झारखंड के खूंटी और रांची के पठारी इलाके में खेती की चुनौतियों के बीच एक किसान ने ऐसा प्रयोग किया है, जिसकी चर्चा अब कृषि वैज्ञानिकों से लेकर सरकारी महकमों तक हो रही है. 43 वर्षीय किसान चैतन्य कुमार गंजू ने 2023 में आग से अपना पूरा बाग खो दिया था. लीची, आम, महोगनी और बेर के हजारों पेड़ जलकर राख हो गए. आर्थिक नुकसान के साथ भविष्य भी अंधेरे में नजर आने लगा. लेकिन एक साल बाद उन्होंने कांटारहित कैक्टस यानी स्पिनलेस कैक्टस की खेती शुरू की. आज उनकी नर्सरी हर साल करीब दो लाख पौधे तैयार कर रही है और झारखंड में जलवायु-अनुकूल खेती का नया मॉडल बनकर उभरी है. उनकी इस कहानी को केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह ने भी अपने सोशल मीडिया पोस्ट पर साझा की है. आइए जानते हैं उनके इस सफर के बारे में.
In 2020, Jharkhand farmer Chaitanya Kumar Ganjhu had ambitious plans for a 36-acre leased farm in Bichara village. The land had around 100 litchi, 300 mahogany and 900 mango trees, along with 1,200 Indian jujube trees that he had planted as part of his farming journey.
— Giriraj Singh (@girirajsinghbjp) August 18, 2026
But in… pic.twitter.com/KjUhsKI1as
आग ने छीन लिया था वर्षों का सपना
रांची से सटे बिचारा गांव में वर्ष 2020 में चैतन्य कुमार गंजू ने 36 एकड़ जमीन लीज पर लेकर एक बड़ा बाग विकसित करना शुरू किया था. खेत में करीब 100 लीची, 300 महोगनी और 900 आम के पेड़ थे. इसके अलावा उन्होंने 1,200 बेर के पेड़ भी लगाए थे. लेकिन वर्ष 2023 में अचानक लगी रहस्यमयी आग ने पूरे बाग को तबाह कर दिया. हजारों पेड़ जल गए और उनकी वर्षों की मेहनत राख में बदल गई. द बेटर इंडिया को दिए गए इंटरव्यू में चैतन्य गंजू बताया था कि "मुझे आज तक नहीं पता कि आग किसने लगाई. बीमा का दावा भी नहीं कर पाया क्योंकि पुलिस ने शिकायत दर्ज नहीं की. मेरे पास दावा साबित करने के लिए जरूरी दस्तावेज नहीं थे और मैं खाली हाथ लौट आया."
हार नहीं मानी, नई राह खोजी
आग के बाद खेत खाली पड़ा था. इसी दौरान वर्ष 2024 में चैतन्य गंजू ने केंद्र और राज्य सरकार की कैक्टस संवर्धन योजनाओं के बारे में जाना. उन्होंने इंटरनेट पर शोध शुरू किया और फिर इंटरनेशनल सेंटर फॉर एग्रीकल्चरल रिसर्च इन द ड्राई एरियाज (ICARDA) से संपर्क किया. गंजू के अनुसार "कैक्टस की खेती मेरे लिए बिल्कुल नई थी. रिसर्च के दौरान पता चला कि Opuntia ficus-indica से बायो-लेदर भी बनाया जा सकता है. सबसे बड़ी बात यह थी कि इसमें कांटे नहीं होते."

Spineless Cactus Farming: कैक्टस की खेती
मध्य प्रदेश से लाए 10 हजार पौधे; अब हर साल तैयार हो रहे दो लाख पौधे
काफी जानकारी जुटाने के बाद गंजू ने ICARDA के अमलाहा (मध्य प्रदेश) केंद्र से 10 हजार कैक्टस क्लैडोड खरीदे. प्रत्येक क्लैडोड की कीमत 10 रुपये थी. नवंबर 2024 में उन्होंने इन्हें 2.5 एकड़ जमीन पर लगाया. इसके साथ ही वह झारखंड में बड़े पैमाने पर स्पिनलेस कैक्टस की खेती करने वाले पहले किसान बन गए. आज चैतन्य गंजू की नर्सरी में करीब 25 किस्मों के स्पिनलेस कैक्टस उगाए जा रहे हैं. इनमें ब्राजील से लाई गई कई उन्नत किस्में शामिल हैं, जैसे Oretha de Elefante Africana, IPA-90-73, Copena V1, Mexica Folder-1278 और Additional-1258. गंजू का दावा है कि उनकी नर्सरी में हर साल लगभग दो लाख पौधे तैयार करने की क्षमता है.
ग्राफ्टिंग की जरूरत नहीं; जानिए ICARDA ने क्या कहा?
ICARDA की राष्ट्रीय सहयोगी वैज्ञानिक डॉ. नेहा तिवारी के मुताबिक, "गंजू भारत के एकमात्र किसान हैं जिन्होंने कैक्टस नर्सरी विकसित की है. हमने तकनीक और प्रशिक्षण दिया, लेकिन इस स्तर पर पहल सिर्फ उन्होंने की. आज वे झारखंड में स्वस्थ और रोगमुक्त स्पिनलेस कैक्टस उगा रहे हैं." वहीं ICARDA के दक्षिण एशिया एवं चीन क्षेत्रीय कार्यक्रम के प्रमुख डॉ. शिव कुमार अग्रवाल के अनुसार, "Opuntia ficus-indica में प्राकृतिक पुनर्जनन क्षमता बहुत अधिक होती है. इसलिए ग्राफ्टिंग की जरूरत नहीं पड़ती."
एक पौधे से छह से आठ पौधे
कैक्टस खेती का गणित भी आकर्षक है. गंजू बताते हैं, "एक क्लैडोड 10 रुपये का पड़ता है. उससे छह से आठ नए पौधे तैयार हो जाते हैं. कुल बिक्री लगभग 60 रुपये तक पहुंच जाती है. सभी खर्च निकालने के बाद करीब 25 रुपये का लाभ बचता है." पिछले वर्ष उन्होंने लगभग 30 हजार क्लैडोड और पौधे बेचे. पहले साल का लगभग तीन लाख रुपये का निवेश अब ब्रेक-ईवन स्तर पर पहुंच गया है.
60 ग्रामीण महिलाओं को मिला काम
नर्सरी में मांग बढ़ने के साथ रोजगार भी पैदा हुआ है. जब 30 हजार पौधों का बड़ा ऑर्डर मिला तो गंजू ने आसपास के गांवों की लगभग 60 महिलाओं को रोजगार दिया. ये महिलाएं पॉलीबैग तैयार करने, पौधों की देखभाल और नर्सरी प्रबंधन में मदद कर रही हैं. इससे खेती का यह मॉडल ग्रामीण आजीविका का भी माध्यम बन गया है.
पशुओं के चारे के रूप में भी उपयोगी
स्पिनलेस कैक्टस केवल व्यापारिक फसल नहीं है. गंजू अपने बकरियों को भी इसे खिलाते हैं. गर्मी के मौसम में जब हरा चारा कम पड़ जाता है, तब कैक्टस पौष्टिक विकल्प बन जाता है. एक्सपर्ट्स के अनुसार इसमें पर्याप्त पोषक तत्व और नमी होती है, जिससे पशुपालन को भी लाभ मिलता है.
‘5F' की फसल बन रहा कैक्टस
कृषि वैज्ञानिक स्पिनलेस कैक्टस को "5F Crop" कहते हैं. इसका उपयोग:
- Food (भोजन)
- Fodder (पशु चारा)
- Fuel (बायोगैस)
- Fertilizer (जैव उर्वरक)
- Fashion (बायो-लेदर)
में किया जा सकता है. डॉ. नेहा तिवारी के अनुसार, "यह फसल सूखा, खराब मिट्टी और तापमान में उतार-चढ़ाव सहन कर सकती है. इसलिए झारखंड जैसे वर्षा आधारित क्षेत्रों के लिए बेहद उपयुक्त है."
सरकार की योजना से बढ़ रहा अवसर
केंद्र सरकार विकसित भारत (Viksit Bharat) विजन के तहत स्पिनलेस कैक्टस को बढ़ावा दे रही है. झारखंड सरकार भी लगभग 400 हेक्टेयर क्षेत्र में करीब दो लाख कैक्टस पौधे लगाने की योजना पर काम कर रही है. गंजू को उम्मीद है कि भविष्य में सरकारी परियोजनाओं के लिए पौधों की आपूर्ति उनके जैसे किसानों के लिए बड़ा अवसर बनेगी. वे कहते हैं, "अगर इतने बड़े प्रोजेक्ट में पौधे लगेंगे तो उन्हें कहीं न कहीं से पौधे लेने होंगे. मैं चाहता हूं कि मेरी नर्सरी झारखंड की प्रमुख सप्लायर बने."
दूसरे किसानों के लिए बन रहे प्रेरणा
खूंटी जिले के रनियां गांव समेत कई इलाकों के किसान अब उनके मॉडल को अपनाने लगे हैं. पिछले साल करीब 15 किसान उनकी नर्सरी पहुंचे और पौधे लेकर गए. आज उनमें से कई किसान अपनी खेती में स्पिनलेस कैक्टस उगा रहे हैं.
राख से खड़ी हुई नई खेती
चैतन्य कुमार गंजू की कहानी सिर्फ एक किसान की सफलता नहीं है. यह उस जिद की कहानी है जिसने आपदा को अवसर में बदल दिया. एक आग ने उनका बाग छीन लिया, लेकिन उसी घटना ने उन्हें नए रास्ते पर चलने के लिए मजबूर किया. आज जिस जमीन पर कभी राख बिखरी थी, वहीं से झारखंड में भविष्य की खेती का नया मॉडल विकसित हो रहा है. कांटारहित कैक्टस की यह पहल न केवल किसानों की आय बढ़ाने का माध्यम बन रही है, बल्कि जलवायु परिवर्तन, बंजर भूमि और ग्रामीण रोजगार जैसी चुनौतियों का भी व्यावहारिक समाधान प्रस्तुत कर रही है.
यह भी पढ़ें : कौन हैं राेहन नायडू? जिन्होंने ‘ब्लैक होल स्टार' खोजा, 18 साल में इंजीनियरिंग छोड़ी, हैदराबाद से MIT तक पहुंचे
यह भी पढ़ें : कभी गरीबों का खाना था फिर मिली राजसी पहचान; नेपल्स से अंतरिक्ष तक 1000 साल से भी पुरानी है पिज्जा की कहानी
NDTV.in पर ताज़ातरीन ख़बरों को ट्रैक करें, व देश के कोने-कोने से और दुनियाभर से न्यूज़ अपडेट पाएं