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अंतरिक्ष में 'स्काईरूट' की कामयाबी को मिली इंटरनेशनल तारीफें, अब इस भारतवंशी महिला इंजीनियर की बातें सुननी चाहिए

दुनिया भर में नासा की 'वॉइस ऑफ मार्स' के नाम से मशहूर अमेरिकी एयरोस्पेस इंजीनियर डॉ. स्वाति मोहन ने स्काईरूट एयरोस्पेस की जमकर तारीफ की है. उन्होंने एक स्टार्टअप के लिए बेहद मुश्किल माने जाने वाले कारनामे को अंजाम देने पर यह सराहना की है.

अंतरिक्ष में 'स्काईरूट' की कामयाबी को मिली इंटरनेशनल तारीफें, अब इस भारतवंशी महिला इंजीनियर की बातें सुननी चाहिए
डॉ. स्वाति मोहन ने इस उपलब्धि को भारत के बढ़ते प्राइवेट स्पेस इकोसिस्टम के लिए एक बड़ा कदम बताया.
Pallava Bagla/NDTV

जब 'स्काईरूट एयरोस्पेस' का विक्रम-1 रॉकेट अपने पहले ही मिशन में कामयाबी के साथ ऑर्बिट तक पहुंचा, तो इसने भारत के प्राइवेट स्पेस सेक्टर के लिए एक ऐतिहासिक मुकाम तय कर दिया. अपनी पहली ही कोशिश में ऑर्बिट तक पहुंचना रॉकेट विज्ञान की दुनिया में सबसे कठिन चुनौतियों में से एक माना जाता है. यहां तक कि दुनिया की सबसे चर्चित स्पेस कंपनियों, जैसे एलन मस्क की 'स्पेसएक्स' को भी इस मकसद को हासिल करने में कई कोशिशें और नाकामियां झेलनी पड़ी थीं.

अब, इस शानदार उपलब्धि को वैश्विक अंतरिक्ष अनुसंधान की एक बेहद प्रभावशाली शख्सियत की स्वीकृति मिली है. दुनिया भर में नासा की 'वॉइस ऑफ मार्स' के नाम से पहचानी जाने वाली अमेरिकी एयरोस्पेस इंजीनियर डॉ. स्वाति मोहन ने स्काईरूट एयरोस्पेस की इस कामयाबी को सराहा है. इसे कई लोग एक स्टार्टअप के लिए बेहद मुश्किल मान रहे थे.

'भविष्य के लिए बेहद शुभ संकेत'

एनडीटीवी (NDTV) से खास बातचीत में डॉ. स्वाति मोहन ने इस उपलब्धि को भारत के बढ़ते प्राइवेट स्पेस इकोसिस्टम के लिए एक बड़ा कदम और इस युवा कंपनी के उज्ज्वल भविष्य का एक मजबूत इशारा करार दिया.

डॉ. मोहन ने कहा, "ऑर्बिट हासिल करना कोई आसान काम नहीं है. अपनी पहली ही कोशिश में स्काईरूट की यह सफलता भारत के लिए एक स्वदेशी लॉन्च क्षमता प्रदान करने के उसके भविष्य के लिए बेहद शुभ संकेत है."

नासा की सबसे बड़ी आधुनिक कामयाबियों में से एक में केंद्रीय भूमिका निभाने वाली इंजीनियर की ओर से आई यह तारीफ अपने आप में बहुत वजन रखती है. 

डॉ. मोहन फरवरी 2021 में मंगल ग्रह पर नासा के 'पर्सवेरेंस रोवर'की नाटकीय '8 मिनट्स ऑफ टेरर' लैंडिंग का आंखों देखा हाल सुनाकर दुनिया भर के हर घर में मशहूर हो गई थीं.

उनकी शांत और आत्मविश्वास से भरी आवाज ने उन शब्दों को बयां किया था, जिसे करोड़ों लोग शाब्दिक रूप से पर्सवेरेंस की अपनी आवाज के रूप में याद रखते हैं, जब उसने लाल ग्रह पर सफलतापूर्वक कदम रखा था. 

इस मिशन में 'इंजेन्यूटी' नाम का एक छोटा हेलीकॉप्टर भी गया था. इसने बाद में दूसरे ग्रह पर इंसान की पहली संचालित उड़ान को अंजाम दिया था. इत्तेफाक से, इसे बनाने वाले भी नासा के एक भारतीय इंजीनियर डॉ. बॉब बलराम थे.

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स्वदेशी ताकत का लोहा और युवाओं की 8 साल की मेहनत

अंतरिक्ष के शौकीनों के लिए डॉ. स्वाति मोहन मानव इतिहास की सबसे महान अंतरग्रहीय उपलब्धियों में से एक से जुड़ी आवाज बन गईं. आज वही आवाज भारत के एक युवा स्टार्टअप की दाद दे रही है, जिसने इतिहास के पन्नों में अपना नाम दर्ज करा लिया है.

विक्रम-1 की अहमियत सिर्फ एक सफल लॉन्चिंग तक सीमित नहीं है. इस मिशन ने यह साबित कर दिया है कि भारत का निजी उद्योग पूरी तरह से स्वदेशी क्षमताओं का इस्तेमाल करके ऑर्बिटल रॉकेट को डिजाइन, निर्मित और लॉन्च कर सकता है. इसने उस युवा टीम के 8 साल के विकास कार्यों पर सफलता की मुहर लगा दी है, जिनकी औसत उम्र बमुश्किल 28 साल है.

डॉ. स्वाति मोहन, ISRO की इंटरप्लेनेटरी मिशन स्पेशलिस्ट डॉ. पुनीत मिश्रा और डॉ. प्रियंका मिश्रा की क्रैक टीम के साथ.

डॉ. स्वाति मोहन, ISRO की इंटरप्लेनेटरी मिशन स्पेशलिस्ट डॉ. पुनीत मिश्रा और डॉ. प्रियंका मिश्रा की क्रैक टीम के साथ.
Photo Credit: Pallava Bagla/NDTV

स्काईरूट की यह कामयाबी अंतरिक्ष क्षेत्र को निजी भागीदारी के लिए खोलने के भारत सरकार के फैसले की भी पुष्टि करती है. विक्रम-1 ने यह दिखा दिया है कि महत्वाकांक्षी स्टार्टअप्स भी स्पेस इकोनॉमी में बड़े खिलाड़ी बन सकते हैं.

कंपनी के सीईओ पवन चंदना ने स्काईरूट के विजन को हमेशा 'मेड इन इंडिया, मेड फॉर द वर्ल्ड' के तौर पर बयां किया है. अब उस सोच और विजन को कैलिफोर्निया से तारीफ मिल रही है. ये एयरोस्पेस इनोवेशन के दुनिया के सबसे प्रमुख केंद्रों में से एक है.

कम लागत और छोटे रॉकेटों से आ रहा है बड़ा बदलाव

डॉ. मोहन का मानना है कि स्पेस सेक्टर में जो बड़ा बदलाव आ रहा है, उसकी मुख्य वजह घटती लागत और बढ़ते अवसर हैं. छोटे रॉकेट और सैटेलाइट सेवाओं के भविष्य पर चर्चा करते हुए उन्होंने कहा, "मेरा मानना है कि नया 'स्पेस इकोनॉमी' का दौर इस बात को पूरी तरह से बदल रहा है कि हम अंतरिक्ष उद्योग को कैसे देखते हैं. लॉन्चिंग, सैटेलाइट निर्माण और संचालन, इन तीनों की लागत को नई तकनीकों के ज़रिए कम करने से स्पेस प्रोग्राम में प्रवेश करने का खर्च कई गुना कम हो जाता है."

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उनके ये विचार वैश्विक स्तर पर आ रहे एक बड़े बदलाव की तरफ इशारा करते हैं. छोटे लॉन्च व्हीकल, कॉम्पैक्ट सैटेलाइट्स और उन्नत तकनीकें अंतरिक्ष तक पहुंच को पहले से कहीं ज्यादा किफायती बना रही हैं. यह विश्वविद्यालयों, स्टार्टअप्स, अनुसंधान संस्थानों और छोटे देशों को भी उन गतिविधियों में हिस्सा लेने का मौका दे रहा है, जो कभी सिर्फ सुपरपावर वाले देशों तक ही सीमित थीं.

डॉ. मोहन को यकीन है कि यह रुझान आगे और तेज होगा. उन्होंने कहा, "इससे नए खिलाड़ियों, छोटी कंपनियों या संगठनों को ऑर्बिटल स्पेस तक पहुंचने के लिए शुरुआती लागत लगाने की सहूलियत मिलती है."

वह कहती हैं, "हमारे पास जितने अधिक खिलाड़ी होंगे, उतने ही अधिक अवसर होंगे और उतने ही विभिन्न प्रकार के संगठन इस अंतरिक्ष वातावरण का लाभ उठाकर अपनी अर्थव्यवस्था का जरिया बना सकेंगे. यह भविष्य के लिए एक बहुत अच्छा संकेत है."

उनकी ये बातें स्काईरूट के मकसद और सोच से पूरी तरह मेल खाती हैं.

 'हौसला और लगन बनाए रखें'

विक्रम-1 का पहला मिशन सिर्फ एक रॉकेट को ऑर्बिट में स्थापित करने के बारे में नहीं था. इस उड़ान ने उन तकनीकों का प्रदर्शन किया जो भविष्य के कमर्शियल लॉन्च का समर्थन कर सकती हैं और दुनिया भर के ग्राहकों को अंतरिक्ष तक बेहतर पहुंच प्रदान कर सकती हैं. इस मिशन में कई पेलोड ले जाए गए और इसने उस स्टार्टअप की क्षमताओं का प्रदर्शन किया, जिसने अंतरिक्ष को सभी के लिए सुलभ बनाने के सपने के साथ शुरुआत की थी.

यह लॉन्च उन युवा इंजीनियरों की सालों की सख्त मेहनत का भी नतीजा था, जिन्होंने एक ऐसे उद्योग में पारंपरिक सोच को चुनौती देने की हिम्मत दिखाई. इसे इंजीनियरिंग के सबसे कठिन क्षेत्रों में से एक माना जाता है.

जब डॉ. मोहन को याद दिलाया गया कि स्काईरूट एयरोस्पेस में काम करने वालों की औसतन उम्र लगभग 28 साल है, तो उन्होंने कंपनी के युवा इंजीनियरों और लीडर्स के लिए एक खास पैगाम दिया.

उन्होंने कहा, "मैं बस यही कहूंगी कि अपना हौसला और लगन बनाए रखें . आपने एक बेहतरीन पहला कदम उठाया है. आगे अभी कई और कदम उठाने बाकी हैं, लेकिन जब तक आप अपने भीतर लगन और दृढ़ता बनाए रखेंगे, आपके पास महानता हासिल करने की अपार क्षमता रहेगी."

'आगमन' तो बस शुरुआत है...

यह पैगाम इसलिए भी बहुत खास है क्योंकि 'लगन और निरंतरता' उनके अपने पेशेवर सफर की पहचान रही है. यह एक ऐसा शब्द भी है जो स्वाभाविक तौर से नासा के 'पर्सवेरेंस रोवर' की याद दिलाता है, जिस मिशन ने उन्हें दुनिया भर में पहचान दिलाई.

स्काईरूट एयरोस्पेस के लिए विक्रम-1 की पहली सफल उड़ान ने पहले ही इतिहास में अपनी जगह पक्की कर ली है. लेकिन अमेरिका के सबसे सम्मानित एयरोस्पेस इंजीनियरों में से एक से मिली यह सराहना दिखाता है कि भारत के स्पेस सेक्टर का कद्र अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हो रहा है.

जैसे-जैसे भारत का निजी अंतरिक्ष क्षेत्र गति पकड़ रहा है और नए खिलाड़ी अपने मिशनों के लिए तैयार हो रहे हैं, नासा की 'वॉइस ऑफ मार्स' की यह दाद इस बात की याद दिलाती है कि पूरी दुनिया भारत को देख रही है.

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