बिलासपुर स्थित छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट (Chhattisgarh High Court) ने मुस्लिम उत्तराधिकार कानून (Muslim Inheritance Law) को लेकर एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि कोई भी मुस्लिम अपने कानूनी वारिसों की सहमति के बिना वसीयत के जरिए अपनी कुल संपत्ति के एक तिहाई से अधिक हिस्से का निपटान नहीं कर सकता. जस्टिस बीडी गुरु की एकलपीठ ने इस मामले में दो निचली अदालतों के फैसलों को पलटते हुए विधवा के वैध अधिकारों को संरक्षण दिया है.
निचली अदालतों की चूक पर हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी
हाईकोर्ट ने कहा कि निचली अदालतें एक मुस्लिम विधवा के कानूनी हिस्से की रक्षा करने में असफल रहीं. अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि वसीयत को अवैध साबित करने का पूरा भार विधवा पर डालना कानूनन गलत था. सही दायित्व प्रतिवादी पर था कि वह यह साबित करे कि अन्य वारिसों ने स्वतंत्र और सचेत रूप से सहमति दी थी.
क्या है मामला
अपीलकर्ता जैबुन निशा (64) स्वर्गीय अब्दुल सत्तार लोधिया की पत्नी हैं. यह विवाद कोरबा जिले में स्थित एक मकान और भूमि से जुड़ा है. मई 2004 में पति लोधिया की मृत्यु के बाद उनके भतीजे मोहम्मद सिकंदर ने खुद को दत्तक पुत्र बताते हुए 27 अप्रैल 2004 की एक वसीयत पेश की, जिसमें पूरी संपत्ति अपने नाम करने का दावा किया गया. इस आधार पर राजस्व रिकॉर्ड में उसका नाम दर्ज हो गया.
हाईकोर्ट की अहम व्याख्या
अदालत ने मुस्लिम कानून के सिद्धांतों का हवाला देते हुए कहा कि वसीयत की शक्ति सीमित है. एक तिहाई से अधिक संपत्ति या किसी उत्तराधिकारी के पक्ष में वसीयत तभी मान्य होगी, जब मृत्यु के बाद सभी अन्य वारिसों की स्पष्ट सहमति हो. कोर्ट ने दो टूक कहा कि केवल चुप्पी या मुकदमा दायर करने में देरी को सहमति नहीं माना जा सकता.
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि भले ही प्रस्तुत वसीयत असली मान ली जाए, फिर भी सिकंदर एक तिहाई से अधिक संपत्ति का दावा नहीं कर सकता. पूर्व के सभी फैसलों को रद्द करते हुए कोर्ट ने कहा कि मुस्लिम कानून में उत्तराधिकारियों के अधिकारों की सुरक्षा एक मूल सिद्धांत है और उससे समझौता नहीं किया जा सकता.
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