Magh Mela Mughal Tax Story: प्रयागराज में माघ मेला चल रहा है. इस बार इसकी शुरुआत 3 जनवरी से हो चुकी है और 15 फरवरी यानी महाशिवरात्रि तक चलेगा. यह सिर्फ एक धार्मिक आयोजन नहीं है, बल्कि आस्था, इतिहास और परंपरा का संगम है. इस बार करीब 75 साल बाद महामाघ मेले का संयोग बना है. सनातन धर्म में माघ महीने को बेहद पवित्र माना गया है. मान्यता है कि इस महीने संगम में स्नान करने से पाप धुल जाते हैं और इंसान को पुण्य मिलता है. यही कारण है कि हर साल लाखों श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं. लेकिन क्या आप जानते हैं मुगलों के समय में माघ मेले पर टैक्स लगा दिया गया था. तब श्रद्धालुओं को काफी परेशानियां हुई थीं. जानिए क्या है कहानी..
माघ मेला कितना पुराना है
इतिहासकार मानते हैं कि माघ मेला 2000 से 2500 साल पुरानी परंपरा है. ऋग्वेद, ब्राह्मण ग्रंथ और पुराणों में माघ स्नान का खास महत्व बताया गया है. मौर्य काल में प्रयाग एक बड़ा धार्मिक केंद्र बन चुका था और तभी से हर साल माघ स्नान की परंपरा शुरू मानी जाती है. 7वीं सदी में चीन से आए यात्री ह्वेनसांग ने भी लिखा कि माघ महीने में संगम पर बहुत बड़ा स्नान और दान होता था, जिसमें राजा हर्ष खुद हिस्सा लेते थे.

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मुगलों ने माघ मेले पर टैक्स क्यों लगाया
मुगल बादशाह अकबर ने प्रयाग का नाम बदलकर इलाहाबाद रखा और वहां किला बनवाया. कहा जाता है कि 1575 में अकबर बीरबल के साथ माघ मेले में गया था. वहां हिंदुओं की भारी भीड़ देखकर उसे डर हुआ कि इतना बड़ा जमावड़ा किसी खतरे का कारण बन सकता है. इसी डर के चलते उसने माघ मेले पर टैक्स लगाने का आदेश दिया, लेकिन जैसे ही लोगों और साधु-संतों ने इसका विरोध किया, उसे अपना फैसला बदलना पड़ा और टैक्स हटा लिया गया. दिलचस्प बात यह है कि अकबर के दरबारी लेखक अबुल फजल ने अपनी किताब में प्रयाग को हिंदुओं का सबसे बड़ा तीर्थ बताया है. खासकर माघ मेले के समय को सबसे खास बताया है.

औरंगजेब ने भी कुछ परंपराओं पर रोक लगाई
अकबर के बाद औरंगजेब ने भी कुछ परंपराओं पर रोक लगाई. हालांकि, कहा जाता है कि औरंगजेब कभी भी नागा साधुओं को लेकर माघ मेले पर पाबंदियां नहीं लगाई, क्योंकि वे बेखौफ थे, फिर भी वह कुछ परंपराओं पर रोक लगाने की कोशिश की. इतिहासकार बताते हैं कि अकबर और औरंगजेब दोनों ने संगम तट पर लेटे हए हनुमान जी प्रतिमा वहां से हटाने की कोशिश की, लेकिन दोनों ही असफल रहे.
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