- पश्चिम बंगाल में पहली बार भारतीय जनता पार्टी को बड़ा बहुमत मिला है और वह सरकार बनाने जा रही है
- भाजपा ने अवैध घुसपैठ, सुरक्षा और स्थानीय अधिकारों को चुनावी मुद्दा बनाकर सीमावर्ती इलाकों में समर्थन जुटाया है
- ममता बनर्जी की छवि मजबूत रही लेकिन भाजपा ने रणनीति बदलकर प्रधानमंत्री मोदी की लोकप्रियता का फायदा उठाया है
पश्चिम बंगाल में पहली बार बीजेपी की सरकार बन रही है. विधानसभा चुनाव की मतगणना में भारतीय जनती पार्टी को बड़ा बहुमत मिलता दिख रहा है, जबकि ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) प्रदेश में लंबे शासन के बाद सत्ता से जा रही है. बंगाल की राजनीति में ये बदलाव ऐतिहासिक है. इस जीत न सिर्फ बीजेपी बल्कि एनडीए के सहयोगी दलों में भी जश्न का माहौल है. हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा के अध्यक्ष और केंद्रीय मंत्री जीतनराम मांझी ने भी खासतौर पर अपनी खुशी जताई है.
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक पोस्ट कर जीतनराम मांझी ने कहा,"पश्चिम बंगाल की जीत पर जलेबी नहीं झालमुरी ही चलेगी. आज झालमुरी का दिन है जमकर झालमुरी खा रहा हूं,किसी को झाल लगे तो बुरा मत मानिएगा."
उन्होंने आगे लिखा, "बंगाल जीत की हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ये जीत आपके मार्गदर्शन और अमित शाह जी के बेजोड़ मेहनत की जीत है.बंगाल के हर NDA कार्यकर्ताओं को जीत की विशेष शुभकामनाएं."
पश्चिम बंगाल की जीत पर जलेबी नहीं झालमुरी ही चलेगी।
— Jitan Ram Manjhi (@jitanrmanjhi) May 4, 2026
आज झालमुरी का दिन है जमकर झालमुरी खा रहा हूँ,किसी को झाल लगे तो बुरा मत मानिएगा।
बंगाल जीत की हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएँ प्रधानमंत्री @narendramodi जी।
ये जीत आपके मार्गदर्शन और अमित शाह जी के बेजोड़ मेहनत की जीत है।
बंगाल के… pic.twitter.com/A8iRXagBRf
पश्चिम बंगाल में इस बार की लड़ाई सिर्फ सीटों की नहीं रही, बल्कि रणनीति, वादों और सामाजिक समीकरणों की भी रही. भाजपा ने जहां अपने वादों के जरिए मजबूत नैरेटिव खड़ा किया, वहीं ‘एम फैक्टर' ने चुनावी गणित को पूरी तरह प्रभावित किया.
राज्य में बढ़ती हिंसा और अपराध के आरोपों को भाजपा ने जोर-शोर से उठाया. ‘सख्त कानून व्यवस्था' और यूपी मॉडल लागू करने का वादा शहरी और मध्यम वर्ग को प्रभावित करता दिखा. ‘सिंडिकेट राज' खत्म करने और पारदर्शिता लाने का वादा भाजपा के प्रचार का अहम हिस्सा रहा. लंबे समय से सिस्टम से नाराज वोटर्स को यह संदेश सीधा लगा. बंद पड़े उद्योगों को चालू करने और नए निवेश लाने के वादे ने युवाओं और व्यापारिक वर्ग को आकर्षित किया. ‘सोनार बांग्ला' का सपना इसी के साथ जोड़ा गया.

Photo Credit: IANS
इन वादों के साथ ही, भाजपा ने इन एम फैक्टर पर भी काम किया, जिन्होंने चुनाव परिणाम को पलट दिया. करीब 30 प्रतिशत मुस्लिम आबादी पारंपरिक रूप से टीएमसी के साथ रही है, लेकिन इस बार नए समीकरण बने। हूमायूं कबीर की पार्टी एजेयूपी ने इस वोट बैंक में सेंध लगाने की कोशिश की, जबकि ध्रुवीकरण ने भी असर डाला.

ममता बनर्जी की व्यक्तिगत छवि और जुझारू राजनीति टीएमसी की सबसे बड़ी ताकत रही. हालांकि इस बार भाजपा ने उन पर सीधे हमले से बचते हुए अलग रणनीति अपनाई. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रैलियां, रोड शो और राष्ट्रीय मुद्दों पर फोकस ने भाजपा को नई ऊर्जा दी. उनकी लोकप्रियता ने नए वोटर्स को जोड़ने में मदद की.
कुल मिलाकर, भाजपा ने अपने वादों और सामाजिक समीकरणों को जमीन पर उतारने में बढ़त हासिल की, जबकि टीएमसी इनका प्रभावी जवाब देने में संघर्ष करती दिखी. लंबे समय से सत्ता में रहने का असर भी एंटी-इंकंबेंसी के रूप में सामने आया.
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