आज के समय में किसी भी देश की तरक्की को मापने का सबसे आम तरीका उसका GDP यानी सकल घरेलू उत्पाद माना जाता है, लेकिन ये तस्वीर पूरी तरह सही नहीं दिखाता. वजह ये है कि GDP सिर्फ ये बताता है कि देश में कितना प्रोडक्शन और कमाई हुई, लेकिन ये नहीं बताता कि इस विकास की कीमत पर्यावरण ने कितनी चुकाई. ऐसे में ग्रीन GDP की जरूरत सामने आती है, जो विकास के साथ-साथ पर्यावरण को हुए नुकसान का भी हिसाब रखता है और असली तस्वीर सामने लाता है.
सामान्य GDP से कैसे अलग है
सामान्य GDP में सिर्फ वस्तुओं और सेवाओं के उत्पादन को जोड़ा जाता है. अगर किसी देश में ज्यादा फैक्ट्रियां लगती हैं और उत्पादन बढ़ता है, तो GDP भी बढ़ जाती है. लेकिन ग्रीन GDP इससे एक कदम आगे सोचती है. ये सिर्फ ये नहीं देखती कि कितना सामान बना, बल्कि ये भी देखती है कि उसे बनाने में प्रकृति को कितना नुकसान हुआ. जैसे अगर फैक्ट्री चलाने से हवा गंदी हुई, पानी खराब हुआ या जंगल कटे, तो उस नुकसान को भी गिना जाता है. फिर इस नुकसान को कुल कमाई में से घटा दिया जाता है, ताकि असली विकास पता चल सके.
क्यों जरूरी है ग्रीन GDP
ग्रीन GDP हमें ये समझने में मदद करती है कि देश की आर्थिक तरक्की कितनी टिकाऊ है. कई बार तेज विकास के चक्कर में पर्यावरण को भारी नुकसान पहुंचता है, जिसका असर आगे चलकर पूरी अर्थव्यवस्था पर पड़ता है. ऐसे में ग्रीन GDP ये बताती है कि विकास सिर्फ आज के लिए नहीं, बल्कि आने वाले कल को ध्यान में रखकर होना चाहिए.
सस्टेनेबल डेवलपमेंट का अहम टूल
ग्रीन GDP को सस्टेनेबल डेवलपमेंट समझने का एक मजबूत तरीका माना जाता है. ये सरकार और पॉलिसीमेकर्स को ये समझने में मदद करता है कि विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए. इससे ये भी तय किया जा सकता है कि प्राकृतिक संसाधनों का इस्तेमाल समझदारी से हो, ताकि आने वाली पीढ़ियों के लिए भी वो सुरक्षित रहें.
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