चंबल के बीहड़ों की कहानियों की हमारी 'चंबल डायरी'सीरीज में आज हम पन्ने पलटेंगे एक बेहद दर्दनाक, नाटकीय और खौफनाक दास्तान की जिसने चंबल को पहली महिला डकैत दे दिया. यह कहानी है गौहरबानो की, जिसकी खनकती पायलों और थिरकते कदमों पर कभी आगरा, धौलपुर और कानपुर की महफिलें अपनी सांसें रोक लिया करती थीं लेकिन वक्त के थपेड़ों और पुलिसिया प्रताड़ना ने उस डांसर के हाथों में थ्री-नॉट-थ्री राइफल थमा दी. जिसके बाद वो बन गई आजाद भारत की पहली बेखौफ 'बैंडिट क्वीन' और नाम मिला पुतली बाई का.उस पर 10 से अधिक हत्याएं और 20 से अधिक बड़ी डकैती के मामले दर्ज थे. लेकिन यह कहानी व्यवस्था के क्रूर चेहरे और बीहड़ के स्याह सच को उजागर करती है जिसकी गूंज आज भी चंबल की घाटियों में सुनाई देती है.
गौहरबानो ऐसे बन गई 'पुतली बाई'
चलिए बात को शुरु से शुरु करते हैं. पुतली बाई का असली नाम गौहरबानो था. उनका जन्म साल 1926 में मध्य प्रदेश के मुरैना जिले की अंबा तहसील के ऐतिहासिक गांव बरबई में एक बेहद गरीब मुस्लिम परिवार में हुआ था. या रहे कि बरबई वही मिट्टी है जिसने देश को अमर क्रांतिकारी पंडित रामप्रसाद बिस्मिल जैसा सपूत दिया था, लेकिन इसी मिट्टी की एक बेटी देश की पहली बड़ी महिला डकैत बनी. बहरहाल गौहरबानो को बचपन से ही अपनी मां और नानी से विरासत में शास्त्रीय नृत्य और सुरीली आवाज मिली थी. जैसे-जैसे वे बड़ी हुईं, उनकी खूबसूरती और कथक नृत्य की कला की चर्चा मुरैना और ग्वालियर के जमींदारों की महफिलों से निकलकर आगरा, धौलपुर, और कानपुर तक जा पहुंची. उनकी आंखों की चंचलता, गजब की फुर्ती और थिरकते कदमों की वजह से कद्रदानों ने उसे 'पुतली बाई' (कठपुतली जैसी चंचल) कहना शुरू कर दिया.

पुतली बाई की एकमात्र सत्यापित तस्वीर...जो उसके बचपन की तस्वीर बताई जाती है.
सुल्ताना डाकू ने किया किडनैप और बदल गई जिंदगी
साल 1950 के दशक की शुरुआत में, राजस्थान के धौलपुर में एक स्थानीय जमींदार के यहां शादी का जश्न चल रहा था, जहां पुतली बाई डांस कर रही थीं. उसी महफिल में चंबल के तत्कालीन खूंखार और बेरहम डकैत सुल्ताना ने अपने गिरोह के साथ धावा बोल दिया. पुतली बाई के हुस्न और उनके बेजोड़ नृत्य को देखकर सुल्ताना उन पर इस कदर फिदा हुआ कि वह भरी महफिल से बंदूक की नोक पर उनका अपहरण कर चंबल के बीहड़ों में ले गया.शुरुआत में पुतली बाई के लिए बीहड़ की यह पथरीली और कटीली जिंदगी किसी नर्क से कम नहीं थी. उन्होंने कई बार वहां से भागने की कोशिश की, लेकिन सुल्ताना के कड़े पहरे और बीहड़ के भूलभुलैया जैसे रास्तों ने उन्हें हर बार नाकाम किया. वक्त बीतने के साथ सुल्ताना के प्रति उनका डर गहरे लगाव और प्यार में बदल गया. दोनों ने पति-पत्नी की तरह रहना शुरू कर दिया. इस दौरान पुतली बाई ने एक बेटी को जन्म दिया, जिसका नाम उन्होंने 'तन्नो' रखा. बीहड़ में बच्चे का भविष्य सुरक्षित न देखकर, पुतली बाई ने कलेजे पर पत्थर रखकर अपनी नवजात बेटी को परवरिश के लिए आगरा में अपनी मां के पास भेज दिया.
खाकी का अमानवीय चेहरा: गैंगरेप और टॉर्चर
बेटी की ममता और बीहड़ के हिंसक साए से तंग आकर जब पुतली बाई वापस आगरा लौटी, तो उन्हें लगा था कि वे एक आम जिंदगी जी सकेंगी. लेकिन पुलिस और तत्कालीन सामाजिक व्यवस्था ने उनके लिए नरक के द्वार खोल दिए. आगरा पुलिस ने उसे सुल्ताना डाकू की 'मुखबिर' और मददगार मान लिया था. रोज सुबह उसे थाने बुलाया जाता और देर रात तक बिठाकर रखा जाता.
ऐसे आरोप भी है कि कुछ पुलिसवालों ने पुतली बाई के साथ रेप जैसा घिनौना कृत्य भी किया. इस पूरे घटनाक्रम ने पुतली बाई के जहन में फिर बीहड़ का रूख करने का बीज बो दिया. आखिरकार उसने फिर से बीहड़ का रुख किया, लेकिन इस बार घुंघरू नहीं, बल्कि सिस्टम के सीने को छलनी करने के लिए थ्री-नॉट-थ्री (.303) राइफल लेकर.

बाद में 1972 में पुतली के जीवन पर फिल्म भी बनी. जिसमें डकैत का किरदार शिवांगी ने निभाया था.
सुल्ताना ने तैयार किया पुतली बाई को
बीहड़ में वापसी के बाद पुतली ने सुल्ताना से हथियार चलाना सिखाने को कहा. सुल्ताना से ट्रेनिंग लेने के बाद वो गैंग के साथ मिलकर लूट अपहरण और हत्याओं जैसी वारदातों को अंजाम देना शुरू कर दिया. इसी दौरान धौलपुर के रजई गांव में पुलिस के साथ मुठभेड़ में वो पकड़ ली गई. पुतली को कुछ दिन तारागंज की जेल में रखा जाता है फिर धौलपुर शिफ्ट कर दिया जाता है. यहां भी पुलिस उसका बलात्कार करती है. कुछ दिनों बाद जमानत मिलते ही पुतली फिर से बीहड़ पहुंच जाती है लेकिन इस बार और खतरनाक बनकर. तीसरी बार बीहड़ पहुंचने के बाद उसने उन सभी पुलिस वालों से बदला लिया जिसने उसे प्रताड़ित किया. कहा जाता है कि उसने एक-एक पुलिस वाले के घर पर हमला बोला और उनके हाथ-पैर की सभी उंगलियां काट दी.
सुल्ताना की मौत, पुतली के हाथ हाई कमान
सबकुछ ठीक ही चल रहा था कि एक दिन लाखन नाम के डकैत ने सुल्ताना डाकू को मार दिया. सुल्ताना की मौत के बाद पुतली बाई अकेली और लाचार हो चुकी थी. अब गैंग का सरदार बाबू लोहार बन गया था. पुतली बाई उसके साथ ही रहने लगी. कहा जाता है कि एक दिन पुलिस ने जब गैंग को चारों तरफ से घेर लिया तो पुतली बाई ने ही बाबू लोहर और लाखन डकैत को गोलियों से भून दिया. इसके बाद 30 साल की पुतली बाई ही गैंग की सरदार बन गई.
एक हाथ कटने के बाद भी नहीं चूका निशाना
पुतली बाई कद-काठी में बेहद साधारण, दुबली-पतली और छोटे कद की महिला थीं, लेकिन उनका हौसला बुलंद था. वे चंबल के इतिहास की उन दुर्लभ बागियों में से थीं जो पुलिस को देखकर भागती नहीं थीं, बल्कि डटकर मुकाबला करती थीं. साल 1957 में पुलिस के साथ हुई एक मुठभेड़ के दौरान एक गोली उनके दाहिने हाथ की कलाई को चीरती हुई निकल गई. बीहड़ में इलाज की उचित व्यवस्था न होने और लगातार भागदौड़ के कारण उसके घाव में सड़न (गैंग्रीन) फैल गई. अपनी जान बचाने के लिए पुतली बाई ने बिना किसी एनेस्थीसिया के, बेहद दर्दनाक स्थिति में अपना दाहिना हाथ कटवा दिया. शारीरिक रूप से अपंग होने के बाद भी उसने हार नहीं मानी. उसने अपने बाएं हाथ से राइफल चलाने की कड़ी ट्रेनिंग ली और जल्द ही वे बाएं हाथ से भी उतनी ही सटीकता से निशाना लगाने लगीं.
महफिलें, इत्र और शराब से भरी शख्सियत
पुतली बाई की शख्सियत अजीब विरोधाभासों से भरी हुई थी. एक तरफ जहां वो बीहड़ में खून-खराबा करती थी, वहीं दूसरी तरफ उसकी रगों में बहने वाला कलाकार का खून अक्सर जाग उठता था. वे डाकू बनने के बाद भी अपनी सुंदरता और नफासत को लेकर बेहद सजग थी. उसे बेहतरीन बनारसी साड़ियां पहनने, कीमती इत्र लगाने, सोने के गहनों से खुद को लादने और सजने-संवरने का बेहद शौक था. वो महंगी शराब पीने की शौकीन थी. और हमेशा अपने पास चांदी का एक प्याला रखती थी. कहा जाता है कि अक्सर रात के सन्नाटे में, जब बीहड़ में पुलिस का खतरा कम होता था, तो उसके कैंप में महफिल सजती थी. पुतली बाई अपने बाएं हाथ में बंदूक थामे और पैरों में घुंघरू बांधकर अपने ही डाकुओं के सामने नाचती-गाती थी.
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आखिरी जंग: क्वारी नदी का वो लाल पानी
पुतली बाई के बढ़ते आतंक को खत्म करने के लिए मध्य प्रदेश और राजस्थान पुलिस ने एक संयुक्त रणनीति बनाई. 23 जनवरी 1958 को पुलिस को सूचना मिली कि पुतली बाई अपने गिरोह के साथ मुरैना के कोठार गांव के जंगलों से गुजर रही हैं. पुलिस ने चारों तरफ से घेराबंदी कर दी और कुंवारी नदी के किनारे दोनों तरफ से भीषण गोलाबारी शुरू हो गई. मुठभेड़ कई घंटों तक चली, जिसमें पुतली बाई के गिरोह के कई बड़े शूटर मारे गए. चारों तरफ से घिर चुकी पुतली बाई ने हार मानने के बजाय लड़ते रहने का फैसला किया. एक ही हाथ होने के बावजूद उन्होंने अपनी राइफल से पुलिस पर ताबड़तोड़ गोलियां बरसाईं और बचने के लिए उफनती क्वारी नदी में छलांग लगा दी. वो नदी तैरकर पार करने ही वाली थी कि जैसे ही उन्होंने दूसरे किनारे पर अपना सिर उठाया, पुलिस की एक गोली उनके माथे के आर-पार हो गई. इसके साथ ही महज 32 साल की उम्र में चंबल की इस पहली महिला बागी की कहानी का अंत हो गया.
सागर पुलिस म्यूजियम में कैद पहली 'बैंडिट क्वीन' का वजूद
मुठभेड़ के बाद पुलिस जब पुतली बाई के शव के पास पहुंची, तो वहां उसके सामान में उनकी पूरी जिंदगी का सार बिखरा पड़ा था. पुलिस को उसके पास से एक थ्री-नॉट-थ्री राइफल, कारतूसों की बेल्ट, सोने के ताबीज, माथे का टीका, दो सोने के चूड़े, चांदी का प्याला, उनकी लंबी कटी हुई काली चोटी और एक महंगी कलाई घड़ी मिली. यह सारा सामान आज भी मध्य प्रदेश के सागर जिले में स्थित जवाहरलाल नेहरू पुलिस अकादमी के संग्रहालय (Museum) में सुरक्षित रखा गया है. यह संग्रहालय आज भी चंबल के उस खूंखार, दर्दनाक और अजीबोगरीब दौर की गवाही देता है, जहां एक डांसर को हालात ने डाकू बना दिया था.
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