- नेपाल में आरएसपी ने आम चुनावों में बहुमत हासिल कर बालेन शाह के प्रधानमंत्री बनने का रास्ता साफ किया
- बांग्लादेश के छात्र आंदोलन ने सत्ता परिवर्तन में भूमिका निभाई लेकिन तारिक रहमान ही जनता ही पहली पसंद बने
- दोनों देशों में उद्देश्य समान थे लेकिन नेपाल में नए विकल्प को जनता ने स्वीकार किया जबकि बांग्लादेश में नहीं
नेपाल ने अपना नेता चुन लिया है. चुनाव परिणामों से साफ है कि बालेन शाह जनता की पहली पसंद हैं. मतलब ये कि बालेन शाह नेपाल के नए प्रधानमंत्री होंगे. ये करिश्मा हुआ है राज्य में ओली सरकार को उखाड़ फेंकने वाली Zen-z क्रांति के कुछ महीनों बाद. बालेन रैपर से राजनेता बन ऐसे चमके जिसके बारे में शायद किसी ने सोचा तक नहीं था. नेपाल में चार बार के प्रधानमंत्री ओली को हराकर सत्ता हासिल करना आसान काम नहीं था. बालेन की पार्टी आरएसपी ने आम चुनावों में बहुमत हासिल कर लिया है. नेपाल में जो भी हो रहा है वह बांग्लादेश के बिल्कल उलट है. वहां पर छात्रों की क्रांति से मौजूदा सरकार को गिरा दिया था. लेकिन उसके बाद हुए चुनावों में पिछली सरकार का प्रमुख विपक्षी दल सत्ता में वापस लौट आया. बांग्लादेश में नवगठित छात्र दल, नेशनल सिटिजन्स पार्टी कोई खास प्रभाव नहीं डाल सका.
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नेपाल और बांग्लादेश, दोनों ही देश एक-दूसरे से बहुत दूर नहीं हैं. लेकिन दोनों ही देशों में हाल ही में हुए चुनावों के नतीजों ने बिल्कुल अलग परिस्थितियां पैदा कर दी हैं. बांग्लादेश जब यह जानने की कोशिश कर रहा है कि उनका छात्र आंदोलन नेपाल में हुए Zen-z आंदोलन जैसी सफलता क्यों नहीं हासिल कर पाया. इसकी वजह क्या रही.

लक्ष्य एक जैसा तो रिजल्ट अलग क्यों?
बांग्लादेश और नेपाल में हुए विरोध प्रदर्शनों के पीछे की वजह लगभग एक जैसी थी. दोनों ही देशों में विरोध का मकसद मौजूदा व्यवस्था को बदलना था. बांग्लादेश में विरोध प्रदर्शन जमात समर्थित छात्र शिविर जैसी ताकतों ने शुरू किया था, जिसका लक्ष्य था सत्ताधारी सरकार को हटाना. बात अगर नेपाल की करें तो वहां हुए विरोध प्रदर्शन का मकसद भी व्यवस्था को उखाड़ फेंकना था. बालेंद्र शाह जैसे नेता इसी वजह से उभरे. वह नेपाल में एक नया विकल्प बन गए, जिसे जनता ने स्वीकारा भी. अब वह नेपाल के प्रधानमंत्री बनने जा रहे हैं.

लेकिन बांग्लादेश के हालात कुछ अलग रहे. वहां छात्र आंदोलन जनता को स्वीकार्य नेता नहीं दे सका. वहां हुआ छात्र आंदोलन राष्ट्र निर्माण और आम बांग्लादेशियों के जीवन स्तर को बेहतर बनाने के बजाय खुद को गति देने के लिए शेख हसीना विरोधी और भारत-विरोधी एजेंडे पर ज्यादा केंद्र था. लेकिन यह रणनीति कारगर साबित हुई. शेख हसीना ने तो बांग्लादेश छोड़ दिया लेकिन वहां के लोगों का जीवन कैसे सुधरेगा, इसे लेकर छात्र जनता के सामने कोई ठोस प्लान पेश नहीं कर पाए.
तारिक रहमान क्यों बने बांग्लादेश की पहली पसंद?
शेख हसीना सरकार के सत्ता से बेदखल होने के बाद सिर्फ बांग्लादेश को अगर अगर कोई इकलौता विकल्प नजर आया तो वो थे तारिक रहमान, जो देश के वर्तमान प्रधानमंत्री हैं. देश की मौजूदा राजनीति की वजह से ही वह पीएम की कुर्सी तक पहुंच सके. जनता को उन पर विश्वास था. उसकी वजह भी खास है. 17 सालों तक राजनीतिक से दूर रहने के बाद भी तारिक रहमान ने जनता के सामने नए विचार, एक नया दृष्टिकोण और सबसे एक योजना पेश की. उन्होंने अपने भाषण में कहा, “ एक सुरक्षित, लोकतांत्रिक और समृद्ध राष्ट्र के निर्माण के लिए मेरे पास एक योजना है”. बस उनकी यही बात लोगों के दिन में घर कर गई और तारिक रहमान लोगों की पहली पसंद बन गए.

तारिक की ढाका में वापसी के तुरंत बाद उनकी रैलियों में भारी उमड़ी. उनको संबोधित करते हुए तारिक ने कहा, "अमेरिकी नागरिक अधिकार कार्यकर्ता मार्टिन लूथर किंग ने एक सार्वजनिक भाषण में कहा था, 'मेरा एक सपना है.' उनकी तरह, मैं भी कहना चाहता हूं, मेरे पास बांग्लादेश के लिए एक योजना है." बस तारिक की यही रनीति काम आई और वह बांग्लादेश में छात्र समूहों से बेहतर विकल्प बन गए. उन्होंने राजनीति में हाशिए पर मौजूद बांग्लादेश जमात-ए-इस्लामी के साथ गठबंधन कर लिया. तारिक रहमान की समावेशी राजनीति और अल्पसंख्यकों तक पहुंच ने उन्हें मतदाताओं के बीच सबसे लोकप्रिय विकल्प बना दिया.
इससे एक बात को साफ है कि वोटर्स को ऐसे नेता पसंद आते हैं जो सत्ताधारी दल के खिलाफ लगातार नकारात्मक राजनीति करने के बजाय वैकल्पिक योजनाएं पेश करते हैं. हालही में भारत में हुए चुनावों ने भी इस बात को साबित कर दिया है.
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