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एक और 'युवराज'... नोएडा के बाद अब दिल्ली में खुले गड्ढे ने छीन ली एक जिंदगी, आखिर कब जागेगा सिस्टम?

दिल्ली के जनकपुरी में कमल और कुछ दिन पहले नोएडा सेक्टर‑150 में युवराज- दोनों की मौत एक जैसी लापरवाही के कारण हुई. दोनों ही मामलों में सड़क पर खुले गड्ढे छोड़े गए, कहीं बैरीकेड या चेतावनी नहीं थी, और हादसे के बाद ही गड्ढों को ढकने/पर्दे लगाने जैसे कदम उठाए गए. दोनों ही मामलों में सुरक्षा मानकों की पूरी अनदेखी हुई. दोनों हादसों में युवकों की जान बच सकती थी यदि गड्ढे सुरक्षित ढंग से बंद किए गए होते.

  • दिल्ली के जनकपुरी में कमल नामक युवक सड़क पर खुले गड्ढे में गिरने से मृत मिला, जहां कोई बैरीकेड नहीं था.
  • नोएडा सेक्टर 150 में एक प्राइवेट बिल्डर द्वारा खोदा गया गड्ढा भी बिना चेतावनी के खुला छोड़ दिया गया था.
  • दोनों मामलों में सुरक्षा व्यवस्था पूरी तरह नाकाफी थी, रात में गड्ढों के आसपास कोई रोशनी या साइन बोर्ड नहीं थे.

दिल्ली और नोएडा में कुछ ही दिनों के अंतराल पर दो युवकों की मौत एक जैसे हादसों में हुई. दोनों ही सड़क पर खुले छोड़े गए गड्ढों में गिरकर मारे गए. फर्क सिर्फ इतना कि एक गड्ढा सरकारी एजेंसी (दिल्ली जल बोर्ड) का था, और दूसरा प्राइवेट बिल्डर द्वारा खोदा गया था. लेकिन लापरवाही का पैटर्न एक जैसा है.

पहला मामला नोएडा सेक्टर 150 का था और अब दूसरा मामला दिल्ली के जनकपुरी का सामने आया है, जहां दिल्ली जल बोर्ड द्वारा खोदे गए गड्ढे में गिरकर कमल नाम के शख्स की जान चली गई. दोनों मौतें यह सवाल खड़ा करती हैं कि सड़क सुरक्षा किसकी जिम्मेदारी है और कब तक ऐसी मौतें होती रहेंगी?

आज का मामला: जनकपुरी, दिल्ली- कमल की मौत खुले गड्ढे में गिरने से

आज सुबह दिल्ली के जनकपुरी इलाके में कमल नाम के युवक का शव सड़क के खुले गड्ढे से निकाला गया. रात में अंधेरे में कमल को गहरा गड्ढा नज़र नहीं आया. गड्ढा खुला छोड़ दिया गया था, कोई बैरीकेड नहीं था. हादसे के बाद सुबह पर्दे लगाए गए, यानी सुरक्षा इंतजाम बाद में किए गए, पहले नहीं थे. 

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कौन था कमल?

रोहिणी के HDFC बैंक में नौकरी करता था. रोज 11 बजे तक शिफ्ट होती थी. घर वालों से आखिरी कॉल में बोला था कि जनकपुरी डिस्ट्रिक्ट सेंटर हूं, 10 मिनट में घर आ रहा हूं. परिजन रात भर उसकी तलाश में एक नहीं, बल्कि दर्जनभर थानों के चक्कर काटते रहे, लेकिन पुलिस ने कोई मदद नहीं की. सुबह करीब 7 बजे पुलिस ने फोन कर शव मिलने की सूचना दी. कमल के भाई ने बताया, 'ये साफ लापरवाही है, मंगोलपुर, रोहिणी, जनकपुरी समेत 7-8 थानों के चक्कर लगाए. दिल्ली पुलिस ने काफी मान-मनुहार के बाद मोबाइल फोन ट्रेसिंग के बाद कहा कि ये जनकपुरी के 200 मीटर के एरिया में लोकेशन है, ढूंढ़ सको तो खोज लो. फिर सुबह 6.30 बजे पुलिस ने फोन कर कहा कि उनका भाई गड्ढे में गिर गया है.

इस हादसे पर दिल्ली पुलिस ने कहा कि 12:30 AM- विकासपुरी थाने ने फोटो लेकर एक्सीडेंट कॉल चेक की. 2:30 AM- जनकपुरी थाने में मोबाइल टावर ट्रेस किया गया, जो घटना स्थल से 200 मीटर दूर था. फिर सुबह एक नागरिक ने PCR कॉल की, तब पुलिस को गड्ढे में बाइक और शरीर दिखा. फिर जाकर फायर डिपार्टमेंट ने शव बाहर निकाला.

समस्या यह है कि गड्ढा खुला क्यों था? बैरीकेड क्यों नहीं लगाए गए?

लोगों का आरोप है कि हादसा टाला जा सकता था.

नोएडा सेक्टर 150- युवराज की मौत भी खुले गड्ढे ने ली

कुछ दिन पहले नोएडा सेक्टर 150 में युवराज नाम के युवक की मौत भी ठीक इसी तरह हुई थी.

वहां एक प्राइवेट बिल्डर ने गड्ढा खोदा हुआ था. ना बैरीकेड, ना चेतावनी. युवक उसी में गिरकर मर गया. दरअसल 16 जनवरी की रात नोएडा के सेक्टर-150 में एक दर्दनाक हादसा हुआ था. सॉफ्टवेयर इंजीनियर युवराज मेहता की कार एक गहरे गड्ढे में गिर गई थी, जिससे उनकी मौत हो गई. एसआईटी (SIT) की जांच और नोएडा प्राधिकरण की रिपोर्ट में यह खुलासा हुआ कि वह गड्ढा नियमों का उल्लंघन करके खोदा गया था. इस मामले में पुलिस ने बिल्डर अभय कुमार को गिरफ्तार किया था. 

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युवराज जिस गड्ढे में गिरा था, वहां पानी भरा हुआ था. उसने कॉल करके अपने पिता को बुलाया और पुलिस भी आई. लेकिन घने कोहरे और काफी दूरी की वजह से खोजने वाले लोग युवराज को देख ही नहीं पाए. इस गड्ढे में गिरकर डूबने से युवराज की जान चली गई. 

दोनों ही मामलों में- एजेंसी अलग, लापरवाही एक जैसी 

1. सड़क पर खुला छोड़ा गया गड्ढा

दिल्ली: जल बोर्ड का गड्ढा खुला था
नोएडा: प्राइवेट बिल्डर का गड्ढा खुला था

2. बैरीकेडिंग, साइन बोर्ड, लाइट- कुछ भी नहीं

दोनों ही जगहों पर कोई बैरीकेड नहीं.
कोई चेतावनी बोर्ड नहीं.
रात में रोशनी नहीं.

3. मौत के बाद ‘कवर‑अप' जैसा वातावरण

जनकपुरी में सुबह हादसे के बाद पर्दे लगाए गए.
नोएडा में भी हादसे के बाद ही गड्ढे ढके गए.

4. जिम्मेदारी का धुंधला होना

हर बार एजेंसियां यह तय नहीं कर पातीं कि गड्ढा किस विभाग/कंपनी का था. सुरक्षा व्यवस्था किसे करनी थी.

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5. परिवारों की पीड़ा एक जैसी

नोएडा: परिवार ने कहा कि समय रहते बचाया जा सकता था.

दिल्ली: परिवार पूरी रात थानों में भटकता रहा और परिवार का कहना है कि पुलिस समय रहते सतर्क होती तो कमल को बचाया जा सकता था. 

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मंत्री ने शुरू की जांच 

दिल्ली के मामले में संबंधित क्षेत्र के मंत्री आशीष सूद ने तत्काल जांच के आदेश दिए हैं कि क्या यह दिल्ली जल बोर्ड की लापरवाही थी या किसी अन्य एजेंसी की जिम्मेदारी. लेकिन सवाल है ऐसी जांचें कितनी बार होंगी? और कितनी जानें जाने के बाद सुरक्षा मानक लागू होंगे?

दोनों ही मामले एक जैसी लापरवाही के हैं. दोनों मौतें एक ही तरह की नेग्लिजेंस, एक ही तरह के खुले गड्ढे, एक ही तरह की रात में अंधेरी सड़कें और एक ही तरह की चेतावनी के बिना चल रहा निर्माणकार्य की वजह से हुईं. 

सरकारी एजेंसी हो या निजी कंपनी. दोनों ने सुरक्षा के बुनियादी नियमों का पालन नहीं किया. और नतीजा ये हुआ कि दो नौजवानों की जान चली गई और दोनों परिवारों के लिए जीवनभर का दर्द दे गया. 

लेखक के बारे में
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सत्यम बघेल
chief sub editor
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