- CJP के सौरव दास और आशुतोष रांका को जंतर-मंतर पर बिना अनुमति प्रदर्शन के आरोप में 5 दिन के लिए जेल भेजा गया
- 10 अक्टूबर को विरोध प्रदर्शन के बाद CJP नेताओं को शांति बनाए रखने का 50 हजार रुपये का पीस बॉन्ड भरवाया गया था
- जंतर-मंतर को विरोध स्थल से हटाए जाने के बाद CJP नेताओं ने वहां तिरंगा लहराया था और उन्हें हिरासत में लिया गया
भारत के मुख्य चुनाव आयोग के खिलाफ आंदोलन छेड़ने वाेले कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के नेता सौरव दास और आशुतोष रांका को गिरफ्तार करने के बाद 5 दिन की न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया गया है. बुधवार को एक स्पेशल एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट (SEM) कोर्ट ने यह आदेश सुनाया. दरअसल इससे पहले, 10 अक्टूबर के विरोध-प्रदर्शन से जुड़े एक मामले में CJP के फाउंडर अभिजीत दिपके, सौरव और आशुतोष को 50 हजार रुपये का पीस बॉन्ड भरने और इस शर्त पर रिहा किया गया था कि वे एक साल तक शांति भंग करने वाले किसी भी मामले में शामिल नहीं होंगे. लेकिन इस बार, सौरव और रंका पर बिना इजाजत जंतर-मंतर पर घुसने और बॉन्ड की शर्तों का उल्लंघन करने का आरोप लगा है.
सवाल है कि आखिर पीस बॉन्ड होता क्या है? इसे कोई मजिस्ट्रेट कब भरवाता है और इसके उल्लंधन पर क्या होता है. पहले आप मामला समझ लीजिए.
मामला क्या है?
10 अक्टूबर को हिरासत में लिए जाने के बाद अभिजीत, सौरव और आशुतोष को अगले दिन रीलिज कर दिया गया. तब तीनों से 50 हजार का बॉन्ड भरवाया गया था कि वे एक साल तक शांति भंग करने वाले किसी भी मामले में शामिल नहीं होंगे. 12 अक्टूबर को सरकार ने जंतर-मंतर को तय विरोध-प्रदर्शन स्थल के तौर पर डी-नोटिफाई कर दिया यानी वहां विरोध प्रदर्शन नहीं किया जा सकता. लेकिन अगले दिन 13 अक्टूबर को सौरव दास, आशुतोष रांका और CJP के एक अन्य कार्यकर्ता अजिंक्य शिंदे बैरिकेड लगे जंतर-मंतर इलाके में गेट फांदकर घुस गए थे. वहां तिरंगा लहराया था. पुलिस ने तीनों को हिरासत में ले लिया. अब स्पेशल एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट ने यह आदेश सुनाया.
क्या CJP नेताओं ने ऐसी कोई बॉन्ड भरने की बात मानी थी?
11 अक्टूबर को रिहा होने के बाद अभिजीत दिपके ने कहा था कि उन्होंने ऐसा कोई बॉन्ड साइन नहीं किया है जिसमें यह कहा गया हो कि वे और CJP के अन्य लीडर्स मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को हटाने की मांग को लेकर दोबारा विरोध-प्रदर्शन नहीं करेंगे.

क्या होता है पीस बॉन्ड?
पीस बॉन्ड अदालत या मजिस्ट्रेट द्वारा जारी किया जाने वाला एक कानूनी आदेश या मुचलका होता है, जिसमें किसी व्यक्ति को एक तय समय (आमतौर पर 1 साल तक) के लिए शांति बनाए रखने और अच्छा व्यवहार करने का वादा करना पड़ता है. समझिए कि यह एक वादा है कि हम शांति बनाए रखेंगे. आपके मन में ख्याल आ सकता है कि अदालत या मजिस्ट्रेट को यह पावर कहां से मिलती है.
इसका जवाब भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 में सेक्शन 126 में छिपा है.
BNSS के सेक्शन 126 में है क्या?
इस सेक्शन में दो सब-सेक्शन हैं.
(1) अगर किसी कार्यकारी मजिस्ट्रेट को यह जानकारी मिलती है कि कोई व्यक्ति लड़ाई-झगड़ा कर सकता है, शांति भंग कर सकता है, लोगों के बीच अशांति फैला सकता है या ऐसा कोई गलत काम कर सकता है, जिससे शांति भंग होने या अशांति फैलने की आशंका है, तो मजिस्ट्रेट इस मामले में कार्रवाई कर सकता है. अगर मजिस्ट्रेट को लगता है कि कार्रवाई करने के लिए पर्याप्त कारण हैं, तो वह उस व्यक्ति को नोटिस देकर पूछ सकता है कि उससे शांति बनाए रखने के लिए बॉन्ड या जमानत बॉन्ड क्यों न भरवाया जाए. इस बॉन्ड के तहत उस व्यक्ति को एक तय समय तक शांति बनाए रखने का वादा करना होगा. यह अवधि अधिकतम एक साल तक हो सकती है. कितने समय के लिए बॉन्ड भरवाना है, इसका फैसला मजिस्ट्रेट करेगा.
(2) इस मामले में कोई भी एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट कार्रवाई कर सकता है, अगर शांति भंग होने या अशांति फैलने की आशंका वाला स्थान उसके अधिकार क्षेत्र में आता है. इसके अलावा, अगर ऐसा व्यक्ति उसके अधिकार क्षेत्र में रहता है या मौजूद है, जिसके किसी दूसरे क्षेत्र में जाकर शांति भंग करने, अशांति फैलाने या कोई ऐसा गलत काम करने की आशंका है, तो भी वह मजिस्ट्रेट कार्रवाई कर सकता है.
यानी सीधे शब्दों में समझें अगर मजिस्ट्रेट को लगता है कि कोई व्यक्ति शांति भंग कर सकता है, तो वह उस व्यक्ति को नोटिस देकर शांति बनाए रखने के लिए बॉन्ड भरने को कह सकता है. यह बाॉन्ड अधिकतम एक साल के लिए हो सकता है. अभिजीत दिपके, सौरव और आशुतोष से एक-एक साल के लिए ऐसा ही 50 हजार रुपए का बॉन्ड भरवाया गया था.
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