्टरों को प्रतिबंध के बोर्ड की मांग को थोड़ा और आगे ले जाते हुए कहते हैं कि सिर्फ इसे ही काम नहीं बनेगा अब तो दी लिस्टिंग को भी जल्द ही लागू कर दिया जाना चाहिए. खूबचंद कहते हैं की जो लोग अब आदिवासी परंपरा और संस्कृति को नहीं मान रहे हैं, उन लोगों को आदिवासियों को मिलने वाला हक क्यों मिलना चाहिए? उन्हें तो खुद ही इसका त्याग कर देना चाहिए. लेकिन वह ऐसा नहीं कर रहे हैं इसलिए सरकार को अब दी लिस्टिंग कानून लागू कर देना चाहिए और समाज इसका समर्थन कर रहा है.
अवैध धर्मांतरण को रोकने का समर्थन
छत्तीसगढ़ धर्मांतरित हो चुके आदिवासी और मूल आदिवासियों के बीच संघर्ष बस्तर संभाग तक सीमित हो ऐसा नहीं है. सरगुजा संभाग के जयपुर में आदिवासियों का एक बड़ा समूह डी लिस्टिंग का समर्थन कर रहा है और अवैध धर्मांतरण को रोकने के लिए सरकार द्वारा बनाए गए नए कानून का समर्थन करता है तो वहीं दूसरी ओर डी लिस्टिंग और ईसाई समुदाय को लेकर पनप रही परिस्थितियों के विरोध में 24 मई को जशपुर में एक बड़ा धरना प्रदर्शन किया.
इस प्रदर्शन के बाद कांग्रेस के पूर्व विधायक और ईसाई समुदाय से आने वाले नेता यूडी मिंज का कहना था कि कुछ लोग आदिवासी वर्ग के लोगों को एक दूसरे से लड़ने के लिए ऐसा कर रहे हैं. आदिवासी संस्कृति और परंपरा में जाति में जाति की कैटेगरी में हम आदिवासी लिखते हैं, उसमें किसी को कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए.
डी लिस्टिंग की मांग
बस्तर के गावों में पास्टर के प्रवेश पर प्रतिबंध क्या नई लड़ाई की शुरुआत है? इस पर छत्तीसगढ़ क्रिश्चियन फोरम के वरिष्ठ पदाधिकारी अरुण पन्नालाल का कहना है कि बस्तर में पिछले कुछ समय से स्थितियां नियंत्रण में हैं. कुछ समय पहले तक संघर्ष की स्थिति जरूर थी लेकिन अब नियंत्रण है. फिर भी कुछ लोगों द्वारा अपने निजी हित को साधने के लिए धार्मिक सौहार्द को बिगाड़ने की कोशिश की जाती रहती है.
इस मामले में बीजेपी-कांग्रेस का पक्ष
बस्तर में इस तरह की स्थिति को लेकर छत्तीसगढ़ कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष दीपक बैज का कहना है कि ग्राम सभाओं के अपने अधिकार हैं और उसके तहत वहां निर्णय लिए जा रहे हैं. छत्तीसगढ़ में सत्ताधारी दल भाजपा के प्रवक्ता अनुराग अग्रवाल का कहना है कि बस्तर में बड़े पैमाने पर भोले भाले आदिवासियों को बहला फुसलाकर उनका धर्म परिवर्तन कराया गया है. उसके खिलाफ अपनी संस्कृति और परंपरा को बचाने के लिए अब समाज के लोग एकजुट हो रहे हैं. इसलिए इस तरह के निर्णय लिए जा रहे हैं.
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