सांसें बचाने की मशीन घर में रखी है, लेकिन उसे चलाने के लिए बिजली नहीं है. स्वास्थ्य विभाग ने मरीज को ऑक्सीजन जनरेट करने वाली मशीन तो उपलब्ध करा दी, मगर बिजली और सड़क जैसी बुनियादी सुविधाओं की कमी ने इस राहत को ही बेबस कर दिया.ये कहानी छत्तीसगढ़ के गौरेला-पेंड्रा-मरवाही जिले के गिरारी ग्राम पंचायत के भलवाही टिकरा में रहने वाले भगत सिंह कुशराम की है. वे गंभीर बीमारी से पीड़ित हैं जिसकी वजह से उन्हें ऑक्सीजन पर ही निर्भर रहना पड़ता है. हालात ऐसे हैं कि जिस मशीन के सहारे मरीज को घर पर ऑक्सीजन मिल सकती है, बिजली नहीं होने के कारण उसका इस्तेमाल मुश्किल हो रहा है. यानी स्वास्थ्य विभाग ने मरीज की जरूरत को देखते हुए इंतजाम किया, लेकिन बिजली और सड़क की अधूरी व्यवस्था के कारण उसका पूरा फायदा मरीज तक नहीं पहुंच पा रहा.
खाट पर मरीज, पास रखी मशीन फिर भी बेबस
भगत सिंह कुशराम के घर का दृश्य समस्या की गंभीरता बताने के लिए काफी है. वह खाट पर लेटे ऑक्सीजन ले रहे हैं. नाक में ऑक्सीजन की नली लगी है और पास में ही बिजली से चलने वाली ऑक्सीजन जनरेटर मशीन रखी है.मशीन उपलब्ध होने के बावजूद समस्या बिजली की है. परिवार और ग्रामीणों के मुताबिक इलाके में बिजली की स्थिति ठीक नहीं होने के कारण ऑक्सीजन जनरेटर मशीन का अपेक्षित इस्तेमाल नहीं हो पा रहा है. यही वजह है कि भगत सिंह को ऑक्सीजन सिलेंडर पर निर्भर रहना पड़ रहा है.यानी समस्या केवल स्वास्थ्य उपकरण उपलब्ध कराने की नहीं, बल्कि उस उपकरण को चलाने के लिए जरूरी व्यवस्था की भी है.

Gaurela Pendra Marwahi: गौरेला-पेंड्रा-मरवाही जिले के गिरारी ग्राम पंचायत के रहने वाले भगत सिंह कुशराम को कुछ इस तरीके से हर दो-तीन दिन में सिलेंडर भरवाने के लिए जाना पड़ता है.
Photo Credit: अखिलेश कुमार नामदेव
2-3 दिन में खाली हो जाता है सिलेंडर
ग्रामीणों के मुताबिक एक ऑक्सीजन सिलेंडर करीब ढाई से तीन दिन चलता है. इसके खाली होने के बाद परेशानी और बढ़ जाती है.परिवार के पास सिलेंडर लाने-ले जाने के लिए पर्याप्त साधन नहीं है. ऐसे में दूसरे की बाइक का सहारा लेना पड़ता है. सिलेंडर को बाइक के पीछे रस्सी से बांधा जाता है और करीब 10 से 15 किलोमीटर दूर गौरेला तक ले जाकर उसे भरवाया जाता है.इस तरह जिस ऑक्सीजन का इंतजाम मरीज के घर पर मशीन से होना चाहिए था, उसके लिए बार-बार सिलेंडर भरवाने की मजबूरी बनी हुई है.
हमेशा लो रहता है वोल्टेज
स्थानीय लोगों का दावा है कि गांव में बिजली की स्थिति बेहद खराब है. 24 घंटे में महज दो से ढाई घंटे ही पर्याप्त वोल्टेज वाली बिजली मिल पाती है. लो वोल्टेज के कारण बिजली से चलने वाली ऑक्सीजन मशीन का भरोसेमंद तरीके से इस्तेमाल नहीं हो पा रहा है.मामला सामने आने के बाद बिजली विभाग के अधिकारियों ने भी मौके का निरीक्षण किया. जिला कलेक्टर विजय दयाराम के. के मुताबिक जांच के दौरान इलाके में लो वोल्टेज की समस्या सामने आई है.उन्होंने कहा कि पीड़ित से आवेदन प्राप्त कर बिजली आपूर्ति में सुधार की व्यवस्था की जाएगी, ताकि मरीज ऑक्सीजन जनरेटर मशीन का इस्तेमाल कर सके.
घर तक पक्की सड़क भी नहीं
भगत सिंह की परेशानी सिर्फ ऑक्सीजन और बिजली तक सीमित नहीं है. उनके घर तक पहुंचने के लिए पक्की सड़क भी नहीं है. खेतों के बीच बने रास्ते से होकर घर तक पहुंचना पड़ता है.ऐसे में सवाल यह भी है कि मरीज की तबीयत अचानक बिगड़ने और तत्काल अस्पताल ले जाने की जरूरत पड़ने पर एंबुलेंस या दूसरे वाहन को घर तक पहुंचने में कितनी परेशानी हो सकती है.ग्रामीणों का कहना है कि बिजली और पहुंच मार्ग से जुड़ी समस्याओं को लेकर पहले भी मांग की गई है. सड़क नहीं होने के कारण मरीजों को अस्पताल तक पहुंचाने में परेशानी का सामना करना पड़ता है.
बिजली विभाग ने किया निरीक्षण, लो वोल्टेज की समस्या मिली
मामला जिला प्रशासन के संज्ञान में पहुंचने के बाद बिजली विभाग को मौके पर भेजा गया. कलेक्टर विजय दयाराम के. ने बताया कि छत्तीसगढ़ राज्य विद्युत मंडल के अधिकारियों ने संबंधित जगह का निरीक्षण किया और लो वोल्टेज की समस्या पाई.प्रशासन का कहना है कि मरीज से आवेदन लेकर बिजली व्यवस्था सुधारने के लिए आवश्यक कदम उठाए जाएंगे. इसका मकसद मरीज के घर में उपलब्ध ऑक्सीजन जनरेटर मशीन को इस्तेमाल करने लायक बिजली आपूर्ति सुनिश्चित करना है.
सड़क को लेकर भी प्रशासन ने दिया आश्वासन
मरीज के घर तक पक्की सड़क नहीं होने के मामले में भी प्रशासन ने समाधान की बात कही है. कलेक्टर के मुताबिक जी राम जी योजना के अंतर्गत धरसा सड़क का प्रावधान है. ग्राम पंचायत की ओर से प्रस्ताव मिलने के बाद इसके तहत सड़क का निर्माण कराया जा सकता है.फिलहाल भगत सिंह और उनका परिवार प्रशासन के इन आश्वासनों के जमीन पर उतरने का इंतजार कर रहा है. गंभीर बीमारी और ऑक्सीजन पर निर्भरता के बीच उनके लिए बिजली का लो वोल्टेज सिर्फ रोजमर्रा की असुविधा नहीं है. इसका सीधा संबंध उनकी ऑक्सीजन की उपलब्धता से है.मशीन घर में है, लेकिन उसे चलाने लायक बिजली नहीं. ऑक्सीजन सिलेंडर है, लेकिन उसे भरवाने के लिए दूसरे की बाइक का सहारा चाहिए. घर है, लेकिन वहां तक पहुंचने के लिए पक्की सड़क नहीं. ऐसे में अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि सांसों से जुड़ी इस परेशानी का स्थायी समाधान मरीज तक कितनी जल्दी पहुंचता है.
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