पंजाब की राजनीति अब केवल मंचों, प्रेस कॉन्फ्रेंस और बड़ी रैलियों तक सीमित नहीं रह गई है. अब राजनीति तेजी से सड़कों पर उतर रही है. लगभग हर बड़ी राजनीतिक पार्टी यात्राओं, अभियानों, जनसभाओं और विधानसभा क्षेत्र स्तर पर लोगों तक पहुंचने की कोशिश कर रही है. सरकार अपने कामकाज को जनता के सामने रखना चाहती है, जबकि विपक्ष सरकार से सवाल पूछना चाहता है. किसान, बेरोजगारी, कानून-व्यवस्था, उद्योग और शासन जैसे मुद्दों के बीच राजनीतिक जगह बनाने की होड़ है.
अब पंजाब की इस राजनीतिक दौड़ में एक और यात्रा शामिल हो गई है बीजेपी की 'नशा मुक्त पंजाब यात्रा'. पहली नजर में इसका सीधा संदेश 'ड्रग्स' यानी नशे के खिलाफ लड़ाई है. लेकिन राजनीतिक रूप से इस यात्रा का मकसद इससे कहीं बड़ा हो सकता है.
बीजेपी की चार यात्राएं करीब चार हजार किलोमीटर की दूरी तय करेंगी. ये यात्राएं पंजाब की सभी 117 विधानसभा सीटों से होकर गुजरेंगी. ये यात्राएं 30 सितंबर को जलंधर में एक साथ खत्म होंगी. बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन ने 18 सितंबर को पठानकोट के माधोपुर से पहली यात्रा को हरी झंडी दिखाई थी. उम्मीद की जा रही है कि समापन समारोह में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह भी शामिल हों.
पंजाब में क्यों महत्वपूर्ण है 117 का आंकड़ा
यह सिर्फ पंजाब की 117 विधानसभा सीटों की संख्या भर नहीं है, जहां से बीजेपी के वाहन, नेता और झंडे गुजरेंगे. यह उस राजनीतिक बदलाव के लक्ष्य को भी दिखाता है, जिसे पार्टी 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले हासिल करना चाहती है.
बीजेपी ने कई दशक तक पंजाब में शिरोमणि अकाली दल की सहयोगी पार्टी के रूप में चुनाव लड़ा. अकाली दल के साथ गठबंधन में बीजेपी आम तौर पर 117 में से 20-25 विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ती थी. वहीं ग्रामीण और पंथक राजनीति में अकाली दल का प्रभाव ज्यादा था. यह व्यवस्था 2020 में दोनों दलों का गठबंधन टूटने के बाद खत्म हो गई.
अब बीजेपी नेतृत्व का कहना है कि अपने दम पर सभी 117 सीटों पर चुनाव लड़ने की तैयारी की जा रही है. पंजाब बीजेपी अध्यक्ष केवल सिंह ढिल्लों और पार्टी के प्रदेश प्रभारी सतीश पूनिया भी सार्वजनिक रूप से यह बात दोहरा चुके हैं. हालांकि, अकाली दल और बीजेपी के बीच संभावित गठबंधन को लेकर समय-समय पर बातचीत की खबरें भी आती रही हैं.
इसलिए इस यात्रा को देखते हुए बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि क्या बीजेपी पंजाब में कुछ मजबूत इलाकों वाली पार्टी से बदलकर पूरे राज्य में मजबूत संगठन वाली पार्टी बन सकती है?
बीजेपी के लिए अवसर और चुनौतियां
आइए बीजेपी के सामने मौजूद अवसर और चुनौती को आंकड़ों के जरिए समझते हैं.
2022 के पंजाब विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने 73 सीटों पर चुनाव लड़ा था. उसे सिर्फ दो सीटों पर जीत मिली. उसे पंजाब में 6.6 फीसद वोट मिले. इसके दो साल बाद 2024 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने पंजाब की सभी 13 सीटों पर अकेले चुनाव लड़ा. उसका वोट शेयर बढ़कर करीब 18.5 फीसद हो गया. हालांकि पार्टी एक भी लोकसभा सीट नहीं जीत पाई. लेकिन 24 विधानसभा सीटों पर वह पहले नंबर पर रही.
बीजेपी का वोट बढ़ा है, लेकिन अभी यह साबित नहीं हुआ है कि वह इन वोटों को सीटों में बदल सकती है. विधानसभा चुनाव में यह चुनौती और मुश्किल हो जाती है. लोकसभा चुनाव में राष्ट्रीय मुद्दों, केंद्रीय नेतृत्व और कई विधानसभा क्षेत्रों में एक साथ वोटों के ध्रुवीकरण का फायदा मिल सकता है. लेकिन विधानसभा चुनाव में मुकाबला ज्यादा स्थानीय होता है.
गांवों में पार्टी का उम्मीदवार कौन है? बूथ कौन संभालता है? कौन सा स्थानीय नेता किसान के घर जाकर अपनी बात सुना सकता है? स्थानीय विवाद होने पर किसी समुदाय में किस नेता की बात पर भरोसा किया जाता है? और सबसे महत्वपूर्ण बात—क्या राष्ट्रीय नेता और प्रचार वाहन वहां से चले जाने के बाद भी पार्टी का संगठन जमीन पर सक्रिय रहता है?
इसलिए पंजाब के ग्रामीण इलाकों में बीजेपी के विस्तार की कोशिश पर ध्यान देना जरूरी है.
नई बीजेपी बनाम पुरानी बीजेपी
केवल सिंह ढिल्लों के नेतृत्व में प्रदेश बीजेपी ने जिला, मंडल और गांव स्तर तक संगठन और टीमें बनाने की बात कही है. ढिल्लों ने किसानों के कल्याण, उद्योगों को फिर से मजबूत करने और नशे की समस्या को भी प्रमुख मुद्दा बनाया है. उन्होंने कहा है कि बीजेपी की सरकार बनने पर केंद्र की ओर से सूचीबद्ध फसलों पर एमएसपी सुनिश्चित की जाएगी. उन्होंने फसल विविधीकरण और किसानों के लिए प्रोत्साहन की भी बात की है.
इन सबसे पता चलता है कि बीजेपी को अपने राजनीतिक रूप से कमजोर क्षेत्रों का अंदाजा है.
पंजाब की राजनीति पर सिर्फ शहरों के जरिए पकड़ नहीं बनाई जा सकती. राज्य में बहुमत पाने की कोशिश करने वाली किसी भी पार्टी के लिए गांवों, किसानों, कृषि अर्थव्यवस्था और सिख सामाजिक जीवन से गंभीरता से जुड़ना जरूरी है. और यहीं से नशे का मुद्दा फिर सामने आता है.
नशे की समस्या राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण इसलिए है, क्योंकि कई पंजाबियों के लिए यह सिर्फ राजनीति का मुद्दा नहीं है, बल्कि निजी जिंदगी से जुड़ी समस्या है. यह उस माता-पिता का डर है जो अपने बेटे को नशे की लत में फंसते हुए देखते हैं. यह वह परिवार है जो इलाज और नशा मुक्ति के लिए पैसा खर्च करता है. यह उस युवा की जिंदगी है जिसके कई महत्वपूर्ण साल नशे की वजह से बर्बाद हो जाते हैं.
इसके साथ पुलिस व्यवस्था, नशे की तस्करी, संगठित अपराध, सीमा पार से तस्करी, स्वास्थ्य सुविधाएं और रोजगार जैसे सवाल भी जुड़े हैं. इसलिए नशे के खिलाफ अभियान चलाना आसान है, लेकिन इस समस्या को पूरी तरह खत्म करना बेहद मुश्किल है.
पंजाब में कितनी बड़ी है नशे की समस्या
माधोपुर में नितिन नबीन ने नशे के खिलाफ पांच सूत्रीय रणनीति बताई. इसमें नशा तस्करों के खिलाफ कार्रवाई, देश और विदेश से आने वाली नशे की सप्लाई चेन को तोड़ना, नशे के पैसे से खरीदी गई संपत्तियों को जब्त करना, इलाज और मानसिक पुनर्वास और शिक्षकों, डॉक्टरों, धार्मिक संगठनों, खिलाड़ियों और युवा संगठनों को अभियान से जोड़ना शामिल है.उन्होंने नशे के खिलाफ लड़ाई को शिक्षा, अवसर और रोजगार से भी जोड़ा.
ये सभी महत्वपूर्ण पहलू हैं. लेकिन पंजाब पहले भी नशे के खिलाफ बड़े-बड़े वादे सुन चुका है. इसलिए बीजेपी के सामने सवाल सिर्फ यह नहीं होना चाहिए कि नशे के खिलाफ सबसे ज्यादा जोरदार तरीके से कौन बोलता है? सवाल यह होना चाहिए कि कौन इस समस्या का नतीजा दिखाने वाला समाधान दे सकता है? कितने बड़े नशा तस्करी नेटवर्क खत्म किए गए?

नशे की सप्लाई कहां से आ रही है? अलग-अलग राज्यों के बीच पुलिस और एजेंसियों का तालमेल कितना प्रभावी है? कितने लोग नशामुक्ति केंद्रों में इलाज पूरा करने के बाद दोबारा नशे की चपेट में नहीं आते हैं? नशा मुक्ति केंद्र से बाहर आने के बाद नशे की लत से जूझ रहे व्यक्ति के लिए क्या व्यवस्था है? उन युवाओं के लिए रोजगार, कौशल विकास, खेल सुविधाएं और दूसरे अवसर कहां हैं, जो नशे के प्रति ज्यादा संवेदनशील हैं?
पंजाब में बीजेपी के सामने मौजूद राजनीतिक सवाल
बीजेपी को एक राजनीतिक सवाल का भी सामना करना पड़ेगा. आम आदमी पार्टी ने बीजेपी के अभियान पर सवाल उठाते हुए 2007 से 2017 के बीच के उस दौर का उल्लेख किया है, जब बीजेपी और शिरोमणि अकाली दल की सरकार थी. उस समय भी पंजाब में नशे की समस्या एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा थी.
सत्तारूढ़ पार्टी ने सीमा पार से होने वाली नशे की तस्करी के मुद्दे पर केंद्र सरकार की जिम्मेदारी की ओर भी इशारा किया है, क्योंकि अंतरराष्ट्रीय सीमा की सुरक्षा केंद्र की एजेंसियों की जिम्मेदारी के तहत आती है.
ये राजनीतिक तर्क हैं, लेकिन इनसे यह सवाल जरूर उठता है कि नशे की पूरी समस्या की जिम्मेदारी किसी एक सरकार या एक संस्था पर डाली जा सकती है या नहीं. पंजाब की नशे की समस्या प्रशासन की अलग-अलग सीमाओं से जुड़ी है, केंद्र और राज्य सरकार, पुलिस और स्वास्थ्य विभाग, नशे की तस्करी रोकने वाली एजेंसियां और पुनर्वास व्यवस्था, सीमा पार से जुड़े तस्करी नेटवर्क और देश के अंदर नशे की सप्लाई करने वाले नेटवर्क.
बीजेपी के सामने एक और चुनौती उसकी अपनी पार्टी के संगठन से जुड़ी है. पंजाब बीजेपी में हाल में हुए बदलावों से पार्टी के पारंपरिक कार्यकर्ताओं के एक वर्ग में असंतोष की खबरें सामने आई हैं. कुछ नेताओं ने दूसरी पार्टियों से बीजेपी में आए नेताओं के बढ़ते प्रभाव पर सवाल उठाए हैं. ढिल्लों ने इन शिकायतों को स्वीकार किया है, लेकिन उन्होंने 'पुरानी बीजेपी' और 'नई बीजेपी' के बीच अंतर को खारिज किया है.
आगे चलकर यह बीजेपी के लिए महत्वपूर्ण परीक्षा बन सकती है. दूसरी पार्टियों से आए नेताओं को शामिल करने से किसी पार्टी का राजनीतिक प्रभाव बढ़ सकता है. इससे पहचान वाले चेहरे, स्थानीय नेटवर्क और चुनावी अनुभव भी मिल सकता है.
लेकिन किसी भी चुनावी संगठन की असली ताकत उसके कार्यकर्ताओं से बनी रहती है.
पंजाब में बीजेपी को जमीन पर क्या करना होगा
117 विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ने वाली पार्टी को केवल 117 अच्छे उम्मीदवारों की जरूरत नहीं होती. उसे हजारों बूथ स्तर के कार्यकर्ता, स्थानीय प्रभाव रखने वाले लोग, सामाजिक नेटवर्क और ऐसे कार्यकर्ताओं की जरूरत होती है जो किसी बड़े नेता के वहां नहीं होने पर भी सक्रिय रहें.

बीजेपी को पंजाब में जमीनी स्तर पर अपनी मौजूदगी दर्ज कराने के लिए संगठन विस्तार और कार्यकर्ताओं की फौज खड़ी करने पर ध्यान देना होगा.
Photo Credit: PTI
इस वजह से 'नशा मुक्त पंजाब यात्रा' की असली परीक्षा सिर्फ इस बात से नहीं होगी कि रास्ते में कितनी बड़ी भीड़ जुटती है या कितनी तस्वीरें सामने आती हैं.
ज्यादा महत्वपूर्ण सवाल 30 सितंबर के बाद सामने आएगा. जब यात्रा किसी शहर या गांव से होकर गुजर जाएगी, तब वहां क्या बचेगा? कोई पोस्टर? कोई नारा? कुछ नए पार्टी कार्यकर्ता? या फिर एक ऐसा संगठन, जो 2027 के चुनाव से पहले बार-बार उसी मतदाता तक पहुंच सके?
2022 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी का वोट शेयर 6.6 फीसद से बढ़कर 2024 के लोकसभा चुनाव में 18.5 फीसद हो गया. इससे पार्टी के राजनीतिक आंकड़ों में बदलाव जरूर आया है. लेकिन केवल वोट शेयर के आंकड़ों से चुनाव नहीं जीते जाते.
पंजाब में बीजेपी के सामने यह परीक्षा होगी कि बढ़ा हुआ वोट ग्रामीण विधानसभा क्षेत्रों तक कितना पहुंचता है, उन सामाजिक वर्गों में पार्टी की पहुंच कितनी बढ़ती है, जहां उसका प्रभाव पहले कम रहा है और बूथ स्तर तक उसका संगठन कितना मजबूत होता है.
बीजेपी की 'नशा मुक्त पंजाब' यात्रा करीब चार हजार किलोमीटर की दूरी तय करेगी. लेकिन बीजेपी के लिए 23 सीटों से 117 सीटों तक पहुंचने की राजनीतिक दूरी इससे कहीं ज्यादा लंबी है. और यही यात्रा, रोड शो से आगे की यात्रा 2027 से पहले पंजाब की राजनीति में देखने वाली असली कहानी हो सकती है.
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