किस्सा यूपी का: कांग्रेसी CM संपूर्णानंद, जिन्होंने नेहरू की आपत्ति के बाद भी गोहत्या पर लगाया था बैन
'किस्सा यूपी का' की दूसरी कड़ी में आज बात उत्तर प्रदेश के दूसरे मुख्यमंत्री डॉ. संपूर्णानंद की, जिन्होंने अपने जीवन काल में 45 पुस्तकें लिखी. पंडित नेहरू से नाराजगी के बाद भी गो हत्या को बैन किया. बनारस का नाम बदलकर वाराणसी की. लेकिन इनका अंत बेहद गरीबी में हुआ.
कल्पना कीजिए, केंद्र और राज्य में एक ही पार्टी की सरकार हो. पार्टी का सबसे बड़ा नेता केंद्र की सरकार का प्रधान हो और उसकी अपनी ही पार्टी के किसी मुख्यमंत्री से नहीं बनती हो... तो क्या होगा. तत्काल उस मुख्यमंत्री को हटाने की कवायद शुरू हो जाएगी. दो-चार महीने से लेकर साल भर-दो साल में उस मुख्यमंत्री को कुर्सी से हटा दिया जाएगा. लेकिन प्रधानमंत्री की नाराजगी के बाद भी उन्हीं की पार्टी का मुख्यमंत्री 5 साल तक सत्ता में बना रहा, इसका उदाहरण भारतीय लोकतंत्र में दर्ज है.
गोविंद वल्लभ पंत के बाद बने यूपी के दूसरे मुख्यमंत्री
भारतीय लोकतंत्र की यह कहानी है 1960 के दशक की. जब केंद्र के साथ-साथ ज्यादातर राज्यों में कांग्रेस की सरकार थी. पार्टी के सबसे बड़े नेता पंडित जवाहर लाल नेहरू देश के प्रधानमंत्री थे. सरकार पटेल के निधन के बाद जब गोविंद वल्लभ पंत केंद्र में गृह मंत्री बने, तब यूपी की कमान डॉक्टर संपूर्णानंद को दी गई.
सीएम बनने से पहले डॉक्टर संपूर्णानंद यूपी के शिक्षा मंत्री थे. उससे पहले उनकी पहचान एक बड़े पत्रकार, लेखक और संपादक के रूप में स्थापित हो चुकी थी. संपूर्णानंद संस्कृत के विद्वान थे और उन्हें वैदिक दर्शन और पढ़ाने-लिखाने में बहुत दिलचस्पी थी. 28 दिसंबर 1954 को डॉ. संर्पूणानंद पहली बार यूपी के मुख्यमंत्री बने.

डॉ. संपूर्णानंद की जन्मतिथि पर कांग्रेस द्वारा एक्स पर साझा किया गया पोस्ट.
नेहरू की आपत्ति के बाद भी यूपी में गो हत्या किया बैन
कुछ ही महीनों बाद 1955 में उन्होंने यूपी में गो हत्या पर रोक लगाने वाला कानून बनाया. पंडित नेहरू इसके खिलाफ थे. क्रिस्टोफ जैफरलॉट ने गोहत्या पर अपनी किताब में लिखा है- पंडित नेहरू की आपत्ति को दरकिनार करते हुए, संपूर्णानंद सरकार ने यूपी विधानसभा में गो-हत्या पर रोक लगाने की घोषणा की.
मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देने के बाद बने राजस्थान के राज्यपाल
दूसरे टर्म में संपूर्णानंद 10 अप्रैल 1957 से 6 दिसंबर 1960 तक यूपी के मुख्यमंत्री रहे. मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देने के बाद वो राजस्थान के राज्यपाल बने. संपूर्णानंद ने राजस्थान के दूसरे राज्यपाल के रूप में 16 अप्रैल, 1962 को पद ग्रहण किया और 15 अप्रैल, 1967 तक इस पद पर आसीन रहे.

अंत गरीबी में, राजस्थान के सीएम करते थे आर्थिक मदद
इसके बाद उन्होंने राजनीति से संन्यास ले लिया. फिर उनके जीवन के आखिरी दिन बेहद गुरबत में बीते. कहा जाता है कि डॉ. संपूर्णानंद जब राज्यपाल थे तो उनकी वहां के मुख्यमंत्री मोहनलाल सुखाड़िया से अच्छी दोस्ती हो गई थी. वह दोस्ती बाद में भी कायम रही.
देश के पहले राज्यपाल, जिनके नाम पर किसी इमारत का नाम रखा गया
सुखाड़िया ने जोधपुर मेडिकल कॉलेज का नाम संपूर्णानंद मेडिकल कॉलेज रखवाया. जो भारत में किसी राज्यपाल के नाम पर संभवतः पहला मेडिकल कॉलेज था. 1967 में राज्यपाल पद से मुक्त होने के बाद डॉ. संपूर्णानंद वाराणसी आ गए. उनकी आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी. मोहन लाल सुखाड़िया उन दिनों डॉ. संपूर्णानंद की आर्थिक मदद किया करते थे.
बनारस में जन्म, करियर की शुरुआत पढ़ने-पढ़ाने से
डॉ. संपूर्णानंद का जन्म 1 जनवरी, 1891 को बनारस में हुआ था. क्वीन्स कॉलेज बनारस के बाद इलाहाबाद विश्वविद्यालय से विज्ञान में स्नातक की उपाधि प्राप्त की. इलाहाबाद के ही शिक्षक प्रशिक्षण महाविद्यालय से एल.टी. की परीक्षा पास की और 20 साल की उम्र में स्टाफ ऑफ लंदन मिशन हाई स्कूल, बनारस से अपने शिक्षण कैरियर की शुरूआत की.
वर्ष 1918 से 1921 तक आप डूंगर महाविद्यालय, बीकानेर के प्राचार्य रहे. असहयोग आन्दोलन में भाग लेने के लिये आपने पद त्याग दिया और गिरफ्तारी दी. वर्ष 1922 में आप दर्शन शास्त्र के व्याख्याता के रूप में काशी विद्यापीठ से जुड़े और वर्ष 1946 तक यहां रहे.

देश की आजादी की लड़ाई में कई बार जेल भी गए
इस दौरान वो राजनीति में भी सक्रिय रहे और कई बार जेल गये. वर्ष 1922 में संपूर्णानंद अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के सदस्य चुने गये. वो तीन बार उत्तर प्रदेश की प्रदेश कांग्रेस कमेटी के सचिव रहे. 1926 में उत्तर प्रदेश विधान परिषद् के सदस्य भी रहे.
बनारस का नाम बदल कर वाराणसी इन्होंने ही किया था
बनारस का नाम बदलने का श्रेय भी डॉ. संपूर्णानंद को जाता है. वो खुद बनारस के थे. उन्होंने ही बनारस का नाम वाराणसी किया था. 10 जनवरी 1969 को उनका निधन हुआ. तब वाराणसी में उनकी शवयात्रा में इतने अधिक लोग उमड़े कि सड़कों पर तिल रखने की जगह नहीं थी. उनकी अर्थी को जन समुद्र के ऊपर-ऊपर से किसी तरह खिसकाते हुए घाट तक पहुंचाया जा सका था.
क्षेत्र में कभी वोट मांगने नहीं जाते थे डॉ. संपूर्णानंद
डॉ. संपूर्णानंद के बारे में एक कहानी और बड़ी चर्चित है. इस कहानी के अनुसार डॉ. संपूर्णानंद कभी वोट मांगने क्षेत्र में नहीं जाते थे. उन्हें अपने काम पर पूरा भरोसा था. वे कहते थे कि जनता जानती है कि मैंने पूरे पांच साल कैसा काम किया. उसके आधार पर वे हमें वोट देगी या नहीं देगी. मेरे जाने से कोई फर्क नहीं पड़ने वाला.
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