- ओडिशा की सिजिमाली पहाड़ियों में वेदांता के बॉक्साइट खनन परियोजना के खिलाफ आदिवासी समुदाय से विरोध कर रहा है.
- वेदांता को फरवरी-मार्च 2023 में सिजिमाली क्षेत्र में माइनिंग लीज मिली है, जिसमें वन भूमि भी शामिल है.
- सात अप्रैल 2026 को सड़क निर्माण को लेकर पुलिस और ग्रामीणों के बीच हिंसक झड़प हुई, जिसमें कई घायल हुए.
Vedanta vs Tribals Odisha Dispute: ओडिशा के रायगढ़ा जिले की सिजिमाली पहाड़ियां एक बार फिर सुर्खियों में हैं. यहां वेदांता कंपनी के बॉक्साइट खनन प्रोजेक्ट के खिलाफ आदिवासी समुदाय पिछले तीन साल से विरोध कर रहा है. 7 अप्रैल 2026 को यह विरोध हिंसक झड़प में बदल गया, जब सड़क निर्माण को लेकर पुलिस और ग्रामीण आमने‑सामने आ गए. इस संघर्ष ने एक बार फिर विकास बनाम आदिवासी अधिकार और पर्यावरण संरक्षण की बहस को तेज कर दिया है.
सिजिमाली पहाड़ क्यों बना संघर्ष का केंद्र?
दरअसल, सिजिमाली पहाड़ियां ओडिशा के रायगढ़ा और कालाहांडी जिलों में पूर्वी घाट पर्वतमाला का हिस्सा हैं. यहां बड़े पैमाने पर बॉक्साइट का भंडार है, जिसे निकालने के लिए वेदांता लिमिटेड ने खनन का प्रस्ताव रखा है. आदिवासी समुदाय का कहना है कि यह पहाड़ उनकी जिंदगी, आस्था और आजीविका का आधार है, इसलिए वे किसी भी कीमत पर खनन नहीं होने देंगे.
क्या है वेदांता का सिजिमाली प्रोजेक्ट?
सिजिमाली बॉक्साइट ब्लॉक में करीब 31.1 करोड़ टन हाई‑ग्रेड बॉक्साइट होने का अनुमान है. फरवरी‑मार्च 2023 में वेदांता को करीब 1,548 हेक्टेयर क्षेत्र के लिए माइनिंग लीज मिली थी, जिसमें लगभग 700 हेक्टेयर वन भूमि शामिल है. कंपनी का मकसद यहां से हर साल करीब 90 लाख टन बॉक्साइट निकालना है. यह खनन लांजीगढ़ स्थित वेदांता की एल्युमिना रिफाइनरी के लिए बेहद अहम माना जा रहा है.
7 अप्रैल को रायगढ़ा में क्या हुआ?
7 अप्रैल 2026 को माइनिंग के लिए बनाई जा रही तीन किलोमीटर लंबी अप्रोच रोड को लेकर तनाव बढ़ गया. यह सड़क सिजिमाली की चोटी को स्टेट हाईवे‑44 से जोड़ने के लिए बनाई जा रही है. जब पुलिस निर्माण कार्य को सुरक्षित कराने गांवों में पहुंची, तो ग्रामीणों से झड़प हो गई. देखते ही देखते हालात बिगड़ गए और पथराव शुरू हो गया. इस टकराव में 58 पुलिसकर्मी और कई आदिवासी घायल हुए, जिनमें से छह पुलिसकर्मियों को विशाखापट्टनम रेफर किया गया.
पुलिस और ग्रामीणों के अलग‑अलग दावे
पुलिस का कहना है कि ग्रामीणों ने पत्थर, कुल्हाड़ी और धारदार हथियारों से हमला किया, जिसके जवाब में लाठीचार्ज और आंसू गैस का सहारा लेना पड़ा. वहीं ग्रामीणों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का आरोप है कि पुलिस ने कार्रवाई से पहले गांवों की बिजली काटी, घरों में जबरन घुसकर तोड़फोड़ की और लोगों को हिरासत में लिया. झड़प के वीडियो भी सोशल मीडिया पर सामने आए हैं.
आदिवासी क्यों कर रहे हैं विरोध?
आदिवासी समुदाय के विरोध के पीछे कई वजहें हैं. उनका कहना है कि खनन से 18 गांवों के सैकड़ों परिवार उजड़ जाएंगे. उनकी खेती, पशुपालन और जंगल से मिलने वाली वन उपज पूरी तरह प्रभावित होगी. इसके अलावा सिजिमाली पहाड़ को पवित्र माना जाता है और यहां देवी‑देवताओं की पूजा होती है. लोगों को डर है कि खनन से पानी के स्रोत सूख जाएंगे, जंगल खत्म होंगे और पर्यावरण को भारी नुकसान पहुंचेगा.
फर्जी ग्राम सभा का आरोप
ग्रामीणों का सबसे बड़ा आरोप यह है कि माइनिंग के लिए जिन ग्राम सभाओं से मंजूरी दिखाई गई, वे फर्जी हैं. प्रशासन ने दिसंबर 2023 में आठ ग्राम सभाओं से सहमति मिलने का दावा किया था, लेकिन आदिवासियों का कहना है कि सहमति पत्रों में नाबालिगों, मृत लोगों और बाहरी लोगों के नाम हैं. आरटीआई से यह भी सामने आया कि सभी आठ ग्राम सभाएं एक ही दिन और एक ही समय पर हुई थीं. बाद में गांवों ने दोबारा बैठक कर खनन के विरोध में प्रस्ताव पारित किया.
कानूनी मंजूरी अभी अधूरी
दिसंबर 2025 में फॉरेस्ट एडवाइजरी कमेटी ने 708 हेक्टेयर वन भूमि के लिए स्टेज‑I मंजूरी की सिफारिश जरूर की है, लेकिन अब तक स्टेज‑II की अंतिम मंजूरी नहीं मिली है. सड़क निर्माण की भी वन अनुमति पेंडिंग है. नियमों के मुताबिक, बिना अंतिम मंजूरी के खनन शुरू नहीं हो सकता.
2023 से जारी है गिरफ्तारी और तनाव
सिजिमाली में विरोध और पुलिस कार्रवाई का सिलसिला 2023 से चल रहा है. कई बार ग्रामीणों को हिरासत में लिया गया. अक्टूबर 2025 में एक महिला एक्टिविस्ट की गिरफ्तारी ने भी काफी विवाद खड़ा किया. मार्च 2026 में 21 आदिवासियों को हिरासत में लिया गया था, जिनमें महिलाएं और एक गर्भवती महिला भी शामिल थी.
भुवनेश्वर तक पहुंचा आंदोलन
7 अप्रैल की घटना के बाद 8 अप्रैल को भुवनेश्वर में सिविल सोसाइटी, वकीलों और नेताओं ने प्रदर्शन कर वेदांता का लीज रद्द करने, पुलिस कार्रवाई रोकने और गिरफ्तार ग्रामीणों को रिहा करने की मांग की. आंदोलन अब राज्य स्तर पर चर्चा का विषय बन चुका है.
नियामगिरि की याद दिला रहा सिजिमाली संघर्ष
सामाजिक कार्यकर्ता इस संघर्ष की तुलना नियामगिरि आंदोलन से कर रहे हैं. 2013 में सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद ग्राम सभाओं की सहमति से वेदांता का नियामगिरि प्रोजेक्ट रोक दिया गया था. अब आदिवासी सिजिमाली में भी उसी तरह की जीत की उम्मीद कर रहे हैं.
ये भी पढ़ें-
केन-बेतवा परियोजना MP: विकास की राह या आदिवासियों के अस्तित्व पर खतरा, बांध स्थल पर भड़का जनसंग्राम
NDTV.in पर ताज़ातरीन ख़बरों को ट्रैक करें, व देश के कोने-कोने से और दुनियाभर से न्यूज़ अपडेट पाएं