Chhattisgarh High Court: बिलासपुर MBBS सेवा बॉन्ड मामले में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने डॉक्टरों को बड़ी राहत दी है. वहीं कोर्ट ने राज्य सरकार को उनके पक्ष में एनओसी (No Objection Certificate) जारी करने का निर्देश दिया है. न्यायमूर्ति अमितेन्द्र किशोर प्रसाद की एकलपीठ ने सुनवाई करते हुए कहा कि MBBS और इंटर्नशिप पूरी होने के बाद छह माह के भीतर नियुक्ति आदेश जारी करना सरकार की वैधानिक जिम्मेदारी है. यदि सरकार ऐसा करने में विफल रहती है तो सेवा बॉन्ड स्वतः समाप्त माना जाएगा. यह मामला छत्तीसगढ़ आयुर्विज्ञान संस्थान (CIMS) बिलासपुर से वर्ष 2024 में MBBS पूरा करने वाले चार डॉक्टरों से जुड़ा है.
डॉक्टरों ने खटखटाया हाईकोर्ट का दरवाजा
याचिका नितीन कुमार सिंह, साहिल कारी, चंद्र प्रकाश रवि और साक्षी कंवर ने दायर की थी. याचिकाकर्ताओं का कहना था कि इंटर्नशिप पूरी करने के बावजूद उन्हें समय सीमा के भीतर नियुक्ति नहीं दी गई, जबकि बाद में काउंसलिंग कर नियुक्ति आदेश जारी कर दिए गए. हाईकोर्ट ने माना कि नियुक्ति आदेश जारी करने में हुई देरी पूरी तरह प्रशासनिक थी और इसके लिए डॉक्टर जिम्मेदार नहीं थे. कोर्ट ने कहा कि सरकार अपनी जिम्मेदारी पूरी नहीं कर सकी, इसलिए बाद में जारी किए गए नियुक्ति आदेश और बॉन्ड की शर्तें लागू नहीं की जा सकतीं. अदालत ने स्पष्ट किया कि डॉक्टरों से 20 से 25 लाख रुपये की बॉन्ड राशि नहीं वसूली जा सकती और राज्य सरकार को उनके पक्ष में तत्काल एनओसी जारी करनी होगी. कोर्ट ने यह भी कहा कि सरकार अपनी चूक का खामियाजा डॉक्टरों पर नहीं थोप सकती.
6 महीने में नौकरी नहीं दी तो डॉक्टरों का बांड होगा खत्म
याचिकाकर्ताओं ने अदालत को बताया कि छत्तीसगढ़ मेडिकल, डेंटल एवं फिजियोथेरेपी अंडरग्रेजुएट एडमिशन रूल्स 2025 के नियम 10(6) के अनुसार MBBS और इंटर्नशिप पूरी होने के छह माह के भीतर नियुक्ति आदेश जारी करना सरकार की जिम्मेदारी है. ऐसा नहीं होने पर बॉन्ड स्वतः समाप्त हो जाता है. इसके बावजूद उन्हें एनओसी नहीं दी जा रही थी, जिससे वे उच्च शिक्षा और अन्य पेशेवर अवसरों का लाभ नहीं ले पा रहे थे.
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सुनवाई के दौरान राज्य सरकार ने तर्क दिया कि डॉक्टरों ने 2019 में प्रवेश के समय सेवा बॉन्ड भरा था और बाद में दिसंबर 2025 में आयोजित काउंसलिंग प्रक्रिया में भी भाग लिया था. इसलिए वे बॉन्ड की शर्तों से पीछे नहीं हट सकते. सरकार ने यह भी कहा कि नियुक्ति आदेश जारी किए गए थे, लेकिन डॉक्टरों ने पदस्थापना स्थल पर ज्वाइन नहीं किया.
सरकार को NOC जारी करने के दिए निर्देश
न्यायमूर्ति अमितेन्द्र किशोर प्रसाद की एकलपीठ ने मामले की सुनवाई के बाद कहा कि नियम 10(6) की भाषा पूरी तरह स्पष्ट है और छह माह के भीतर नियुक्ति नहीं होने पर बॉन्ड स्वतः समाप्त माना जाएगा. कोर्ट ने माना कि नियुक्ति आदेश जारी करने में हुई देरी के लिए याचिकाकर्ता जिम्मेदार नहीं थे, बल्कि यह प्रशासनिक विलंब था. इसलिए छह माह की अवधि समाप्त होने के बाद जारी किए गए नियुक्ति आदेश कानूनी रूप से प्रभावी नहीं माने जा सकते. हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि याचिकाकर्ताओं पर 20 लाख या 25 लाख रुपये की बॉन्ड राशि जमा करने का कोई दायित्व नहीं बनता. साथ ही राज्य सरकार को तत्काल एनओसी जारी करने और पंडित दीनदयाल उपाध्याय मेमोरियल हेल्थ साइंसेज एवं आयुष विश्वविद्यालय को आवश्यक होने पर MBBS डिग्री प्रदान करने के निर्देश दिए गए. इसके साथ ही कोर्ट ने याचिका स्वीकार कर ली.
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