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This Article is From Feb 24, 2026

MP में थाना-स्कूल-जंगल की जमीन भी वक्फ के नाम ! CAG ने पकड़ी 77 करोड़ की सरकारी जमीनों में हेराफेरी

CAG की रिपोर्ट ने मध्य प्रदेश में थाना, स्कूल और जंगल की 77 करोड़ की सरकारी जमीन को वक्फ के नाम दर्ज करने के बड़े खेल का पर्दाफाश किया है. ऑडिट में 20 जिलों की 41% संपत्तियां अवैध पाई गई हैं, जिसमें बैंक में गिरवी जमीनें भी वक्फ रिकॉर्ड में चढ़ा दी गईं. कलेक्टरों की आपत्तियों को दरकिनार कर की गई इस हेराफेरी ने राज्य के प्रशासनिक तंत्र पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं.

MP में थाना-स्कूल-जंगल की जमीन भी वक्फ के नाम ! CAG ने पकड़ी 77 करोड़ की सरकारी जमीनों में हेराफेरी

MP Waqf Property Controversy: मध्य प्रदेश में वक्फ संपत्तियों के पंजीकरण को लेकर एक बड़ा संवैधानिक और प्रशासनिक संकट खड़ा हो गया है. विधानसभा में पेश CAG (नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक) की ताजा ऑडिट रिपोर्ट (2018-23) ने खुलासा किया है कि राज्य के 20 जिलों में 77.07 करोड़ रुपये की सरकारी जमीन को नियमों को ताक पर रखकर वक्फ संपत्ति के रूप में दर्ज कर लिया गया है. जांच में शामिल 81 संपत्तियों में से 41% वास्तव में सरकारी जमीन निकलीं,जिनमें स्कूल,पुलिस थाना,वन भूमि और यहां तक कि बैंक में गिरवी रखी जमीनें भी शामिल हैं. रिपोर्ट ने जिला कलेक्टरों की 'शिथिलता' और वक्फ बोर्ड की मनमानी पर गंभीर सवाल उठाए हैं, जहां ग्रामीणों और स्थानीय प्रशासन की आपत्तियों को दरकिनार कर सामुदायिक जमीनों का 'अनियमित रूपांतरण' कर दिया गया.

वक्फ पंजीयन में बड़ी लापरवाही

CAG ने 81 वक्फ संपत्तियों की जांच की और पाया कि इनमें से 33 संपत्तियां, यानी 41 प्रतिशत, वास्तव में सरकारी जमीन थीं. इनका कुल क्षेत्रफल 2,09,639.48 वर्ग मीटर है. राजस्व अभिलेखों में ये जमीनें राज्य सरकार के स्वामित्व में दर्ज थीं और सामुदायिक उपयोग के लिए आरक्षित थीं. इसके बावजूद इन्हें औकाफ रजिस्टर में दर्ज कर लिया गया. रिपोर्ट में कहा गया है कि पंजीकरण से पहले जिला कलेक्टरों को सूचित किया गया था, लेकिन अधिकांश मामलों में प्रक्रिया रोकने के लिए कोई प्रभावी कदम नहीं उठाया गया. CAG ने इसे शिथिल रवैया बताया है, जिसने वक्फ अधिनियम के दुरुपयोग और सरकारी जमीन के अनियमित रूपांतरण को बढ़ावा दिया.

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स्कूल और थाने पर 'कब्जा'

सबसे चौंकाने वाला मामला भोपाल के मिसरोद क्षेत्र का है, जहां 3,600 वर्ग मीटर जमीन को नवंबर 2022 में इस आधार पर वक्फ के रूप में दर्ज कर दिया गया कि वह पहले कब्रिस्तान के रूप में उपयोग होती थी. जबकि उसी जमीन पर शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय और मिसरोद थाना स्थित है. स्थानीय निवासियों, तहसीलदार और थाना प्रभारी ने आपत्ति दर्ज कराई थी. बोर्ड की अपनी जांच में भी कथित रूप से यह सामने आया कि जमीन कब्रिस्तान के रूप में उपयोग में नहीं थी. इसके बावजूद पंजीकरण कर दिया गया. CAG ने टिप्पणी की कि अंतिम प्रविष्टि से पहले भूमि राजस्व कार्यालय से कोई आगे का पत्राचार नहीं किया गया.

वन भूमि का अवैध पंजीकरण

विदिशा जिले में हलाली डैम क्षेत्र की 410 वर्ग मीटर वन भूमि को वक्फ के रूप में दर्ज किया गया, जबकि वह वन अधिकार अधिनियम के तहत पट्टे पर दी गई थी और स्वामित्व स्पष्ट रूप से गैर हस्तांतरणीय था. पट्टे की शर्तों के अनुसार केवल उपयोग का अधिकार दिया गया था, स्वामित्व का नहीं. इसके बावजूद पट्टे की वन भूमि पर बने धार्मिक ढांचे को जनवरी 2023 में औकाफ रजिस्टर में दर्ज कर लिया गया. CAG ने इस पंजीकरण को अवैध बताया और कहा कि संबंधित प्रावधानों के तहत वन अधिकारियों को कोई नोटिस जारी नहीं किया गया.

बैंक में गिरवी जमीन का खेल

रायसेन जिले में मध्य प्रदेश ग्रामीण बैंक के पास गिरवी रखी जमीन को दिसंबर 2022 में वक्फ के रूप में दर्ज कर दिया गया. आवेदन के साथ संलग्न खसरा रिकॉर्ड में स्पष्ट रूप से उल्लेख था कि जमीन गिरवी है. इसके बावजूद बोर्ड ने कोई जांच किए बिना पंजीकरण कर दिया. बैंक ने अक्टूबर 2024 में, यानी लगभग दो साल बाद, अनापत्ति प्रमाण पत्र जारी किया. ऑडिट रिपोर्ट कहती है कि पंजीकरण के समय जमीन बंधक थी और यह कार्रवाई SARFAESI अधिनियम के प्रावधानों के विपरीत थी.

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निजी और उत्तराधिकार भूमि पर विवाद

ऑडिट में ऐसे मामले भी सामने आए जहां अन्य धार्मिक समुदायों के निजी स्वामित्व वाली जमीन को वक्फ के रूप में दर्ज किया गया. मंदसौर में निजी स्वामित्व की जमीन को केवल इस आधार पर वक्फ के तहत दर्ज किया गया कि वहां धार्मिक संरचना मौजूद थी. बाद में राजस्व अधिकारियों ने पुष्टि की कि स्वामित्व निजी व्यक्तियों के पास ही था. शिवपुरी में जीवित वैध उत्तराधिकारियों वाली जमीन को वक्फ के रूप में दर्ज कर दिया गया, जबकि स्वामित्व से जुड़े मामलों का निपटारा हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम के तहत होना चाहिए. CAG ने स्पष्ट किया कि प्रशासनिक कार्रवाई के जरिए स्वामित्व में मनमाना बदलाव नहीं किया जा सकता.

कलेक्टर की आपत्तियों की अनदेखी

धार जिले में कुछ संपत्तियां स्पष्ट स्वामित्व के बिना ही वक्फ के रूप में दर्ज कर दी गईं. एक मामले में आवेदक ने पावर ऑफ अटॉर्नी के आधार पर स्वामित्व का दावा किया, लेकिन कोई पंजीकृत दस्तावेज नहीं था. वरिष्ठ पंजीयक कार्यालय ने पुष्टि की कि कानूनी रूप से स्वामित्व का हस्तांतरण नहीं हुआ था. इसके बावजूद पंजीकरण कर दिया गया. दूसरे मामले में जिला कलेक्टर ने लिखित आपत्ति दर्ज कर आवासीय भवनों को वक्फ संपत्ति में बदलने के लिए अनापत्ति प्रमाण पत्र देने से इनकार किया, क्योंकि धार्मिक उपयोग के लिए पूर्व लिखित अनुमति आवश्यक थी. बोर्ड ने आपत्तियों को विलंब के आधार पर खारिज करते हुए पंजीकरण कर दिया.

तकनीकी समय सीमा का बहाना

सीहोर जिले में 4,006 वर्ग मीटर से अधिक सरकारी जमीन को वक्फ के रूप में दर्ज कर दिया गया, जबकि ग्रामीणों ने आपत्ति जताई थी कि वह सरकारी भूमि है और कभी कब्रिस्तान के रूप में उपयोग में नहीं रही. आपत्ति को इस आधार पर खारिज कर दिया गया कि वह 30 दिन की सार्वजनिक सूचना अवधि से चार दिन बाद दायर की गई थी. CAG ने कहा कि अधिनियम या नियमों में 30 दिन की ऐसी कठोर समय सीमा का प्रावधान नहीं है और इस आधार पर आपत्ति खारिज करना मनमाना है.

सरकार की दलील और CAG की फटकार

सरकार ने अपने जवाब में कहा कि वक्फ अधिनियम एक विशेष अधिनियम है और जिला प्रशासन से अनापत्ति प्रमाण पत्र लेना अनिवार्य नहीं है. यह भी कहा गया कि भूमि अभिलेखों के कंप्यूटरीकरण के दौरान कुछ तकनीकी त्रुटियां हो सकती हैं और सभी मामलों में सार्वजनिक नोटिस जारी किए गए थे. CAG ने इन स्पष्टीकरणों को अस्वीकार्य बताया और कहा कि कई संपत्तियां हाल के वर्षों में दर्ज की गईं तथा कम से कम दो मामलों में कलेक्टरों की स्पष्ट आपत्तियों की अनदेखी की गई. रिपोर्ट में यह भी दोहराया गया कि संबंधित जमीनें सामुदायिक उपयोग के लिए आरक्षित और राजस्व रिकॉर्ड में सरकारी संपत्ति के रूप में दर्ज थीं.

मंत्री के निर्देश और PWD में गड़बड़ी

राजस्व मंत्री करण सिंह वर्मा ने कहा है कि उन्होंने सभी कलेक्टरों को मामले की जांच के निर्देश दिए हैं और जांच के निष्कर्षों के आधार पर कार्रवाई की जाएगी. CAG ने वक्फ अधिकारियों, राजस्व अधिकारियों, वन अधिकारियों और जिला प्रशासन की जिम्मेदारी तय करने की सिफारिश की है. यह खुलासे 14 विभागों की व्यापक अनुपालन ऑडिट रिपोर्ट का हिस्सा हैं. रिपोर्ट में कुछ और चौंकाने वाले खुलासे हैं मसलन लोक निर्माण विभाग ने रायसेन जिले में लगभग साढ़े चार किलोमीटर लंबी सड़क उस क्षेत्र में बना दी जो बाद में डूब क्षेत्र में शामिल होना था. वहीं विदिशा और नर्मदापुरम जिलों में स्वीकृत सीमा से अधिक लंबाई की सड़कें बनाकर करीब 15 करोड़ रुपये की अतिरिक्त वित्तीय अनियमितता सामने आई है, जिससे सरकारी खजाने को भारी नुकसान हुआ.

जवाबदेही पर गंभीर सवाल

सरकारी जमीन, वन भूमि, गिरवी संपत्ति और विवादित निजी जमीन तक के औकाफ रजिस्टर में दर्ज होने के इन मामलों ने राज्य में प्रशासनिक जवाबदेही और निगरानी तंत्र पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं. अब देखना यह है कि इन खुलासों के बाद वास्तविक सुधार और कार्रवाई होती है या यह रिपोर्ट भी सरकारी फाइलों में दब कर रह जाती है.
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