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This Article is From Apr 17, 2026

छत्तीसगढ़ में आत्मसमर्पण करने वाले माओवादी और आदिवासी एक साथ रहेंगे? क्यों है सेवाग्राम और शांति वन की जरूरत

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  • Updated:
    अप्रैल 17, 2026 13:42 pm IST
    • Published On अप्रैल 17, 2026 13:41 pm IST
    • Last Updated On अप्रैल 17, 2026 13:42 pm IST
छत्तीसगढ़ में आत्मसमर्पण करने वाले माओवादी और आदिवासी एक साथ रहेंगे? क्यों है सेवाग्राम और शांति वन की जरूरत

दो साल पहले हम लोग एक तीन माह की शांति यात्रा पर निकले थे. इस दौरान बस्तर के कई गांवों में लोगों ने बैठक का आयोजन अपने गांव के गौठान (गौशाला) में किया था. गौठान पुराने कांग्रेस सरकार की फ़्लैगशिप योजना थी. गौठान में तब तक फेंसिंग थी, पानी और बैठने की बढ़िया व्यवस्था थी.

बस्तर से विस्थापित होकर आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में रह रहे आदिवासियों ने अपने पुनर्वास के लिए छत्तीसगढ़ की सरकार से जो मांगें रखी हैं, उसमें पांच एकड़ सिंचित (सोलर पंप से) जमीन के साथ पूरे खेत की फेंसिंग की मांग भी की है. यद्यपि मध्य छत्तीसगढ़ की तरह आदिवासी इलाक़ों में गाय इकोनॉमी का उतना बड़ा हिस्सा नहीं है, पर सोलर पंप की मदद से अगर कोई दूसरी फसल की सोचता है तो या तो गाय को गौठान में रखना होगा या खेतों में बाड़ लगानी होगी.

क्या 'हत्यारे' और पीड़ित एक साथ रहेंगे

छत्तीसगढ़ की कांग्रेस सरकार का एक दूसरा महत्वाकांक्षी कार्यक्रम था नया रायपुर राजधानी में बापू के वर्धा आश्रम की तर्ज़ पर 75 एकड़ ज़मीन पर सेवाग्राम का निर्माण करना. बस्तर में माओवादी आंदोलन की समाप्ति के बाद लोग पूछ रहे हैं अब आगे कैसे होगा? क्या हत्यारे और पीड़ित एक साथ रह सकेंगे? गांधीवादी कहां हैं? क्या वे कुछ कर/सोच रहे हैं?

दिल्ली में गांधी शांति प्रतिष्ठान के राजीव वोरा के एक कार्यक्रम में मेरा जाना हुआ. वहां उन्होंने झारखंड से आत्मसमर्पित कुछ माओवादियों को बुलाया था. उन्होंने बताया वे उनके साथ पिछले कुछ सालों से काम कर रहे हैं. उनमें से सबसे बड़े नक्सली नेता भोला ने बताया अब वे जदयू से जुड़ गए हैं. राजीव जी ऐसा ही प्रयोग कश्मीर में भी कर रहे हैं.

मैं पिछले कुछ सालों से नक्सल पीड़ित संगठनों से भी जुड़ा हूं. उन्होंने मुझे कहा,''जिन लोगों ने हमारे परिवारों को बर्बाद किया, उन्हें सरकार गुलाब के फूल दे रही है जबकि हमारा पूरा पुनर्वास होना अभी बाक़ी है.'' ये लोग कुछ ख़ास माओवादी नेताओं का बार-बार ज़िक्र करते हैं, जो आतंक के पर्याय थे और जिन पर सैकड़ों हत्याओं का आरोप है. 

ज़ाहिर है एक ही गांव में हत्यारों और पीड़ितों का साथ-साथ रहना बहुत सरल नहीं होगा. सरकार आत्मसमर्पित नक्सलियों को कुछ प्रशिक्षण तो दे रही है.लेकिन उनमें से कुछ का कहना है,''99 फीसदी आत्मसमर्पित घर वापस जाकर खेती ही करेंगे. सरकारी प्रशिक्षण की ही तरह नक्सल आंदोलन में भी इतने सालों में हमने कुछ ख़ास सीखा नहीं.''

क्या छत्तीसगढ़ में बनना चाहिए पुनर्वास मंत्रालय

दक्षिण अफ़्रीका के ट्रूथ एंड रिकंसिलीएशन कमीशन जैसे उदाहरण माओवादी समस्या से निकले पेरू और कोलम्बिया जैसे देशों में भी मिलते हैं. इसके लिए छत्तीसगढ़ में आदिवासी समाज को ही ख़ास भूमिका निभानी होगी, जिनका उपयोग सरकार आत्मसमर्पण कार्यक्रमों में भी गुलाब का फूल देने के लिए करती रही है.

पर इस काम को और व्यवस्थित किया जाना चाहिए.गांधीवादी नेता राजगोपाल ने पिछली सरकार से एक शांति मंत्री बनाने की मांग की थी, लेकिन अब एक पुनर्वास मंत्रालय तो होना ही चाहिए और नया रायपुर का सेवाग्राम उसका मुख्यालय हो सकता है जहां नक्सलियों और उनके पीड़ितों को साथ लाया जाए और भविष्य की बात शुरू की जाए.

और हर गांव में जो गौठान है उन्हें शांति पार्क की तरह विकसित किया जाना चाहिए. राज्य के गृहमंत्री ने हाल में एक बड़ी बात कही कि वे सुरक्षा कैम्पों को लाइवलीहुड रिसोर्स सेंटर की तरह विकसित करेंगे. इसी योजना के साथ हर गांव के गौठान को भी जोड़ देना चाहिए.

बस्तर की जड़ी-बूटियां और पारंपरिक चिकित्सा पद्धति

बस्तर के जंगलों से कई जड़ी-बूटियां विलुप्त हो रही हैं. इन शांति वनों में उन जड़ी बूटियों को संरक्षित करने का काम करना चाहिए. पिछले 50 सालों में गांव में शहीद हुए लोगों की मूर्ति भी लगानी चाहिए,जैसे पहले गांव का एक सेक्रेड ग्रोव होता था जहां कोई पेड़ नहीं काटता था, यह गांव की नई देवगुडी बन सकती है. यहां इन जड़ी-बूटियों से दवा बनाने का काम शुरू हो. केरल की तर्ज़ पर इन्हें आयुर्वेदिक हेल्थ सेंटर की तरह भी विकसित किया जा सकता है जिससे बहुत से युवाओं को रोज़गार मिल सकता है.

जंगल के गांवों में लोग अधिकतर बीमारी का इलाज आज भी जंगल की जड़ी-बूटी से ही करते हैं, उनके गांव के पारंपरिक चिकित्सकों को आधुनिक स्वास्थ्य व्यवस्था से जोड़कर जिस बीमारी का वे इलाज नहीं कर पाते हैं सिर्फ उसके लिए आधुनिक दवाइयों का उपयोग उन्हें सिखाया जाए.

पिछली सरकार ने पारंपरिक स्वास्थ्य व्यवस्था को नकारते हुए समानांतर मितानिन व्यवस्था शुरू की थी, इसे पूरे देश में भी लागू किया गया था. किसी घर की बहू को मितानिन बनाने की बजाय जो लोग पीढ़ियों से पारंपरिक स्वास्थ्य व्यवस्था का काम करते हैं उन्हें सम्मान और प्रशिक्षण देकर उनके काम को आगे बढ़ाने की ज़रूरत है. ये शांति वन इस काम में जड़ी बूटी के सप्लायर का काम कर सकते हैं.

बस्तर में पारंपरिक वैद्य अगर थोड़े से प्रशिक्षण के बाद प्राथमिक स्वास्थ्य सेवा की ज़िम्मेदारी उठा लें तो सरकार को ब्लॉक और ज़िले में स्वास्थ्य बजट का अधिकतर पैसा डालकर सेकेंडरी और टर्सियरी अस्पताल बनाने चाहिए, जहां सभी तरह के विशेषज्ञ हो उन मरीज़ों के लिए जिनके केस को गांव में हैंडल नहीं किया जा सकता है. 

आत्मसमर्पण करने वाले माओवादियों की पढ़ाई-लिखाई 

तीन साल पहले नई शांति प्रक्रिया के तहत हम लोगों ने नक्सलियों की राजधानी अबूझमाड़ से प्रदेश की राजधानी रायपुर तक एक शांति पैदल यात्रा भी की थी और उस यात्रा में नक्सल पीड़ित और सरेंडर हुए नक्सली दोनों को बुलाया था. वे दोनों साथ साथ 10 दिन पैदल चले और यात्रा के अंत में साथ में प्रेस को संबोधित किया.

एक नक्सल पीड़ित विधवा महिला ने प्रेस को कहा था,''इस यात्रा के पहले हम नक्सलियों को दुश्मन मानते थे.पर इन दस दिनों में जब हम साथ-साथ चले तो हमें ये समझ आया कि हम दोनों ही पीड़ित हैं. उनके हाथ में बंदूक़ ज़रूर थी पर उसकी चाबी किसी और के हाथ में थी. इस यात्रा में हमने सीखा कि हम साथ-साथ रह सकते हैं.''

छत्तीसगढ़ के नए सेवागाम में ऐसे प्रयोग और होने चाहिए. बापू आज ज़िंदा होते तो यही करते. सरेंडर किए नक्सलियों के लिए बापू के नई तालीम के प्रयोग को भी गंभीरता से समझना चाहिए. 1936 में गांधी जी ने वर्धा में टेलीफोन लगवाया था, आज वो होते तो सेवाग्राम में ग्राम विकास के लिए एआई के प्रयोग भी करते.

(डिस्क्लेमर: लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं. वो लोकतांत्रिक मीडिया के प्रयोग सीजीनेट स्वर और छत्तीसगढ़ में नई शांति प्रक्रिया से जुड़े हुए हैं. इस लेख में व्यक्त विचार उनके निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)

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