मध्यप्रदेश में 20 जुलाई से मानसून सत्र की शुरुआत होने जा रही है. लेकिन सदन की कार्यवाही शुरू होने से पहले ही सरकार के सामने एक बड़ी चुनौती खड़ी हो गई है. विधानसभा के रिकॉर्ड में सरकार का राजनीतिक गणित थोड़ा गड़बड़ नजर आ रहा है. प्रदेश के कुल 54 विभागों में विधानसभा से जुड़े 1,336 मामले पेंडिंग यानी लंबित पड़े हैं. इस पूरे राजनीतिक अंकगणित में सबसे ज्यादा असहज करने वाली बात यह है कि जिन टॉप-5 विभागों में सबसे ज्यादा मामले पेंडिंग हैं, उनमें से दो बड़े विभाग खुद मुख्यमंत्री डॉ.मोहन यादव के पास हैं. इसे देखते हुए संसदीय कार्य विभाग के मंत्री कैलाश विजयवर्गीय ने सभी विभागों को पेंडिंग मामलों का निपटारा तेजी से करने के सख्त निर्देश जारी किए हैं. सभी विभागों के प्रमुख सचिवों, अपर मुख्य सचिवों और विभागाध्यक्षों से साफ कह दिया गया है कि वे विधानसभा से जुड़े कामों को सर्वोच्च प्राथमिकता दें और तय समय सीमा के भीतर अपने जवाब भेजें, ताकि सत्र शुरू होने से पहले पेंडिंग फाइलों के इस भारी बोझ को कम किया जा सके.

टॉप-5 पेंडिंग विभागों में मुख्यमंत्री के दो विभाग शामिल
अगर आंकड़ों की भाषा में समझें तो सामान्य प्रशासन विभाग 172 लंबित मामलों के साथ इस सूची में पहले नंबर पर है. इसके ठीक बाद किसान कल्याण एवं कृषि विभाग में 154, राजस्व विभाग में 122, लोक स्वास्थ्य एवं चिकित्सा शिक्षा विभाग में 121 और गृह विभाग में 115 मामले लंबित पड़े हैं. ध्यान देने वाली बात यह है कि सामान्य प्रशासन विभाग और गृह विभाग, दोनों की कमान खुद मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के हाथों में है. यानी टॉप-5 की इस लिस्ट में हर दूसरा बड़ा विभाग सीधे मुख्यमंत्री की जिम्मेदारी से जुड़ा हुआ है.
सवालों के अधूरे जवाब देने में भी सीएम के विभाग आगे
विधानसभा में पूछे गए सवालों के अधूरे जवाबों को देखा जाए तो सरकार के लिए तस्वीर और ज्यादा तीखी हो जाती है.
यानी जिन सवालों के पूरे जवाब सदन पटल पर रखे जाने चाहिए थे, उनमें भी मुख्यमंत्री के विभागों का हिस्सा सबसे ज्यादा दिखाई दे रहा है.
डिप्टी सीएम के विभाग में सबसे ज्यादा अधूरे वादे
सवालों के अधूरे जवाब अगर सरकार के लिए पहली बड़ी सिरदर्दी हैं, तो सदन में मंत्रियों द्वारा किए गए अधूरे वादे यानि आश्वासन दूसरी बड़ी चुनौती बनकर उभरे हैं. डिप्टी सीएम राजेंद्र शुक्ल के लोक स्वास्थ्य एवं चिकित्सा शिक्षा विभाग में मंत्रियों द्वारा दिए गए 46 आश्वासन अब तक पूरे नहीं हो सके हैं, जो कि सभी विभागों में सबसे ज्यादा हैं. इसके बाद मुख्यमंत्री के गृह विभाग में 32 और वरिष्ठ मंत्री प्रह्लाद पटेल के पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग में 21 आश्वासन अभी तक पेंडिंग हैं.
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कुल बैकलॉग में 62 फीसदी हिस्सा सिर्फ अधूरे जवाबों का
अगर पूरे बैकलॉग का हिसाब निकाला जाए तो कुल 1,336 लंबित मामलों में से अकेले 832 सिर्फ अधूरे जवाब हैं. इसका मतलब यह हुआ कि करीब 62 प्रतिशत मामले ऐसे सवालों से जुड़े हैं जिनका पूरा जवाब सरकार की तरफ से अब तक नहीं मिल पाया है. इसके अलावा 298 मामले मंत्रियों के अधूरे आश्वासनों के हैं, 120 मामले लोक लेखा समिति की लंबित सिफारिशों से जुड़े हैं और 86 मामले शून्यकाल से संबंधित हैं. वहीं लोक लेखा समिति की पेंडिंग सिफारिशों की बात करें तो लोक निर्माण विभाग 18 मामलों के साथ सबसे ऊपर है, जबकि राजस्व विभाग में 16 और वन विभाग में 14 सिफारिशों पर कार्रवाई होना बाकी है. संसदीय कार्य विभाग के सूत्रों का कहना है कि सबसे बड़ी चिंता इन अधूरे जवाबों को लेकर ही है, क्योंकि लंबित मामलों में इनका ग्राफ सबसे ऊंचा है. इसके साथ ही सदन में दिए गए 298 वादे भी अब तक कागजों से निकलकर हकीकत में नहीं बदल पाए हैं. ऐसे में मानसून सत्र से ठीक पहले सरकार के सामने सिर्फ फाइलों का बोझ कम करने की नहीं, बल्कि विधानसभा के प्रति अपनी जवाबदेही साबित करने की भी बड़ी चुनौती है.
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