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Exclusive : क्या है सिलीगुड़ी कॉरिडोर की वो भौगोलिक मजबूती, जिसे दुनिया 'चिकन नेक' के नाम से जानती है

भारत और बांग्लादेश के संबंधों पर हाल ही की घटनाओं का गहरा असर पड़ा है. यह असर केवल मित्रता पर नहीं, बल्कि व्यापार पर भी दिखाई दे रहा है. पहले भारत से पत्थर (boulders) सहित कई प्रकार का सामान बड़ी मात्रा में बांग्लादेश भेजा जाता था और यहां से ट्रकें लंबी कतारों में पार होती थीं, लेकिन अब स्थिति बदल गई है.

Exclusive : क्या है सिलीगुड़ी कॉरिडोर की वो भौगोलिक मजबूती, जिसे दुनिया 'चिकन नेक' के नाम से जानती है
  • सिलीगुड़ी कॉरिडोर या चिकन नेक भारत की मुख्यभूमि को पूर्वोत्तर से जोड़ने वाला संकरा इलाका है.
  • सीमा सुरक्षा के लिए बाड़ को जंगरोधी, कट-रोधी और चढ़ाई-रोधी बनाया गया है जिसकी ऊंचाई नौ फीट तक बढ़ाई गई है.
  • चिकन नेक से पूर्वोत्तर राज्यों में भोजन, दवाइयां और निर्माण सामग्री की सप्लाई होती है.
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cभारत के नक्शे पर सिलीगुड़ी कॉरिडोर, जिसे अपनी बनावट के कारण 'चिकन नेक' भी कहा जाता है, सामरिक दृष्टि से सबसे संवेदनशील और महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है. पश्चिम बंगाल में स्थित यह संकरा इलाका मात्र 20 से 22 किलोमीटर चौड़ा है, जो भारत के शेष हिस्से को पूर्वोत्तर के आठ राज्यों (नॉर्थ-ईस्ट) से जोड़ता है. सुरक्षा एजेंसियों और कूटनीतिक हलकों में इसकी अहमियत का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि यदि यह संपर्क टूट जाए, तो मुख्य भारत का उत्तर-पूर्वी राज्यों से जमीनी जुड़ाव पूरी तरह कट सकता है.वर्तमान में यह गलियारा एक बार फिर चर्चा के केंद्र में है, जिसका मुख्य कारण बांग्लादेश में जारी राजनीतिक अस्थिरता और वहां से आने वाली उकसावे वाली बयानबाजी है. हाल ही में नॉर्थ-ईस्ट के मुख्यमंत्रियों ने इस मुद्दे पर एक सुर में कड़ा रुख अपनाते हुए सख्त राजनीतिक संदेश दिया है. ऐसे में हमारी विशेष रिपोर्ट में चिकन नेक के हर पहलू को विस्तार से बात करेंगे.

चिकन नेक... भारत की मुख्यभूमि को पूर्वोत्तर भारत से जोड़ने वाली जीवनरेखा

चिकन नेक या सिलीगुड़ी कॉरिडोर... यह वह इलाका है जो केवल 60 किलोमीटर लंबा और लगभग 22 किलोमीटर चौड़ा है. लेकिन इसके साथ जुड़ी है वह नस, जिसे भारत की मुख्यभूमि को पूर्वोत्तर भारत से जोड़ने वाली जीवनरेखा कहा जाता है. इस क्षेत्र पर सबकी नजर इसलिए रहती है, क्योंकि माना जाता है कि यदि इस दुखती रग पर किसी ने दबाव डाल दिया, तो भारत को गंभीर परेशानी हो सकती है.

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इन सबके बीच वे सैन्य ताकतें—सेना, बीएसएफ, एसएसबी, आईटीबीपी और अन्य बल—लगातार तैनात रहती हैं, ताकि भारत की सीमाएं सुरक्षित रहें. अब सीमा की सुरक्षा को और मज़बूत करने के लिए बाड़ को भी बदला जा रहा है, जिसे जंगरोधी, कट-रोधी और चढ़ाई-रोधी बनाया जा रहा है. इससे सीमा सुरक्षा कई गुना बढ़ गई है.

चिकन नेक क्यों महत्वपूर्ण

दरअसल, चिकन नेक को महत्वपूर्ण इसलिए माना जाता है क्योंकि यदि यहां किसी भी प्रकार की हलचल या समस्या उत्पन्न हुई, तो मुख्यभूमि भारत का पूर्वोत्तर से संपर्क प्रभावित हो सकता है. यही कारण है कि इसके आसपास स्थित चारों देश—भूटान, नेपाल, बांग्लादेश और चीन—जो लगभग 100 किलोमीटर की दूरी पर हैं, भली-भांति जानते हैं कि यहां कोई भी गतिविधि भारत की सामरिक सुरक्षा को सीधे प्रभावित कर सकती है. लेकिन भारत भी पूरी तरह तैयार है और अपनी सामरिक क्षमताओं को कई गुना बढ़ा चुका है.

यहां पहले और अब में क्या-क्या बदला

पिछले कुछ वर्षों में सीमा पर क्या बदलाव हुए हैं. पहले जो बाड़ होती थी, वह कुछ इस प्रकार की होती थी. उसकी ऊंचाई लगभग 6 फीट होती थी और उसे कोई भी व्यक्ति आसानी से पार कर सकता था, क्योंकि उसे काटना भी आसान था. लेकिन अब बड़ा बदलाव हुआ है. यह जंगरोधी, कट-रोधी और चढ़ाई-रोधी बाड़ है. इसका मतलब है- न तो इसे कोई काट सकता है, न इस पर चढ़ सकता है और न ही यह समय की मार से जल्दी खराब होगी. यानी अगले 20 साल तक इसके ऐसे ही रहने की गारंटी है.

दूसरा बड़ा अंतर इसकी ऊंचाई में है, जो अब 6 फीट नहीं, बल्कि 9 फीट कर दी गई है. यही वजह है कि भारत की सीमा पर कई किलोमीटर तक इस तरह की बाड़ लगाकर सुरक्षा को कई गुना बढ़ाया जा रहा है. चुनौतियां तब आती हैं जब राज्य सरकार की ओर से या तो जमीन उपलब्ध नहीं कराई जाती, या फिर पूरा सहयोग नहीं मिलता और यहीं राजनीति की कवायद शुरू हो जाती है. हालांकि, इन तमाम बाधाओं के बावजूद लक्ष्य यही है कि भारत की पूरी सीमा पर ऐसी आधुनिक बाड़ लगा दी जाए, ताकि बांग्लादेश की तरफ से परिंदा भी पर न मार सके.

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यह परिवर्तन पिछले कुछ वर्षों में हुए हैं यह ध्यान में रखते हुए कि भारत की सीमा को सुरक्षित रखने की जिम्मेदारी भारत के हर एक नागरिक की है ठीक उसी तरह जिस तरह से भारत की सरकार की भी है. 1971 में जब से बांग्लादेश बना है, उसके बाद चिकन नेक का महत्व कई गुना ज़्यादा बढ़ गया है. दरअसल, बांग्लादेश में बढ़ रही पाकिस्तान की गतिविधियों से भारत को चिंता करने की जरूरत है. पहले अधिकतर रेल का इस्तेमाल किया जाता था. लेकिन वह भी सिर्फ़ गुवाहाटी असम के आगे रेल नहीं जाती थी, वहां फिर सड़क पर ही निर्भर रहना पड़ता था पर अब ऐसा नहीं है. रेल से ज़्यादा सड़क मार्ग का इस्तेमाल किया जा रहा है, यहां तक कि एशियन हाईवे इस पूरे इलाके में एक नई ऊर्जा का संचार कर रहा है.

पूर्वोत्तर भारत से बाकी सभी राज्यों की ओर जाने वाली ट्रेनें इसी ट्रैक से गुजरती हैं. यह वही ट्रैक है—एक ओर जो गुवाहाटी और अरुणाचल की दिशा में जाता है और दूसरी ओर सीधे दिल्ली तक पहुंचा देता है. यहाँ बात केवल देश की राजधानी की नहीं, बल्कि देश की उस धड़कन की है जो सीमाओं पर बसती है. अपनी सीमाओं को सुरक्षित रखने में पूर्वोत्तर सीमांत रेलवे (Northeast Frontier Railway) की अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका होती है.

इन इलाकों में लगातार ट्रेन सुविधाओं को बेहतर करने के प्रयास किए जा रहे हैं. ठीक उसी प्रकार ट्रैकों को बढ़ाने और मजबूत करने की भी कवायद चल रही है, ताकि आवागमन और अधिक सुगम हो सके. इससे यह सुनिश्चित किया जा सकेगा कि हर मौसम में आवश्यक सामग्रियों की सप्लाई निर्बाध रूप से हो. विशेषकर सुरक्षा बलों की गतिविधियों और आवश्यकताओं के लिए.

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पूर्वोत्तर भारत के राज्य अपनी ज़रूरतों के लिए सिलीगुड़ी कॉरिडोर यानी चिकन नेक कॉरिडोर पर निर्भर करता है. इसी गलियारे से भोजन, दवाइयां, उपकरण और निर्माण सामग्री की सप्लाई होती है.

  • इतना ही देश के बाकी हिस्सों से इस पूरे इलाके में सामान पहुँचाने में काफ़ी समय लगता है और काफ़ी लागत भी आती है.
  • यह चिकन नेक गलियारा एक महत्वपूर्ण व्यापार मार्ग है. इसके साथ ही दक्षिण पूर्व एशिया का एक मुख्य प्रवेश द्वार भी है. यह गलियारा घरेलू और अंतर्राष्ट्रीय, पारगमन और व्यापार के लिए बेहद खास है.
  • इस गलियारे से 10 लाख वाहन डेली आते-जाते हैं. इस रास्ते सें ट्रक, बस, एसयूवी, निजी कार, दोपहिया वाहनों का आवागमन होता है. हरेक दिन इस गलियारे से 2,400 मीट्रिक टन माल का परिवहन होता है.
  • इस परिवहन से ₹142 करोड़ का राजस्व मिलता है. यहां से कई तेल और गैस पाइपलाइनें और बिजली ग्रिड गुजरते हैं.
  • असम, मेघालय, मणिपुर, नागालैंड और अरुणाचल प्रदेश से 95 फीसदी निर्यात इसी सड़क मार्ग के गलियारे से ही होता है. बाकी 5 फीसदी रेल पर निर्भर करता है.
  • अर्थव्यवस्था के दृष्टिकोण से, यह गलियारा पूर्वोत्तर राज्यों और बाकी भारत के व्यापार के लिए बेहद खास है. यहां यहां यही एकमात्र रेलवे माल ढुलाई लाइन भी रखता है. वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) के पास सड़क मार्ग और रेलमार्ग सिलीगुड़ी गलियारे से जुड़े हुए हैं.

भारत और बांग्लादेश के संबंधों पर हाल ही की घटनाओं का गहरा असर पड़ा है. यह असर केवल मित्रता पर नहीं, बल्कि व्यापार पर भी दिखाई दे रहा है. पहले भारत से पत्थर (boulders) सहित कई प्रकार का सामान बड़ी मात्रा में बांग्लादेश भेजा जाता था और यहां से ट्रकें लंबी कतारों में पार होती थीं, लेकिन अब स्थिति बदल गई है.

बांग्लादेश से भारत इलाज के लिए आने वाले लोगों पर भी स्थानीय परिस्थितियों के कारण सीधी पाबंदी तो नहीं लगी है, लेकिन व्यावहारिक रूप से कई तरह की रुकावटें खड़ी हो गई हैं. स्थानीय लोगों द्वारा कमरे और अन्य आवश्यक सेवाएं उपलब्ध कराने से इंकार किए जाने के कारण सीमा पार से आने वाले मरीजों की संख्या में काफी कमी आई है. इन सबके बीच सबसे अधिक चोट उस भरोसे पर हुई है, जो लंबे समय से दोनों देशों के बीच मौजूद था.

आम तौर पर पूर्वोत्तर भारत तक पहुंचने वाला सामान महंगा हो जाता है. लेकिन कीमतों पर नियंत्रण बनाए रखने के लिए रेल परिवहन का अधिक इस्तेमाल किया जाता है. चुनौती तब आती है जब मौसम खराब हो, क्योंकि मौसम अच्छा होने पर ही सड़कें और मार्ग सुचारू रूप से काम कर पाते हैं. हालांकि, अब ट्रेन ने इस चुनौती पर भी बाजी मार ली है और इस व्यापार गलियारे का उपयोग लगातार बढ़ रहा है. ट्रेन के माध्यम से सामान पहुंचाने से लागत कम रहती है और जैसे-जैसे रेल के जरिये आपूर्ति बढ़ रही है, ठीक उसी तरह पूर्वोत्तर भारत की सामरिक व आर्थिक ताकत भी मजबूत होती जा रही है.

  • भारत ने चिकन नेक गलियारे को सुरक्षित करने के लिए पहल तेज कर दी है. फरवरी माह में, हिमंत बिस्वा सरमा ने भारतीय रेलवे कनेक्टिविटी को बेहतर बनाने के लिए चिकन नेक कॉरिडोर में चार अतिरिक्त रेलवे ट्रैक बनवाने की घोषणा की थी.
  • इसके साथ ही इस कॉरिडोर में दो और रेलवे लाइन शुरू करने की भी योजना है, जिससे असम और अन्य क्षेत्रों में रेलवे के बुनियादी ढांचे को मजबूती मिलेगी.
  • इसके अलावा भारत सिलीगुड़ी के माध्यम से एक मल्टीमॉडल परिवहन कॉरिडोर बनाने पर भी गौर कर रहा है. इसमें हाई-स्पीड रेल कनेक्शन और भूमिगत यातायात सुरंगें शामिल हो सकती हैं.

अरुणाचल फ्रंटियर हाइवे

  • चिकन नेक कॉरिडोर को सुरक्षित करने के लिए इंडिया लगातार पहल कर रहा है. इसके लिए भारत की सबसे बड़ी बुनियादी ढांचा परियोजनाओं में से एक अरुणाचल फ्रंटियर हाईवे बना है.
  • इसे राष्ट्रीय राजमार्ग NH-913 के रूप में भी जाना जाता है. इसकी लागत ₹ 42,000 करोड़ तक हो सकती है. इस सड़क मार्ग के निर्माण से तिब्बत स्वायत्त क्षेत्र में चीन के आक्रामक विस्तारवाद और विकास अभियान को भारत का एक रणनीतिक जवाब है.

पिछले एक दशक में न्यू जलपाईगुड़ी स्टेशन का पूरी तरह कायाकल्प किया जा चुका है. सरकार भली-भांति जानती है कि इस रेलवे स्टेशन का महत्व कितना बड़ा है. यह वही स्टेशन है जो पूरे भारत को पूर्वोत्तर भारत से जोड़ता है—अर्थात पूर्वोत्तर के सातों राज्यों में पहुंचने के लिए यहां से होकर गुजरना अनिवार्य है. इसके साथ-साथ स्टेशन की सुविधाओं में भी व्यापक बदलाव किया गया है. इसे एक आधुनिक रेल स्टेशन के रूप में विकसित किया जा रहा है, जहां यात्रियों को बेहतर सेवाएं मिलेंगी. अब तक पूर्वोत्तर भारत के साथ होने वाले करोड़ों रुपये के व्यापार में लगभग 90% निर्भरता सड़कों पर थी, लेकिन अब 10% से अधिक व्यापार रेलवे के माध्यम से किया जाएगा. व्यापार गलियारे (ट्रेड कॉरिडोर) के तहत देश के विभिन्न हिस्सों से सामान पूर्वोत्तर तक भेजा जा सकेगा और वहां निर्मित उत्पाद अन्य राज्यों तक पहुंच सकेंगे.

इतना ही नहीं, पूर्वोत्तर भारत के माध्यम से आयात–निर्यात की महत्त्वपूर्ण भूमिका भी लगातार बढ़ेगी. इस व्यापक पुनर्विकास (redevelopment) के साथ यहां आने–जाने वाले यात्रियों को अधिक ट्रेनें, बेहतर ट्रेनों की सुविधा और उन्नत सेवाएं उपलब्ध कराई जाएंगी.

चिकन नेक कॉरिडोर काटना इतना आसान नहीं है

  • सिक्किम और कॉरिडोर की रखवाली करने वाली त्रिशक्ति कोर के पास पहले से ही मज़बूत रक्षा संसाधन हैं (T-90 टैंक रेजिमेंट, एलीट इन्फेंट्री यूनिट, और आर्टिलरी)
  • भारत ने रणनीतिक सिलीगुड़ी कॉरिडोर में तीन बिल्कुल नए पूरी तरह से चालू मिलिट्री गैरीसन स्थापित किए हैं - चोपड़ा (पश्चिम बंगाल), किशनगंज (बिहार) और धुबरी (असम)
  • इन नई छावनियों का उद्देश्य 4,097 किलोमीटर लंबी भारत-बांग्लादेश सीमा में मौजूद रणनीतिक कमजोरियों को दूर करना और किसी भी संभावित घुसपैठ या आपात स्थिति में तेजी से जवाब देने की क्षमता बढ़ाना है
  • सामरिक जानकारी के अलावा, ये गैरीसन किसी भी आपात स्थिति में सेना को तेज़ी से जुटाने में मदद करेंगे
  • नए गैरीसन की स्थापना ऐसे समय में हुई है जब भारत पूर्वोत्तर में सैन्य गतिविधि बढ़ा रहा है, जिसमें असम में भारतीय वायु सेना का एक बड़ा फ्लाइंग डिस्प्ले और अरुणाचल प्रदेश में LAC के पास सेना का अभ्यास पूर्वी प्रचंड प्रहार शामिल है
  • इस क्षेत्र में प्रमुख रक्षा संसाधनों में ब्रह्मोस मिसाइलें और हाशिमारा में राफेल लड़ाकू विमान शामिल हैं
  • इस क्षेत्र में विकसित MRSAM सिस्टम, S-400 सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइलें और स्वदेशी आकाश मिसाइल सिस्टम भी तैनात है.

न्यू जलपाईगुड़ी रेलवे स्टेशन उत्तर बंगाल का एक ऐसा प्रमुख स्टेशन है जिसके माध्यम से पूरे भारत से सुगम संपर्क स्थापित किया जा सकता है. यहां से न केवल देश के किसी भी हिस्से में यात्रा संभव है, बल्कि नेपाल, भूटान और बांग्लादेश जैसे पड़ोसी देशों तक पहुंचने का मार्ग भी यहीं से जुड़ता है. दरअसल, इसका महत्व इसलिए भी अत्यधिक है क्योंकि चिकन नेक या सिलीगुड़ी कॉरिडोर पर स्थित सबसे महत्वपूर्ण रेलवे स्टेशन न्यू जलपाईगुड़ी को ही माना जाता.

भारत सरकार ने सीमावर्ती क्षेत्रों में बाड़बंदी में बड़े बदलाव किए हैं. लेकिन इन परिवर्तनों की वास्तविक स्थिति जानने के लिए हमारे साथ दार्जिलिंग के सांसद राजू बिस्टा मौजूद हैं. आखिर पहले और अब की परिस्थितियों में क्या बड़ा अंतर आया है?

टीएमसी बदमाश है, चोर है और देश के साथ गद्दारी करती है. जनता को बेवकूफ समझना बंद करे. पूरी सीमा लगभग 4,000 किलोमीटर की है, जिसमें 500–550 किलोमीटर पर अब तक बाड़ नहीं लग पाई और इसका कारण वही हैं. मान लीजिए कि इतनी लंबी सीमा पर कभी-कभार BSF से चूक भी हो जाए. लेकिन अंततः घुसपैठिये प्रवेश तो पश्चिम बंगाल में ही करते हैं. जहां आपका थाना है, आपकी पुलिस है, आपका प्रशासन है. वहां पहुंचने के बाद कार्रवाई आपकी है और आप कार्रवाई नहीं करते. इसके विपरीत, आप तो उन्हें बसाते हैं. बांग्लादेश से आए घुसपैठियों और रोहिंग्याओं को आप राशन कार्ड, आधार कार्ड, वोटर कार्ड तक दिलाते हैं. अपनी कुर्सी बचाने के लिए आप देश के साथ गद्दारी करते हैं.

राजू बिस्टा

सांसद, दार्जिलिंग

दार्जिलिंग के सांसद राजू बिस्टा ने कहा कि कार्रवाई लगातार चल रही है. अभी जो SIR हो रहा है, वही इसका उदाहरण है. नाम हटाने से पहले ही लाखों की संख्या में अवैध घुसपैठिये सीमा पार करके भाग चुके हैं. भारतीय जनता पार्टी केवल राजनीति करने के लिए राजनीति में नहीं है. हमारे लिए देश पहले है. यदि देश पहले है, तो सीमा भी हमारे लिए सर्वोपरि है. सीमा और देश की सुरक्षा के लिए भाजपा और प्रधानमंत्री मोदी , जो भी करना होगा. हम करेंगे. हम टीएमसी से डरने वाले नहीं हैं.

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