Berhampore News: पश्चिम बंगाल के बरहमपुर स्थित कांग्रेस कार्यालय में गुरुवार को आयोजित एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कांग्रेस के कद्दावर नेता अधीर रंजन चौधरी ने केंद्र सरकार को आड़े हाथों लिया. अधीर रंजन ने महिला आरक्षण बिल (नारी शक्ति वंदन अधिनियम) की टाइमिंग को लेकर गंभीर सवाल खड़े किए और इसे विपक्षी दलों के खिलाफ एक राजनीतिक हथियार बताया.
'चुनाव प्रचार पर पड़ेगा बुरा असर'
अधीर रंजन ने सीधे तौर पर कहा कि इस समय बिल लाए जाने से कांग्रेस को बड़ी तकलीफ हो रही है. उन्होंने कहा, 'पार्टी के सभी कद्दावर नेता इस वक्त चुनाव प्रचार में जुटे हुए हैं. अचानक संसद में बिल लाकर उन्हें वहां फंसा दिया गया है. अगर चार दिन लगातार संसद में चर्चा चलेगी, तो हमारे नेताओं का सदन छोड़ना नामुमकिन हो जाएगा. इससे हमारे चुनाव प्रचार पर बहुत बड़ा और बुरा असर पड़ सकता है.'
'कांग्रेस लाई थी मुद्दा, बीजेपी ने किया था विरोध'
क्रेडिट वॉर पर बोलते हुए अधीर रंजन ने याद दिलाया कि महिलाओं को 33 फीसदी आरक्षण देने का मुद्दा कांग्रेस पार्टी बहुत पहले लेकर आई थी. उन्होंने दावा किया कि उस समय बीजेपी ने ही इस बिल का कड़ा विरोध किया था, लेकिन आज वही सरकार इसका सारा श्रेय खुद लेना चाहती है. उन्होंने साफ कहा कि बिना नई जनगणना और सभी स्टेकहोल्डर्स को भरोसे में लिए परिसीमन का कोई भी कदम विपक्ष को स्वीकार नहीं होगा.
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क्या है परिसीमन का पूरा खेल?
बताते चलें कि महिला आरक्षण बिल (33%) को लेकर संसद में गहमागहमी है, लेकिन असली पेंच 'परिसीमन विधेयक' पर फंसा है. विपक्ष का मुख्य डर यह है कि अगर सरकार ने मनमाने ढंग से सीटों की सीमा तय की, तो उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे ज्यादा आबादी वाले राज्यों की सीटों में भारी उछाल आएगा. वहीं, दक्षिण भारतीय राज्यों को डर है कि जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर प्रदर्शन करने के बावजूद उनकी राजनीतिक ताकत कम हो जाएगी.
सरकार का '50% फॉर्मूला'
विपक्ष की इसी चिंता को दूर करने के लिए सरकार ने एक बीच का रास्ता निकाला है. सूत्रों की मानें तो सरकार का नया फॉर्मूला यह है कि लोकसभा में सभी राज्यों की सीटों की संख्या में एक समान 50 फीसदी की बढ़ोतरी की जाएगी. इसमें सबसे बड़ी राहत की बात यह है कि 2011 की जनगणना को राज्यों की आबादी का अनिवार्य आधार नहीं बनाया जाएगा. इसका मतलब यह है कि राज्यों के बीच सीटों का जो वर्तमान अनुपात है, वह वैसा ही बना रहेगा और किसी भी राज्य का हक नहीं मरेगा.
लोकसभा में अब होंगी 850 सीटें?
महिला आरक्षण को धरातल पर उतारने के लिए मोदी सरकार ने लोकसभा की कुल क्षमता को बढ़ाकर 850 करने का प्रस्ताव दिया है. इस नए ढांचे को कुछ इस तरह समझा जा सकता है. इनमें से 815 सीटें सीधे राज्यों के खाते में जाएंगी, जबकि बाकी 35 सीटें केंद्र शासित प्रदेशों के लिए होंगी. हर राज्य की सीटों में 50% की वृद्धि होने से तमिलनाडु, केरल और आंध्र प्रदेश जैसे दक्षिण भारतीय राज्यों का प्रतिनिधित्व कम नहीं होगा, बल्कि उनकी ताकत भी आनुपातिक रूप से बढ़ेगी.
55 साल का इंतजार
बता दें कि भारत में सीटों की संख्या पिछले 55 सालों से 1971 की जनगणना पर रुकी हुई है. यह रोक 2026 में खत्म हो रही है. नई संसद को भी इसी हिसाब से बनाया गया है कि वहां 800 से ज्यादा सांसद एक साथ बैठ सकें.
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