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अमित मालवीय खुद बीजेपी आईटी सेल छोड़ना चाहते थे?

बीजेपी में सोमवार को नितिन नवीन की टीम घोषित हो गई. इस बार बीजेपी ने अपना आईटी सेल हेड को बदल दिया है. अमित मालवीय की जगह दीपक महास्के को पार्टी ने नया हेड बनाया है.

अमित मालवीय खुद बीजेपी आईटी सेल छोड़ना चाहते थे?
अमित मालवीय (फाइल फोटो)
  • बीजेपी में अमित मालवीय की जगह दीपक महस्के को नया आईडी सेल हेड बनाया गया है
  • सूत्रों ने बताया कि मालवीय खुद भी पद छोड़ना चाहते थे
  • मालवीय ने भी आईडी सेल हेड के लिए कई नाम सुझाए थे
नई दिल्ली:

बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन की टीम के गठन में कई चौंकाने वाले फैसले हुए. इनमें सबसे अधिक चर्चा हो रही है बीजेपी के आईटी सेल प्रमुख पद से अमित मालवीय का हटना. तरह-तरह की बातें हो रही हैं कि आखिर उन्हें हटाने के पीछे क्या कारण है. इसे जेन जी के आंदोलन और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर बीजेपी को कांग्रेस तथा अन्य विपक्षी दलों से मिल रही कड़ी टक्कर से भी जोड़ कर देखा जा रहा है.
 

मालवीय ने ही सुझाए थे कई नाम 

हालांकि बीजेपी सूत्रों ने इन दावों से इनकार किया है. उनके अनुसार अमित मालवीय पिछले ग्यारह वर्षों से बीजेपी के सोशल मीडिया प्रभारी रहे हैं. केवल पिछले कुछ महीनों के घटनाक्रम को इससे जोड़ कर देखना एक फौरी विश्लेषण है जो सही नहीं है. वे केवल सोशल मीडिया और आईटी सेल के प्रभारी ही नहीं रहे बल्कि पश्चिम बंगाल के सह प्रभारी भी रहे हैं. सूत्रों के अनुसार अमित मालवीय स्वयं कई मौकों पर इच्छा प्रकट कर चुके थे कि उन्हें इस दायित्व से मुक्त किया जाए. 2019 और 2024 के लोक सभा चुनाव परिणाम आने के बाद उन्होंने शीर्ष नेतृत्व से इस बारे में बात की थी. नितिन नवीन के अध्यक्ष बनने के बाद भी वे अपनी भविष्य की भूमिका के बारे में चर्चा कर चुके थे. यहां तक कि उनकी जगह लेने वालों के बारे में भी पार्टी नेतृत्व से उनकी लंबी चर्चा हुई थी. सूत्रों का कहना है कि इनमें से कई नाम स्वयं अमित मालवीय द्वारा ही सुझाए गए हैं.

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इसलिए टीम नवीन में शामिल नहीं हो पाए 

ऐसे कई राजनीतिक कारण हैं जिनके चलते अमित मालवीय को नितिन नवीन की टीम में किसी अन्य भूमिका में जगह नहीं मिल सकी. जातीय और क्षेत्रीय समीकरणों की भी इसमें भूमिका रही है. वे उत्तर प्रदेश से आते हैं जहां अगले साल विधानसभा के चुनाव होने हैं. नवीन की टीम में दो महासचिव स्मृति ईरानी और हरीश द्विवेदी बनाए गए. रेखा वर्मा और तारिक मंसूर उपाध्यक्ष हैं. अमरपाल मौर्य पिछड़ा वर्ग मोर्चे के अध्यक्ष और कुंवर बासित अली अल्पसंख्यक मोर्चे के अध्यक्ष हैं. सह संगठन मंत्री शिवप्रकाश भी उत्तर प्रदेश से हैं. बीजेपी ने ब्राह्मणों को नुमाइंदगी देने के मकसद से हरीश द्विवेदी को महासचिव बनाया जो युवा मोर्चा में नितिन नवीन के साथ काम कर चुके हैं. ऐसे में अमित मालवीय जो स्वयं ब्राह्मण हैं, महासचिव के तौर पर एडजस्ट नहीं किया जा सकता था. वे इतने उम्रदराज नेता भी नहीं कि उन्हें राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाया जाता या फिर सचिव की जिम्मेदारी दी जाती. हालांकि सूत्रों के अनुसार भविष्य में उनकी क्या भूमिका होगी, अभी यह तय नहीं है. पिछले छह साल तक पश्चिम बंगाल के सह प्रभारी के रूप में उनका प्रदर्शन बेहद सराहनीय माना जाता है. खासतौर से एसआईआर में उन्होंने नीचे स्तर तक जाकर प्रभावी ढंग से काम किया था.

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बीजेपी नेताओं के अनुसार अमित मालवीय के आईटी और सोशल मीडिया सेल के प्रमुख रहते हुए पिछले एक दशक में कई उतार-चढ़ाव आए हैं. विरोधी उन पर विपक्षी दलों के नेताओं पर सुनियोजित ढंग से सोशल मीडिया पर हमले करने का आरोप लगाते हैं. वहीं बीजेपी नेताओं का कहना है कि बतौर आईटी सेल प्रमुख अमित मालवीय का दायित्व था कि वह न केवल पार्टी और सरकार की बातों को प्रमुखता से रखें बल्कि विपक्ष के हमलों को कुंद करें. इस काम को उन्होंने बखूबी निभाया भी. आंकड़े इस बात की गवाही भी देते हैं. गुजरात के मुख्यमंत्री रहते हुए नरेंद्र मोदी ने सबसे पहले सोशल मीडिया पर अपनी मौजूदगी को मजबूती से दर्ज कराया था. 2009 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार लाल कृष्ण आडवाणी ने भी सोशल मीडिया पर चुनाव प्रचार अभियान शुरू किया था. इस लिहाज से बीजेपी को सोशल मीडिया पर फर्स्ट मूवर एडवांटेज रहा था.

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2013 के शुरुआती डिजिटल दौर में बीजेपी ने बढ़त बना ली थी. तब एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर बीजेपी के लगभग 2 लाख से 3 लाख फॉलोअर्स थे. आज यह संख्या 2.3 करोड़ पहुंच चुकी है. वहीं कांग्रेस ने सोशल मीडिया पर देर से दस्तक दी. 2013 में उसके करीब पचास हजार से एक लाख फॉलोअर्स थे जो आज बीजेपी से करीब आधे यानी 1.1 करोड़ हैं. इसी तरह फेसबुक पर 2013 में बीजेपी के लगभग 15 लाख से 20 लाख लाइक्स/फॉलोअर्स थे आज लगभग 1.6 करोड़ हो चुके हैं. वहीं कांग्रेस के फेसबुक पर 2013 में लगभग 3 लाख से 5 लाख लाइक्स/फॉलोअर्स थे जो करीब 67 लाख हैं. यूट्यूब पर बीजेपी के आधिकारिक चैनल पर 2013 में बीस-तीस हजार सब्सक्राइबर ही थे जो आज करीब 63 लाख हो गए जबकि कांग्रेस के 48 लाख हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आज करीब 10 करोड़ से अधिक फॉलोअर्स हैं जबकि राहुल गांधी के लगभग 2.7 करोड़ फॉलोअर्स हैं. यहां यह ध्यान रखना जरूरी है कि 2013 में डिजिटल प्लेटफॉर्म पर ट्रैकिंग बहुत प्रभावी नहीं थी इसलिए अनुमानित आंकड़े दिए गए हैं. बीजेपी ने इंस्टाग्राम पर भी अपनी पकड़ मजबूत करनी शुरू की है. पार्टी के नई सोशल मीडिया टीम के सामने अब यह चुनौती रहेगी कि वह जेन जी को अपने पाले में लाए और उनसे संवाद करने के बेहतर तरीके ढूंढे.

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