Bengal Elections 2026: पश्चिम बंगाल की राजनीति में ऊपर से भले ही तृणमूल कांग्रेस (TMC) की पकड़ मजबूत दिखती हो, लेकिन आंकड़ों की परतों को उधेड़ें तो एक चौंकाने वाली कहानी सामने आती है. विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के आंकड़ों के बाद चुनावी तस्वीर पर असर पड़ने की बात भी अब सामने आ रही है.
सबसे पहले बात एंटी-इंकम्बेंसी की. लगातार 15 साल से सत्ता में काबिज मुख्यमंत्री ममता बनर्जी (Mamata Banerjee) के खिलाफ बढ़ता असंतोष इस समीकरण का एक अहम हिस्सा है. हालांकि असली बदलाव सतह के नीचे चल रहा है. चुनावी आंकड़े बताते हैं कि मुकाबला अब पहले से कहीं ज्यादा कड़ा और अनिश्चित हो गया है.
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मतदाता सूची में बड़े बदलाव ने बढ़ाई अनिश्चितता
SIR प्रक्रिया के तहत करीब 91 लाख मतदाताओं के नाम हटाए जाने से चुनावी परिदृश्य में जटिल हो गया है. इनमें 60 प्रतिशत नाम 6 जिलों से हटे हैं. सबसे अधिक असर मुस्लिम बहुल और सीमावर्ती जिलों में है. मालदा, मुर्शिदाबाद, उत्तर दिनाजपुर, नदिया, उत्तर और दक्षिण 24 परगना से करीब 60% नाम हटें हैं. 115 में से 93 यानी करीब 81% सीटें अभी टीएमसी के पास हैं. इतनी बड़ी संख्या में मतदाताओं का हटना पारंपरिक वोटिंग पैटर्न को तोड़ सकता है और पुराने चुनावी अंतर (मार्जिन) को कम भरोसेमंद बना देता है. इससे कई सीटों पर मुकाबला और भी करीबी हो सकता है. इसके अलावा, राज्य में महिला वोटर्स के अनुपात में आई गिरावट (959 से घटकर 950 प्रति 1000 पुरुष) भी ममता बनर्जी के लिए चिंता का विषय है.
TMC का वोट शेयर
आंकड़ों से यह भी स्पष्ट होता है कि TMC का कुल वोट शेयर भले ही बड़ा हो, लेकिन उसका बड़ा हिस्सा सीमित क्षेत्रों में सिमटा हुआ है. खासकर मुस्लिम बहुल सीटों पर TMC को भारी बहुमत मिलता है, जिससे वहां जीत का अंतर बहुत ज्यादा हो जाता है. लेकिन यह अतिरिक्त वोट अन्य सीटों पर कोई फायदा नहीं देता. इसके विपरीत, भारतीय जनता पार्टी (BJP) का वोट राज्यभर में अपेक्षाकृत समान रूप से फैला हुआ है, जो उसे करीबी मुकाबलों में बेहतर स्थिति में खड़ा करता है.
उत्तर बंगाल का समीकरण
भाजपा के लिए सबसे बड़ी चुनौती मतुआ समुदाय के शरणार्थी वोट बैंक को लेकर खड़ी हुई है. करीब 55 सीटों पर प्रभाव रखने वाले इस बेल्ट में बड़े पैमाने पर नाम हटाए गए हैं. हालांकि, उत्तर बंगाल और जंगलमहल जैसे इलाकों में, जहां भाजपा मजबूत है, कटौती तुलनात्मक रूप से कम है. भाजपा को उम्मीद है कि घुसपैठ और फर्जी नामों के हटने से उसे उत्तर बंगाल में फायदा मिल सकता है, जिससे मतुआ बेल्ट में होने वाले संभावित नुकसान की भरपाई हो सकेगी.
आंकड़ों में दिखता असंतुलन
TMC के पास 114 ऐसी सीटें हैं जहां जीत का अंतर 10% से ज्यादा है, जबकि BJP के पास सिर्फ 35. साल 2024 के आधार पर, TMC के करीब 55.8 लाख वोट 'वेस्टेड' माने जा सकते हैं. यानी 10% से ज्यादा के मार्जिन वाले वोट, जबकि BJP के लिए यह संख्या 11.9 लाख है. साल 2021 के चुनाव में यह अंतर और भी बड़ा था. TMC के 65 लाख 'वेस्टेड' वोट बनाम बीजेपी के सिर्फ 5.5 लाख. खास बात यह है कि TMC के आधे से ज्यादा 'अतिरिक्त वोट' मुस्लिम बहुल सीटों से आते हैं, जिससे उसका प्रभाव सीमित क्षेत्रों तक सिमट जाता है.
करीबी सीटों पर निर्णायक बढ़त की जरूरत
2024 के आंकड़ों के आधार पर देखा जाए तो BJP को सिर्फ एक निर्णायक बढ़त की जरूरत है. करीब 58 करीबी सीटों पर यदि मात्र 1.92 लाख वोटरों का झुकाव TMC से BJP की ओर हो जाए, तो पूरा चुनावी परिणाम बदल सकता है.
मुकाबला अब खुला हुआ है. पश्चिम बंगाल में अब चुनाव केवल कुल वोट प्रतिशत का खेल नहीं रह गया है, बल्कि सीट-दर-सीट मार्जिन ज्यादा मायने रखता है. एंटी-इंकम्बेंसी का बढ़ना, मतदाता सूची में बदलाव और वोटों का असमान वितरण, ये सभी कारक मिलकर यह संकेत दे रहे हैं कि राज्य में मुकाबला एकतरफा नहीं है. बल्कि चुनाव परिणाम कई फैक्टर पर निर्भर करेगा. यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या यह गणित वास्तविक नतीजों में बदल पाता है या नहीं.
इसके अलावा, राज्य में महिला वोटर्स के अनुपात में आई गिरावट (959 से घटकर 950 प्रति 1000 पुरुष) भी ममता बनर्जी के लिए चिंता का विषय है.
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