Flight Hydraulic System: 4 अगस्त को एयर इंडिया की फुकेट से दिल्ली आ रही फ्लाइट (AI-2379) अचानक करीब 250 फीट नीचे आ गई थी. फ्लाइट में बैठे पैरेंजर्स को जोरदार झटके लगे और कई तो घायल भी हो गए. शुरुआत में खबर आई कि पायलट गांजे के नशे में था, लेकिन जब जांच हुई और विमान के ब्लैक बॉक्स का डेटा सामने आया, तो पता चला कि फ्लाइट के तीनों हाइड्रोलिक सिस्टम में कुछ सेकंड के लिए खराबी आ गई थी. एयरबस की शुरुआती जांच के मुताबिक, करीब 4 सेकंड तक विमान के अहम फ्लाइट कंट्रोल्स ने सही तरह काम नहीं किया. इसी दौरान एलेवेटर और एलेरॉन जैसे जैसे कंट्रोल सरफेस पर भी असर पड़ा. ऐसे में सवाल उठ रहा कि आखिर ये हाइड्रोलिक सिस्टम क्या होता है. फ्लाइट में इसका कितना बड़ा रोल होता है. इसके सिर्फ 4 सेकंड के लिए फेल होने से इतना भयानक टर्बुलेंस यानी झटके कैसे आ गए और अगर यह काम करना बंद कर दे, तो प्लेन के साथ क्या हो सकता है.
फ्लाइट में हाइड्रोलिक सिस्टम क्या होता है
अगर प्लेन का इंजन उसका दिल है, तो हाइड्रोलिक सिस्टम उसकी मांसपेशियां (Muscles) माना जाता है. सिंपल तरह से समझें तो हवा में उड़ते हुए प्लेन पर हवा का बहुत भारी दबाव होता है. ऐसे में पायलट के लिए सिर्फ अपने हाथों की ताकत से प्लेन के बड़े-बड़े पंखों (Wings) और अन्य हिस्सों को मोड़ना नामुमकिन है. यहीं हाइड्रोलिक सिस्टम काम आता है.
प्लेन को कंट्रोल करने वाले 3 सबसे अहम हिस्से
1. एलिवेटर (Elevator)
ये प्लेन की पूंछ (Tail) के पास होता है. इसका काम प्लेन के आगे वाले हिस्से (Nose) को ऊपर या नीचे करना होता है. मान लीजिए फ्लाइट का नोज ऊपर करना है. कंट्रोल सिस्टम एलिवेटर (Control System Elevator) को उसी हिसाब से मूव कराता है. इसी तरह नोज को नीचे करने की जरूरत होने पर एलिवेटर दूसरी दिशा में काम करता है. इस मूवमेंट का असर प्लेन के पिच पर पड़ता है. यानी प्लेन का अगला हिस्सा ऊपर जा रहा है या नीचे, इस मूवमेंट को समझने के लिए एलिवेटर बेहद जरूरी है.
2. एलरॉन (Aileron)
ये प्लेन के पंखों के किनारों पर होता है. जब प्लेन को हवा में लेफ्ट या राइट मुड़ना होता है, तो एलरॉन ही काम आता है. जब प्लेन को दाएं या बाएं मोड़ना होता है, तो एलरॉन की मूवमेंट इसमें अहम रोल निभाता है. जैसे, साइकिल का हैंडल घुमाने पर साइकिल दिशा बदलती है, प्लेन में डायरेक्शन बदलने की प्रोसेस कहीं ज्यादा कॉम्प्लेक्स है, लेकिन एलरॉन्स इसमें एक अहम हिस्सा हैं.
3. स्पॉइलर (Spoiler)
ये पंखों के ऊपर लगा होता है. जब प्लेन की स्पीड कम करनी होती है या उसे नीचे उतारना (लैंडिंग) होता है, तो स्पॉइलर हवा को रोककर ब्रेक का काम करता है. विमान जमीन पर उतरने के बाद स्पॉइलर लिफ्ट कम करने में मदद करते हैं, जिससे एयरक्राफ्ट का वजन व्हील्स (Wheels) पर बेहतर तरीके से आता है और ब्रेकिंग ज्यादा असरदार हो सकती है.
हाइड्रोलिक सिस्टम खराबी कैसे आती है
किसी एयरक्राफ्ट के हाइड्रोलिक सिस्टम में कई कंपोनेंट्स होते हैं, जैसे हाइड्रोलिक फ्लूइड, पंप्स, वॉल्व्स, पाइप्स, एक्यूरेटर्स और प्रेशर मॉनिटरिंग सिस्टम. अगर कहीं प्रेशर कम हो जाए या फ्लूइड की की समस्या आए, पंप या वॉल्व में खराबी हो या कोई सेंसर गलत रीडिंग दे, तो सिस्टम प्रभावित हो सकता है. इस मामले में शुरुआती एयरबेस असेसमेंट में हाइड्रोलिक प्रेशर स्विच यानी प्रशर सेंसर से जुड़ी समस्या का भी जिक्र सामने आया है.
क्या हाइड्रोलिक सिस्टम फेल होते ही प्लेन गिर जाएगा
नहीं, हाइड्रोलिक फेलियर और एयरक्राफ्ट क्रैश एक ही चीज नहीं हैं. प्लेन को इस तरह डिजाइन किया जाता है कि अलग-अलग सिस्टम में खराबी आने के बाद भी पायलट के पास एयरक्राफ्ट को कंट्रोल करने के कई तरीके और बैकअप सिस्टम्स मौजूद रहें. हर हाइड्रोलिक फेलियर का मतलब ये नहीं है कि विमान तुरंत कंट्रोल से बाहर हो जाएगा. लेकिन अगर एक साथ कई जरूरी हाइड्रोलिक फंक्शंस प्रभावित हों, तो सिचुएशन काफी चैलेंजिंग हो सकती है.
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