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भारी न पड़ जाए राहुल गांधी का नटराजन चुनाव, एमपी कांग्रेस में बेचैनी-कहीं बीजेपी न चल दे तीसरा दांव

मध्य प्रदेश में कांग्रेस द्वारा मीनाक्षी नटराजन को उम्मीदवार बनाए जाने के बाद राज्यसभा चुनाव बेहद हाई-प्रोफाइल हो गया है. राहुल गांधी के इस फैसले से जहां कांग्रेस के अंदरूनी गुटों में बेचैनी बढ़ गई है, वहीं बीजेपी द्वारा 'तीसरा उम्मीदवार' उतारने की सुगबुगाहट ने कांग्रेस खेमे में क्रॉस वोटिंग और सेंधमारी का डर पैदा कर दिया है. महज सात वोटों के सुरक्षा कवच पर टिकी कांग्रेस अब अपने विधायकों को एकजुट रखने की जद्दोजहद में जुट गई है.

भारी न पड़ जाए राहुल गांधी का नटराजन चुनाव, एमपी कांग्रेस में बेचैनी-कहीं बीजेपी न चल दे तीसरा दांव

MP Rajya Sabha Election 2026: मध्य प्रदेश की तीन राज्यसभा सीटों का चुनाव अब महज एक औपचारिक राजनीतिक प्रक्रिया नहीं रह गया है. कांग्रेस ने मीनाक्षी नटराजन को उम्मीदवार बनाया है जिसके बाद ये चुनाव अचानक राजनीतिक गणित, वफादारी की परीक्षा और संभावित क्रॉस वोटिंग की आशंकाओं के बीच एक हाई-प्रोफाइल मुकाबले में बदलता दिख रहा है.इस बीच, बीजेपी द्वारा अपने अतिरिक्त वोटों के दम पर 'तीसरा उम्मीदवार' उतारने की सुगबुगाहट और वरिष्ठ मंत्री कैलाश विजयवर्गीय के दावों ने कांग्रेस के खेमे में भारी बेचैनी पैदा कर दी है. आंकड़ों के खेल में महज सात वोटों के सुरक्षा कवच पर टिकी कांग्रेस अब अपने विधायकों में सेंधमारी और क्रॉस वोटिंग की आशंकाओं से घिर गई है, जिसके चलते भोपाल से लेकर दिल्ली तक खामोश राजनीतिक गणनाओं का दौर शुरू हो गया है.

राहुल गांधी के भरोसे का मिला इनाम 

दिल्ली में कई दिनों तक चली माथापच्ची और लॉबिंग के बाद कांग्रेस हाईकमान ने आखिरकार पूर्व सांसद मीनाक्षी नटराजन पर दांव लगाया. यह फैसला केवल एक राज्यसभा सीट भरने का निर्णय नहीं माना जा रहा, बल्कि राहुल गांधी की उस राजनीति का संदेश भी माना जा रहा है जिसमें संगठन के प्रति निष्ठा और वैचारिक प्रतिबद्धता को पुरस्कृत किया जाता है.

मध्य प्रदेश के उज्जैन से निकलकर एनएसयूआई और यूथ कांग्रेस के रास्ते राष्ट्रीय राजनीति तक पहुंचीं मीनाक्षी नटराजन उन चुनिंदा नेताओं में हैं जिन्होंने किसी राजनीतिक परिवार की विरासत नहीं, बल्कि संगठन की सीढ़ियां चढ़कर अपनी पहचान बनाई. वे एनएसयूआई की राष्ट्रीय अध्यक्ष रहीं, मध्य प्रदेश यूथ कांग्रेस का नेतृत्व किया और बाद में राहुल गांधी की युवा टीम का अहम चेहरा बनीं.

2009 में मंदसौर से लोकसभा सांसद चुनी गईं मीनाक्षी लंबे समय से राहुल गांधी की सबसे भरोसेमंद सहयोगियों में गिनी जाती हैं. कांग्रेस के भीतर उन्हें एक वैचारिक और संगठनात्मक नेता के रूप में देखा जाता है, लेकिन पिछले एक दशक में मध्य प्रदेश की गुटीय राजनीति में उनकी भूमिका अपेक्षाकृत सीमित रही है.

फैसले पर अपनों के सवाल 

यही वजह है कि उनकी उम्मीदवारी के ऐलान के साथ कांग्रेस के भीतर से भी सवाल उठने लगे. दो बार हुजूर से चुनाव लड़ चुके वरिष्ठ कांग्रेस नेता नरेश ज्ञानचंदानी ने सार्वजनिक रूप से फैसले पर सवाल उठाते हुए राहुल गांधी और प्रियंका गांधी को सोशल मीडिया पर टैग कर लिखा कि उम्मीदवार चयन में बड़ी भूल हुई है. उनका तर्क था कि यदि दिग्विजय सिंह को दोबारा राज्यसभा भेजा जाता तो सीट कहीं अधिक सुरक्षित रहती, क्योंकि दिग्विजय सिंह की विधायकों पर व्यक्तिगत पकड़ और राजनीतिक प्रभाव निर्विवाद है. जबकि मीनाक्षी नटराजन के नाम पर वैसी सर्वसम्मति नहीं दिखी.

कांग्रेस के पास सिर्फ सात वोट का सुरक्षा कवच

कांग्रेस की असली चिंता राजनीतिक नहीं, बल्कि गणित की है. 230 सदस्यीय विधानसभा में राज्यसभा जीतने के लिए 58 वोटों की जरूरत है. भाजपा के पास लगभग 165 विधायक हैं. वह अपने दोनों उम्मीदवारों तरुण चुघ और रजनीश अग्रवाल को आसानी से जिताने के बाद भी करीब 47 से 49 वोट बचा सकती है. दूसरी ओर कांग्रेस के पास आधिकारिक रूप से 65 विधायक हैं, लेकिन बीना विधायक निर्मला सप्रे की सदस्यता पर चल रही कार्यवाही और कुछ अन्य परिस्थितियों के कारण उसकी वास्तविक बढ़त काफी सीमित मानी जा रही है. पार्टी के पास जीत के आंकड़े से महज सात वोट का सुरक्षा कवच बचता है.इसी वजह से बीजेपी में तीसरे उम्मीदवार की चर्चा शुरु हो गई है भले ही ये आधिकारिक न हो. 

कैलाश विजयवर्गीय की हुंकार: क्या बीजेपी चलेगी तीसरा दांव?

भाजपा के वरिष्ठ नेता और मंत्री कैलाश विजयवर्गीय ने राजनीतिक गलियारों में हलचल पैदा करते हुए कहा, "अगर पार्टी निर्देश दे दे तो हम तीसरे उम्मीदवार को भी जिता देंगे." पहली नजर में यह एक सामान्य राजनीतिक बयान लग सकता है, लेकिन इसके बाद भोपाल से लेकर दिल्ली तक चर्चाओं का दौर तेज हो गया.

अगर भाजपा तीसरा उम्मीदवार उतारती है तो उसके पास शुरुआती तौर पर लगभग 47-49 वोट होंगे और उसे मुकाबला रोचक बनाने के लिए महज 10-11 अतिरिक्त वोटों की जरूरत पड़ेगी. ये वोट क्रॉस वोटिंग, अनुपस्थिति, मतदान से दूरी या अमान्य वोटों के रूप में भी सामने आ सकते हैं.

कांग्रेस में खलबली: विधायकों को बाहर भेजने की तैयारी!

शायद यही कारण है कि कांग्रेस सार्वजनिक तौर पर खतरे को नकार रही है, लेकिन अंदरखाने पूरी सतर्कता बरत रही है. पार्टी ने अपने सभी विधायकों को भोपाल तलब कर लिया है. शुक्रवार शाम पांच बजे कांग्रेस विधायक दल की बैठक बुलाई गई है, जिसमें मीनाक्षी नटराजन, प्रदेश प्रभारी हरीश चौधरी, प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी और नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार मौजूद रहेंगे. सूत्रों के मुताबिक बैठक के बाद विधायकों को कर्नाटक या हिमाचल प्रदेश जैसे कांग्रेस शासित राज्यों में भेजने के विकल्प पर भी विचार किया जा सकता है.

'पार्टी विद ए डिफरेंस' बनाम 'गुटबाजी की बीमारी'

भाजपा इस पूरे घटनाक्रम को कांग्रेस की अंदरूनी कमजोरी के रूप में पेश कर रही है. केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कांग्रेस पर निशाना साधते हुए कहा, "कांग्रेस में वही पुराने चेहरे और परिवार बार-बार आगे किए जाते हैं. यही फर्क है, भारतीय जनता पार्टी वास्तव में 'पार्टी विद ए डिफरेंस' है." वहीं वित्त मंत्री जगदीश देवड़ा ने कहा, "कांग्रेस में कब गुटबाजी नहीं रही? वहां तो यह स्थायी बीमारी है."

कांग्रेस का पलटवार: 'हॉर्स ट्रेडिंग' बीजेपी की आदत

कांग्रेस ने भी पलटवार करने में देर नहीं की. मीडिया विभाग के अध्यक्ष मुकेश नायक ने कहा, "हॉर्स ट्रेडिंग भाजपा की आदत बन चुकी है. मीनाक्षी नटराजन अपनी योग्यता के आधार पर राज्यसभा जा रही हैं. कांग्रेस पूरी तरह एकजुट है." उन्होंने यहां तक कह दिया कि कैलाश विजयवर्गीय को पहले अपनी चिंता करनी चाहिए क्योंकि उन्हें ही सरकार में किनारे लगाया जा रहा है.

बंद कमरों की खामोश गणना और कुछ चेहरों पर सस्पेंस

इसके बावजूद राजनीतिक पर्यवेक्षक मानते हैं कि कांग्रेस की बेचैनी पूरी तरह निराधार नहीं है. हाल के महीनों में कांग्रेस विधायक अभिजीत शाह की आरएसएस से जुड़े कार्यक्रमों में मौजूदगी और विधायक भैरों सिंह परिहार के पुराने बयानों ने राजनीतिक अटकलों को हवा दी है. किसी विधायक ने बगावत के संकेत नहीं दिए हैं, लेकिन राज्यसभा चुनाव अक्सर सार्वजनिक बयानों से नहीं, बल्कि बंद कमरों में होने वाली खामोश राजनीतिक गणनाओं से तय होते हैं.

गणित या कैमिस्ट्री: 18 जून को होगा असली फैसला

फिलहाल आंकड़े अब भी भाजपा के दो और कांग्रेस के एक उम्मीदवार की जीत का संकेत देते हैं. लेकिन मध्य प्रदेश की राजनीति में कई बार गणित से ज्यादा मायने कैमिस्ट्री के रहे हैं. अगर भाजपा सिर्फ दो उम्मीदवारों पर रुकती है तो 18 जून की प्रक्रिया औपचारिकता बनकर रह जाएगी. लेकिन अगर तीसरे उम्मीदवार का दांव चला, तो यह चुनाव मीनाक्षी नटराजन की जीत से ज्यादा कांग्रेस विधायकों की निष्ठा की परीक्षा बन जाएगा और तब राज्यसभा की यह लड़ाई सिर्फ एक सीट की नहीं, बल्कि राहुल गांधी के भरोसे, कांग्रेस की एकजुटता और भाजपा की राजनीतिक रणनीति की असली अग्निपरीक्षा होगी.
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