- अभिजीत दीपके को शांति भंग न करने का लिखित आश्वासन देकर 50 हजार रुपये के बॉन्ड पर रिहा किया गया
- सौरभ दास और आशुतोष रांका को बिना अनुमति प्रदर्शन करने और शांति भंग के आरोप में 5 दिन की न्यायिक हिरासत में हैं
- नेहा बोरा को पुलिस अधिनियम की धारा 65 के तहत हिरासत में लिया गया और स्थिति सामान्य होते ही रिहा कर दिया गया था
'कॉकरोच जनता पार्टी' (सीजेपी) के संस्थापक अभिजीत दीपके को शनिवार को कुछ शर्तों के साथ रिहा कर दिया गया. उन्हें शुक्रवार को कनॉट प्लेस में 'लहरा दो तिरंगा' मार्च में शामिल होने से पहले ही हिरासत में ले लिया गया था. रिहा होने के बाद, दीपके ने सीजेपी के अन्य दो नेताओं सौरभ दास और आशुतोष रांका की एक फोटो शेयर की और लिखा, "अब बस अपने भाइयों के आजाद होने का इंतजार है." दास और रांका पुलिस की मनाही के बावजूद प्रदर्शन करने और शांति भंग के आरोप में जेल में हैं. आखिर क्यों?
दीपके क्यों छूट गए?
शनिवार को दीपके को मंदिर मार्ग स्थित एक विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया गया. उन्हें 50,000 रुपये का बॉन्ड भरने और यह लिखित आश्वासन देने का आदेश दिया गया कि वे शांति भंग नहीं करेंगे. सुनवाई के तुरंत बाद वे मंदिर मार्ग पुलिस स्टेशन से बाहर आ गए.
अधिकारियों ने NDTV को बताया कि दीपके को रिहा करने का एक मुख्य कारण यह था कि वह कभी मार्च वाली जगह पर पहुंचे ही नहीं. सूत्रों के अनुसार, इसके विपरीत दास और रांका "मना किए जाने के बावजूद चुपके से जंतर-मंतर पहुंच गए और अशांति फैलाने की कोशिश की".

Photo Credit: ANI
ये दोनों मामले एक ही कानून के तहत सामने आए. पुलिस ने बताया कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 126 और 170 के तहत, शांति भंग करने के एक नए मामले में दीपके को औपचारिक रूप से गिरफ्तार किया गया था. धारा 170 पुलिस को किसी संज्ञेय अपराध को रोकने के लिए किसी व्यक्ति को गिरफ्तार करने का अधिकार देती है, और धारा 126 एक कार्यकारी मजिस्ट्रेट को शांति बनाए रखने के लिए बॉन्ड मांगने का अधिकार देती है. इनमें से किसी में भी किसी अपराध के लिए मुकदमा नहीं चलाया जाता है.
रांका और दास का केस गंभीर क्यों?
14 अक्टूबर को जब दास, रांका और सीजेपी के तीसरे सदस्य अजिंक्य शिंदे को विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया गया, तो उन पर भी यही प्रावधान लागू किए गए. दास और रांका को जेल भेज दिया गया, जबकि शिंदे को इस शर्त पर छोड़ दिया गया कि वह अगले छह महीने तक शांति भंग नहीं करेंगे.
सीजेपी की लीगल हेड रत्ना सिंह के अनुसार, दास-रांका-शिंदे मामले में इन तीनों पर बिना अनुमति कहीं घुसने, बॉन्ड की शर्तों का उल्लंघन करने और सरकारी कर्मचारी के काम में बाधा डालने के आरोप थे. दिल्ली पुलिस के एक प्रेस नोट के मुताबिक, विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट कोर्ट ने माना कि इस बात की "गंभीर आशंका" है कि अगर इन्हें रिहा किया गया, तो ये फिर से कानून तोड़ सकते हैं और दूसरों को भी ऐसा करने के लिए उकसा सकते हैं. दास और रांका को पांच दिन की न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया. शिंदे को 5,000 रुपये का पर्सनल बॉन्ड और जमानत देने के लिए कहा गया, और उन्हें छह महीने तक शांति बनाए रखने का पाबंद किया गया. दास और रांका की हिरासत रविवार, आज 18 अक्टूबर को खत्म हो रही है.
पुलिस ने बताया कि 13 अक्टूबर की सुबह, दास, रंका, शिंदे और CJP के 11 अन्य सदस्य कथित तौर पर एक निजी संपत्ति से होते हुए जंतर-मंतर पहुंचे. इससे दो दिन पहले, 11 अक्टूबर को दिल्ली पुलिस कमिश्नर अनुराग कुमार ने एक आदेश जारी कर इस जगह को निर्धारित प्रदर्शन स्थलों की सूची से हटा दिया था. पुलिस ने उन्हें रोकने की कोशिश की, लेकिन प्रदर्शनकारियों ने कथित तौर पर अधिकारियों के काम में बाधा डाली. इन सभी 14 लोगों को हिरासत में ले लिया गया.

इसके बाद तीनों को निवारक प्रावधानों के तहत गिरफ्तार कर लिया गया. पुलिस ने बताया कि उन्होंने इन तीनों के "सार्वजनिक व्यवस्था को बार-बार बिगाड़ने के कथित प्रयासों" और सोशल मीडिया पर दूसरों को भी ऐसा करने के लिए उकसाने की उनकी कोशिशों को ध्यान में रखा.
'बार-बार अपराध करने वाले' माना
दास और रांका को 'बार-बार अपराध करने वाले' माना गया. 10 अक्टूबर को राष्ट्रीय राजधानी में हुए एक विरोध प्रदर्शन के दौरान हिरासत में लिए जाने के बाद, इन दोनों ने 50,000 रुपये का एक साल का 'शांति बॉन्ड' भरा था. पुलिस सूत्रों के अनुसार, उन्होंने इस बॉन्ड का उल्लंघन करते हुए एक बार फिर BNSS की धारा 163 को तोड़ा है.
दीपके ने भी 10 अक्टूबर को एक साल का बॉन्ड भरा था. उस समय उन्हें दिल्ली हवाई अड्डे पर एक विमान के अंदर से हिरासत में लिया गया था और उनके खिलाफ शांति भंग करने का एक अलग मामला दर्ज किया गया था. शनिवार को रिहा होने के बाद अपनी पहली प्रतिक्रिया में, दीपके ने 'एक्स' (X) पर फिल्म 'वीर-ज़ारा' (2004) का एक दृश्य पोस्ट किया. इसमें शाहरुख खान का किरदार पाकिस्तानी जेल में 22 साल बिताने के बाद आजाद होकर बाहर आते हुए रो रहा है. उन्होंने इसके साथ लिखा, "24 घंटे तक बिना वाईफाई और फोन के रहने के बाद, जेल से बाहर निकलना कैसा लगता है."
नेहा बोरा को क्यों छोड़ा
शुक्रवार को 'ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन' (AISA) की अध्यक्ष नेहा बोरा को भी एहतियातन हिरासत में ले लिया गया. 2 अक्टूबर के बाद से उनके साथ ऐसा होने का यह कम से कम आठवां मामला है. यह घटनाक्रम ऐसे समय में हुआ है जब मतदाता सूची के विवादास्पद 'विशेष गहन पुनरीक्षण' (सर) और अन्य मुद्दों को लेकर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग करते हुए विरोध-प्रदर्शनों का दौर शुरू हो गया है. पुलिस ने बताया कि दिल्ली पुलिस अधिनियम की धारा 65 के तहत औपचारिकताएं पूरी होने के बाद, शनिवार तड़के बोरा को रिहा कर दिया गया.
दीपके के विपरीत, बोरा को मजिस्ट्रेट के सामने पेश नहीं किया गया. दिल्ली पुलिस अधिनियम की धारा 65 पुलिस को उन लोगों को हिरासत में लेने और वहां से हटाने का अधिकार देती है, जो पुलिस के निर्देशों का पालन करने से इनकार करते हैं या उनका विरोध करते हैं. ऐसी हिरासत तब खत्म हो जाती है जब स्थिति सामान्य हो जाती है, और इसके लिए कोई मामला दर्ज नहीं किया जाता है.

बोरा ने समाचार एजेंसी पीटीआई को बताया, "मुझे मंडी हाउस में हिरासत में लिया गया और पूरी रात (पुलिस स्टेशन में) सुबह 5 बजे तक रखा गया. आप (पुलिस) इस तरह की गैर-कानूनी हिरासत क्यों ले रहे हैं? हमारे देश में लंबे समय से ऐसा होता आ रहा है, और इस विरोध प्रदर्शन ने साफ कर दिया है कि इस तरह की हिरासतें हो रही हैं. इसने इस तरह की हिरासत के मामलों को सबके सामने ला दिया है. वे दावा करते हैं कि वे कानून-व्यवस्था का पालन करते हैं और नियमों के अनुसार काम करते हैं, लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हो रहा है."
बोरा ने हिरासत में लिए गए अन्य सभी प्रदर्शनकारियों को तुरंत रिहा करने की मांग की. जेएनयू के इस शोधार्थी ने ज्ञानेंद्र कुमार के इस्तीफे के साथ-साथ एसआईआर को खत्म करने की भी मांग की. पुलिस के अनुसार, कानून-व्यवस्था बनाए रखने और ट्रैफिक सुचारू रूप से चलाने के लिए शुक्रवार को लगभग 150 लोगों को हिरासत में लिया गया था. कनॉट प्लेस के सेंट्रल पार्क की घेराबंदी कर दी गई थी और वहां रैपिड एक्शन फोर्स के जवानों को तैनात किया गया था. इसके बावजूद, तिरंगा लिए हुए कुछ छोटे मार्च आगे बढ़े.
एसआईआर प्रक्रिया में कथित अनियमितताओं को लेकर सीजेपी, विपक्षी दलों, छात्र समूहों और नागरिक समाज संगठनों ने पूरे देश में विरोध प्रदर्शन किया है. चुनाव आयोग का कहना है कि उसके फैसलों को सुप्रीम कोर्ट की मंजूरी मिली हुई है. बीजेपी ने इन विरोध प्रदर्शनों को "विदेशी फंडिंग से चलने वाला" और "अराजकता फैलाने की कोशिश" करार दिया है.
यह भी पढ़ें-
NDTV.in पर ताज़ातरीन ख़बरों को ट्रैक करें, व देश के कोने-कोने से और दुनियाभर से न्यूज़ अपडेट पाएं