विज्ञापन

माओवादी आंदोलन के अंत के साथ क्या हिंसा से विस्थापितों की लंबी लड़ाई का भी अंत होगा?

Shubhranshu Choudhary
  • ब्लॉग,
  • Updated:
    फ़रवरी 23, 2026 14:32 pm IST
    • Published On फ़रवरी 23, 2026 14:02 pm IST
    • Last Updated On फ़रवरी 23, 2026 14:32 pm IST
माओवादी आंदोलन के अंत के साथ क्या हिंसा से विस्थापितों की लंबी लड़ाई का भी अंत होगा?

रविवार को माओवादी आंदोलन से जुड़ी एक बड़ी खबर सामने आई. छत्तीसगढ़ के उपमुख्यमंत्री ने बताया कि नक्सली आंदोलन के कथित प्रमुख देवजी ने आत्मसमर्पण कर दिया है. यदि यह सच साबित होता है, तो संभव है कि दशकों से जारी माओवादी आंदोलन औपचारिक रूप से समाप्ति की ओर बढ़ जाए. इससे पहले पूर्व प्रमुख नंबला केशव राव सुरक्षा बलों की कार्रवाई में मारे गए थे. हालांकि देवजी के नेतृत्व संभालने की खबर को कुछ वरिष्ठ माओवादी नेताओं ने पहले खारिज किया था और बाद में वे खुद आत्मसमर्पण कर चुके हैं.

लेकिन इस राजनीतिक-सुरक्षात्मक घटनाक्रम से भी बड़ी खबर उन लोगों के लिए आई है जो इस संघर्ष के सबसे बड़े पीड़ित रहे हैं. ये जिक्र हिंसा के कारण विस्थापित हुए हजारों आदिवासी परिवारों का है. राज्य सरकार ने अब स्वीकार किया है कि माओवादी हिंसा के चलते 30,000 से अधिक लोग राज्य छोड़कर दूसरे राज्यों में चले गए थे. यह स्वीकारोक्ति इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि वर्षों तक आधिकारिक स्तर पर ऐसे विस्थापन से इनकार किया जाता रहा है. 

दो दशक पुराना जख्म

इनमें से अधिकांश लोग लगभग दो दशक पहले विस्थापित हुए थे, जब सरकार समर्थित सलवा जुडुम अभियान शुरू हुआ था और सुरक्षा बलों तथा माओवादियों के बीच हिंसक टकराव तेज हो गया था. गांव-दर-गांव संघर्ष, जलते घर और लगातार भय ने हजारों परिवारों को पलायन के लिए मजबूर कर दिया. आज, 20 साल बाद पहली बार उन्हें उम्मीद की एक हल्की किरण दिख रही है.

अनसुनी आवाजें

2019 में लगभग 300 विस्थापित लोग 300 किलोमीटर साइकिल चलाकर रायपुर पहुंचे थे, ताकि अपनी बात सरकार तक पहुंचा सकें. लेकिन उन्हें तत्कालीन मुख्यमंत्री से मिलने का मौका भी नहीं मिला. बाद में विधानसभा में सरकार की ओर से लिखित जवाब दिया गया कि राज्य से माओवादी हिंसा के कारण कोई विस्थापन हुआ ही नहीं, इसलिए पुनर्वास का सवाल नहीं उठता.

आंकड़ों में विस्थापन

नई सरकार ने राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग के दबाव में सर्वे कराया. पहले आंकड़ा लगभग 13,000 बताया गया. वहीं तेलंगाना और आंध्र प्रदेश सरकारों ने कहा कि उनके राज्यों में करीब 32,000 विस्थापित रह रहे हैं. अब ताजा रिपोर्ट में छत्तीसगढ़ ने लगभग 30,000 विस्थापितों को मान लिया है और दावा किया है कि कुछ हजार लोग वापस लौट भी चुके हैं. यह विस्थापित समुदाय के संघर्ष की बड़ी जीत मानी जा रही है.

आगे- पुनर्वास की लड़ाई

अब असली सवाल पुनर्वास नीति का है. कई अधिकारी कहते हैं कि विस्थापित वापस लौटना ही नहीं चाहते और यह आंशिक रूप से सच भी है. कई परिवार कहते हैं, “हम बाहर भले कम खाते हैं, पर कम से कम जिंदा तो हैं. वहां सुबह पुलिस और रात में माओवादी का डर रहता था.” हालांकि प्रशासन का अनुमान है कि लगभग आधे लोग वापस आना चाहते हैं.

कानून में हक, जमीन पर इंतजार

वनाधिकार कानून की धारा 3 (1) (एम) के तहत यदि किसी आदिवासी को अपनी वनभूमि छोड़नी पड़े, तो उसे बदले में दूसरी जमीन दी जा सकती है. 2019 से विस्थापितों ने हजार से अधिक आवेदन भेजे, लेकिन अब तक उन पर न मंजूरी मिली, न अस्वीकृति- यानी फाइलें ठंडे बस्ते में हैं. अधिकारियों का कहना है कि अब प्रक्रिया शुरू की जाएगी.

बाहर काम, पर अधिकार नहीं

दक्षिण बस्तर की तुलना में तेलंगाना और आंध्र प्रदेश की अर्थव्यवस्था अधिक विकसित है, इसलिए वहां युवाओं को काम मिल जाता है. लेकिन समस्या यह है कि वहां उन्हें स्थानीय आदिवासी का दर्जा नहीं मिलता, जिससे शिक्षा और नौकरी में आरक्षण जैसे अधिकार छिन जाते हैं. वे मजदूर तो बन सकते हैं, नागरिक अधिकारों वाले निवासी नहीं.

समाधान का मॉडल मौजूद

जानकार अक्सर मिजोरम–त्रिपुरा के बीच हुए ब्रू पुनर्वास समझौते का उदाहरण देते हैं, जिसमें विस्थापितों को दो विकल्प दिए गए थे- पहला, वापस लौटना और दूसरा, जहां हैं वहीं बसना. दोनों स्थितियों में उन्हें सरकारी सहायता मुहैया कराने की बात कही गई थी.

विस्थापितों की मांगें

ज्यादातर विस्थापित कहते हैं कि अगर उन्हें 5-10 एकड़ जमीन का मालिकाना हक मिले, खेती लायक जमीन तैयार कर दी जाए, सौर पंप लगाए जाएं, खेतों की फेंसिंग हो और रहने के लिए पक्का घर मिले, तो वे लौटने को तैयार हैं.

अगर माओवादी आंदोलन सचमुच खत्म होता है, तो क्या सरकार इन मांगों को स्वीकार करेगी? और जो लोग वापस नहीं आना चाहते, क्या उनके अधिकारों की लड़ाई केंद्र और संबंधित राज्यों से लड़ी जाएगी?

मड़कम देवैया, जो भद्राद्री कोठागुडेम में रह रहे विस्थापित नेता हैं. यह बताते हुए कि वो माओवादी नेता हिडमा के पड़ोसी गांव से हैं, वो एक सवाल उठाते हैं, “अगर हमें हमारी जमीन और जंगल का अधिकार नहीं मिलेगा, तो हमारे युवाओं का भविष्य क्या होगा?”

NDTV.in पर ताज़ातरीन ख़बरों को ट्रैक करें, व देश के कोने-कोने से और दुनियाभर से न्यूज़ अपडेट पाएं

फॉलो करे:
Maoist Conflict, Human Rights Concerns, Development Vs Conflict, End Of Maoist Movement, Tribal Rehabilitation India
Listen to the latest songs, only on JioSaavn.com