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इस अदालत में होती है देवी-देवताओं की पेशी! जज भंगाराम माई सुनाती हैं फैसला, बस्तर में जीवंत है पुरानी परंपरा

छत्तीसगढ़ के धमतरी जिले में भंगाराम माई की प्रसिद्ध जात्रा के दौरान लगती है देवी-देवताओं की अनोखी अदालत. यहां भंगाराम माई न्यायाधीश की भूमिका निभाती हैं और स्थानीय मान्यताओं के अनुसार देवी-देवताओं की पेशी, सुनवाई और फैसला होता है. बस्तर और ओडिशा से हजारों श्रद्धालु इस पारंपरिक आयोजन में शामिल होते हैं.

इस अदालत में होती है देवी-देवताओं की पेशी! जज भंगाराम माई सुनाती हैं फैसला, बस्तर में जीवंत है पुरानी परंपरा
अदालत में फैसला सुनाती जज भंगाराम माई.
  • छत्तीसगढ़ के धमतरी जिले में भंगाराम माई की जात्रा में देवी-देवताओं की प्रतीकात्मक अदालत लगाई जाती है.
  • इस अदालत में देवी-देवताओं की जिम्मेदारी और सामाजिक अपेक्षाओं के अनुसार शिकायतें दर्ज कर सुनवाई की जाती है.
  • दोषी पाए जाने पर देवी-देवताओं के प्रतीकों को अपमानित कर मंदिर के बाहर गड्ढे में रखते है, जो दंड का प्रतीक है.

देश में अदालतों के बारे में आपने बहुत कुछ देखा और सुना होगा, लेकिन छत्तीसगढ़ के वनांचल में एक ऐसी अनोखी अदालत भी लगती है, जहां इंसान नहीं बल्कि देवी-देवताओं की पेशी होती है. यहां शिकायतें भी दर्ज होती हैं, सुनवाई भी होती है और फैसला भी सुनाया जाता है. धमतरी जिले के नगरी-सिहावा क्षेत्र के कुर्सीघाट बोराई में हर साल निकलने वाली भंगाराम माई की प्रसिद्ध जात्रा इसी अनूठी परंपरा की गवाह बनती है. आस्था, लोकविश्वास और आदिवासी संस्कृति से जुड़ा यह आयोजन लोगों के लिए केवल धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि सामाजिक जवाबदेही और परंपरागत न्याय व्यवस्था का भी प्रतीक माना जाता है.

भंगाराम माई की जात्रा में उमड़ा आस्था का सैलाब

दरअसल,धमतरी जिले के नगरी-सिहावा क्षेत्र के वनांचल इलाके कुर्सीघाट बोराई में रविवार को भंगाराम माई की प्रसिद्ध जात्रा निकाली गई. इस अवसर पर छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र के साथ-साथ ओडिशा से भी बड़ी संख्या में देवी-देवताओं के प्रतीक स्वरूप शामिल हुए. जात्रा में हजारों श्रद्धालु पहुंचे और पूरे क्षेत्र में धार्मिक उत्साह का माहौल देखने को मिला. दूर-दराज के गांवों से आए लोगों ने पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ इस आयोजन में भाग लिया.

यहां लगती है देवी-देवताओं की अनोखी अदालत

इस जात्रा की सबसे खास बात वह परंपरा है, जिसे स्थानीय लोग देवी-देवताओं की अदालत के रूप में जानते हैं. मान्यता के अनुसार इस दौरान विभिन्न देवी-देवताओं की प्रतीकात्मक पेशी होती है और क्षेत्र की परंपराओं के अनुसार उनकी सुनवाई की जाती है. यदि किसी देवी-देवता के बारे में यह माना जाता है कि उन्होंने अपनी जिम्मेदारी का निर्वहन नहीं किया या किसी कारण से ग्रामीणों की अपेक्षाएं पूरी नहीं हुईं, तो उनके खिलाफ शिकायत भी रखी जाती है.

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भंगाराम माई भीड़ के बीचोबीच अपनी अदालत लगाती हैं.  

भंगाराम माई निभाती हैं न्यायाधीश की भूमिका

स्थानीय मान्यताओं के मुताबिक इस पूरी प्रक्रिया में भंगाराम माई न्यायाधीश की भूमिका निभाती हैं. ग्रामीणों का विश्वास है कि उनके समक्ष क्षेत्र से जुड़े विवाद, शिकायतें और धार्मिक मामलों की सुनवाई होती है. सदियों से चली आ रही इस परंपरा में देवी-देवताओं को प्रतीकात्मक रूप से कटघरे में खड़ा किया जाता है और सुनवाई के बाद निर्णय सुनाया जाता है.

दोषी पाए जाने पर दी जाती है प्रतीकात्मक सजा

ग्रामीणों के अनुसार, यदि कोई देवी-देवता दोषी पाए जाते हैं, तो उनके प्रतीकों जैसे लाठ, छत्र या बैरंग को अपमानित कर मंदिर परिसर के बाहर बने गड्ढे में रखा जाता है. इसे प्रतीकात्मक रूप से कारावास या दंड के रूप में देखा जाता है. स्थानीय समाज में यह व्यवस्था जवाबदेही और अनुशासन के प्रतीक के तौर पर भी मानी जाती है.

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इस परंपरा का साक्षी बनने बड़ी संख्या में आदिवासी लोग शामिल होते हैं.  

महिलाओं का प्रवेश रहता है वर्जित

इस पारंपरिक अदालत की एक और विशेषता यह है कि सुनवाई की प्रक्रिया के दौरान महिलाओं का प्रवेश पूरी तरह वर्जित माना जाता है. स्थानीय रीति-रिवाजों और पीढ़ियों से चली आ रही मान्यताओं के अनुसार इस परंपरा का पालन किया जाता है. आयोजन समिति और ग्रामीण इस नियम को सदियों पुरानी परंपरा का हिस्सा बताते हैं.

ओडिशा की 7 पाली और सिहावा के 16 परगनों की भागीदारी

इस विशेष जात्रा में ओडिशा की सात पाली और सिहावा क्षेत्र के 16 परगनों से सैकड़ों देवी-देवताओं के प्रतीक शामिल होते हैं. इनके साथ हजारों श्रद्धालु भी कुर्सीघाट पहुंचते हैं. इस वजह से यह आयोजन क्षेत्र के सबसे बड़े पारंपरिक धार्मिक आयोजनों में गिना जाता है.

स्थानीय लोगों का मानना है कि यह जात्रा केवल पूजा-अर्चना तक सीमित नहीं है. गांव और क्षेत्र से जुड़ी समस्याओं, सामाजिक जिम्मेदारियों और परंपरागत व्यवस्थाओं को लेकर भी यहां प्रतीकात्मक रूप से जवाबदेही तय की जाती है. यही कारण है कि इस आयोजन का धार्मिक के साथ-साथ सामाजिक महत्व भी माना जाता है.

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परंपरा, आस्था और संस्कृति का अनोखा संगम

जात्रा के दौरान पारंपरिक वाद्ययंत्रों की गूंज, देवी-देवताओं की उपस्थिति का विश्वास और श्रद्धालुओं की आस्था पूरे वातावरण को विशेष बना देती है. दूर-दराज से पहुंचे भक्तों ने भंगाराम माई के दर्शन कर क्षेत्र की सुख, शांति और समृद्धि की कामना की. सदियों पुरानी यह परंपरा आज भी आदिवासी संस्कृति और लोकविश्वास को जीवंत बनाए हुए है.

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