- हाई कोर्ट ने वांगचुक को सफदरजंग अस्पताल से मेदांता अस्पताल में शिफ्ट करने की पत्नी की मांग खारिज कर दी है
- वांगचुक की पत्नी गीतांजलि जे. आंग्मो ने इस मामले में दूसरी राय और अस्पताल बदलने की अनुमति मांगी थी
- कपिल सिब्बल ने वांगचुक के शरीर पर उनकी अपनी इच्छा के मुताबिक अस्पताल चुनने का अधिकार बताया है
तीन सप्ताह से अनशन कर रहे सोनम वांगचुक को सफदरजंग अस्पताल की बजाय मेदांता में शिफ्ट किए जाने की मांग को दिल्ली हाई कोर्ट ने खारिज कर दिया है. यह अर्जी वांगचुक की पत्नी गीतांजलि जे. आंग्मो ने दायर की थी. इस अर्जी पर कपिल सिब्बल ने गीतांजलि की ओर से दलीलें दीं और माय बॉडी माय चॉइस वाला सवाल भी उठा दिया. उन्होंने कहा कि सोनम वांगचुक का शरीर है और उन्हें हक है कि वह अपनी बॉडी किस अस्पताल और डॉक्टर की निगरानी में रखा चाहते हैं. पूरी सुनवाई के दौरान सरकार और वांगचुक की पत्नी के पक्ष की ओर से मजेदार दलीलें सुनने को मिलीं.
कपिल सिब्बल ने कहा कि आखिर सरकार कैसे उनके शरीर पर नियंत्रण कर सकती है. इस पर दिल्ली हाई कोर्ट में अडिशन सॉलिसिटर जनरल ने आपत्ति जताई. उन्होंने कहा कि ऐसा कुछ भी नहीं है. सोनम वांगचुक की परमिशन के बिना उन्हें कुछ भी नहीं दिया जा रहा है. सिब्बल ने उनकी सेहत की चिंता पर सरकार की बात पर भी जवाब दिया. सरकार का कहना था कि वांगचुक की सेहत सही नहीं है. किडनी को खतरा था. इस पर कपिल सिब्बल ने दलील दी कि इससे पहले वह 30 दिन तक लद्दाख में अनशन कर चुके हैं. इसका जवाब अदालत ने देते हुए कहा कि कब कैसे बॉडी रिएक्ट करती है, यह हम नहीं जानते.
किसी हिरासत में नहीं हैं वागंचुक, निजी अस्पताल क्यों ले जाना है? HC का सवाल
अदालत ने कहा कि हमें इस मामले को व्यापक सोच के तहत देखना चाहिए. सोनम वांगचुक किसी तरह की हिरासत में नहीं हैं. उनकी पत्नी, भाई और अन्य पारिवारिक सदस्यों को उनसे मिलने की अनुमति है. वे कभी भी उनसे मुलाकात कर सकते हैं. अदालत ने यह भी सवाल किया कि आखिर निजी अस्पताल में ही ले जाने की जरूरत क्या है? सफदरजंग अस्पताल की व्यवस्था पर आप लोगों को भरोसा क्यों नहीं है. इस पर कपिल सिब्बल ने कहा कि हम सेकेंड ओपिनियन लेना चाहते हैं. हम अपनी पसंद का डॉक्टर और अस्पताल चाहते हैं. गीतांजलि ने कहा कि सफदरजंग अस्पताल ने हमारा भरोसा तोड़ा है.
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ASG बोले- राष्ट्रपति का भी होता है, सरकारी अस्पताल में इलाज
इस दलील पर सरकार की ओर से एएसजी ने तुरंत जवाब दिया और कहा कि राष्ट्रपति तक का इलाज सरकारी अस्पताल में ही होता है. इसके अलावा यह भी कहा कि हम पहले ही कह चुके हैं कि वांगचुक के परिवार के साथ रिपोर्ट्स शेयर की जाएंगी. सरकार की इन दलीलों से अदालत भी संतुष्ट दिखी. दोनों पक्षों को सुनने के बाद कोर्ट ने कहा कि वांगचुक को अस्पताल में रखना मनमाना नहीं है. बेंच ने कहा कि इस मामले में कोई भी अंतिम फैसला मेडिकल टीम द्वारा ही लिया जाएगा. उनका इलाज वही कर रहे हैं और वे ही सही स्थिति का आकलन करके फैसला लेंगे.
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