- ट्रांसजेंडर संशोधन विधेयक 2026 में ट्रांसजेंडर की परिभाषा को सीमित किया गया है जिससे कई लोग बाहर हो जाएंगे
- ट्रांसजेंडर समुदाय और विपक्षी नेताओं ने विधेयक को संसद की स्थायी समिति को भेजने का सुझाव दिया है
- ट्रांसजेंडरों के अधिकार कमजोर होने की आशंका व्यक्त करते हुए विपक्ष ने विधेयक वापस लेने की मांग की है
ट्रांसजेंडर विधेयक भारत में ट्रांसजेंडर समुदाय के अधिकारों की रक्षा और उनके सशक्तीकरण के लिए एक महत्वपूर्ण कदम है. ट्रांसजेंडर (अधिकारों का संरक्षण) संशोधन विधेयक 2026 हाल ही में संसद में पेश किया गया है, जिसमें 'ट्रांसजेंटरों ' की परिभाषा में बदलाव किया जा रहा है. संसद से सड़क तक इसका विरोध शुरू हो गया है. विपक्षी सांसदों और ट्रांसजेंडर अधिकार कार्यकर्ताओं ने रविवार को सरकार से ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) संशोधन विधेयक, 2026 को वापस लेने की मांग की. उनका कहना है कि प्रस्तावित संशोधन से ट्रांसजेंडर समुदाय के अधिकार कमजोर हो सकते हैं. क्या है इस ट्रांसजेंडर विधेयक का मकसद और क्यों हो रहा इसका विरोध आइए आपको बताते हैं.
क्या है ट्रांसजेंडर विधेयक का मकसद
ट्रांसजेंडर विधेयक को वापस लेने की मांग प्रेस क्लब ऑफ इंडिया में आयोजित एक जन सुनवाई में की गई, जहां ट्रांसजेंडर लोगों पर इसके संभावित प्रभाव को लेकर चिंता जताई. सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्री वीरेंद्र कुमार ने 13 मार्च को लोकसभा में ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) संशोधन विधेयक पेश किया था. इस विधेयक का मकसद उद्देश्य 'ट्रांसजेंडर' शब्द की सटीक परिभाषा देना है. यह प्रस्तावित कानून के दायरे से 'विभिन्न यौन अभिरूचि और स्वयं-निर्धारित लैंगिक पहचान' को बाहर रखने का भी प्रावधान करता है.

ट्रांसजेंडर विधेयम में क्या-क्या प्रावधान?
- आत्म-पहचान का अधिकार समाप्त: ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को अब अपनी पहचान खुद तय करने का अधिकार नहीं होगा.
- मेडिकल सर्टिफिकेशन अनिवार्य: ट्रांसजेंडर पहचान के लिए मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट आवश्यक होगी.
- सख्त सजा: ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के खिलाफ अपराधों के लिए सख्त सजा हो सकती है.
- परिभाषा में बदलाव: ट्रांसजेंडर व्यक्ति की परिभाषा को सीमित किया गया है, जिसमें केवल कुछ विशेष सामाजिक-सांस्कृतिक समूहों के व्यक्तियों को शामिल किया गया है.
क्यों हो रहा ट्रांसजेंडर विधेयक का विरोध?
नए ट्रांसजेंडर विधेयक में 'ट्रांसजेंडर' की परिभाषा को सीमित किया गया है, यही इसके विरोध का प्रमुख कारण है. इसमें कहा गया है कि जो लोग अपनी यौन अभिवृत्ति (सेक्सुअल ओरिएंटेशन) या अपनी पहचान (जेंडर आइडेंटिटी) को खुद महसूस करते हैं, उन्हें ट्रांसजेंडर नहीं माना जाएगा. इसे आप ऐसे भी समझ सकते हैं कि अगर कोई व्यक्ति अपनी यौन अभिवृत्ति या जेंडर आइडेंटिटी को खुद तय करता है, तो उसे ट्रांसजेंडर नहीं माना जाएगा. इसका मतलब है कि ट्रांसजेंडर की परिभाषा अब केवल कुछ खास लोगों तक सीमित कर दी गई है, जो पहले से ही इस श्रेणी में आते हैं. ऐसे में खुद को ट्रांसजेंडर मानने वाले लाखों लोग इस कैटेगरी से बाहर हो जाएंगे. इसीलिए इस विधेयक का विरोध हो रहा है.

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सबसे पहले इंसान को इंसान समझें
कांग्रेस नेता संदीप दीक्षित ने कहा कि विधेयक को संसदीय स्थायी समिति को भेजा जाना चाहिए. उन्होंने रेखांकित किया कि व्यक्तियों का सम्मान किया जाना चाहिए, इसे राज्य और सरकार का कर्तव्य बताया. दीक्षित ने कहा कि व्यक्तियों को सर्वप्रथम मनुष्य के रूप में मान्यता देने की आवश्यकता है. उन्होंने कहा, 'हमारे समाज में पहचान पर अक्सर बार-बार हमला किया जाता है. राज्य और संस्थाओं को सर्वप्रथम प्रत्येक व्यक्ति को मनुष्य के रूप में, और फिर नागरिक के रूप में मानना चाहिए.' कांग्रेस की राज्यसभा सदस्य रेणुका चौधरी ने कहा कि समुदाय प्रस्तावित परिवर्तनों का विरोध करना जारी रखेगा और अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करेगा. ट्रांसजेंडर अधिकार कार्यकर्ता ग्रेस बानू ने मान्यता और गरिमा के लिए लंबे समय से चले आ रहे संघर्ष को रेखांकित करते हुए कहा कि प्रस्तावित बदलाव वर्षों की प्रगति को कमजोर करते हैं.
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