केरलमम में विधानसभा चुनावों से ठीक पहले पुदुयुगा यात्रा का आयोजन हुआ था. ये यात्रा उस वक्त के नेता विपक्ष और अब सीएम-इन-वेटिंग वी.डी. सतीशन की अगुआई में निकाली गई थी. यात्रा के समापन अवसर पर कांग्रेस पार्टी के नेता राहुल गांधी ने एक टिप्पणी की थी- "ये सभी नेता डांस तो अच्छा करते हैं, लेकिन इन्हें एक साथ ताल मिलाकर थिरकने की जरूरत है." राहुल की ये टिप्पणी इस बात का साफ इशारा था कि अगर केरलम की सत्ता में विजय हासिल करनी है तो पार्टी नेताओं को एकजुट होकर काम करना होगा. एक वक्त तो लगा था कि पार्टी के नेता आपसी मनमुटाव की चलते यूडीएफ की नैया फिर डुबो देंगे, लेकिन उन्होंने एकसाथ मिलकर ताल मिलाई और नतीजा सबके सामने हैं- यूडीएफ ने भारी बहुमत हासिल किया और केरलम की सत्ता में पिछले 10 साल से जमी हुई एलडीएफ को उखाड़ फेंका.
अब जबकि आलाकमान ने वी.डी. सतीशन को राज्य के अगले मुख्यमंत्री के रूप में चुन लिया है, राहुल गांधी की वह 'साथ मिलकर नाचने' वाली सलाह सतीशन के लिए और भी प्रासंगिक हो गई है. इस फैसले तक पहुंचने के लिए भले ही उन्हें दिल्ली दरबार के सामने एक मुश्किल शक्ति प्रदर्शन से होकर गुजरना पड़ा है, लेकिन अब उनके नाम पर मुहर लग चुकी है.
सतीशन की मजबूत दावेदारी के सूत्र
सतीशन की दावेदारी पुख्ता थी. 6 फरवरी से लेकर 7 मार्च तक केरलम के उत्तरी छोर से दक्षिणी तट तक चली पुदुयुगा यात्रा के जरिए उन्होंने खुद को कांग्रेसी अभियान के मुख्य चेहरे के रूप में स्थापित किया. पिछले पांच साल तक नेता प्रतिपक्ष के रूप में उन्होंने पिनराई विजयन से सीधे लोहा लिया और खुद को एक सशक्त विकल्प के रूप में पेश किया. उन्हें यूडीएफ के सबसे शक्तिशाली सहयोगी IUML का अटूट विश्वास हासिल है, जो उनकी ताकत का सबसे बड़ा आधार बना.

कुशल रणनीतिकार वेणुगोपाल भी कम नहीं
सतीशन के उलट, मुख्यमंत्री पद के दूसरे दावेदार के.सी. वेणुगोपाल की भूमिका एक कुशल रणनीतिकार की रही. राहुल गांधी से नजदीकियों के चलते उन्होंने प्रत्याशियों के चयन और रणनीति बनाने से लेकर पूरे कैंपेन को पर्दे के पीछे से कंट्रोल किया. वह खुद विधानसभा चुनाव नहीं लड़े. इस तरह मतदाताओं में कोई भ्रम नहीं फैलने दिया. पार्टी में अनुशासन बनाए रखने और गुटबाजी की किसी भी संभावना को टालने का श्रेय भी वेणुगोपाल को दिया जाना चाहिए.
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चेन्निथला की राह में कई कांटे
सीएम की रेस में तीसरे दावेदार रमेश चेन्निथला थे. नेहरू-गांधी परिवार के प्रति अटूट निष्ठा रखने वाले चेन्निथला ने चुनाव समिति के प्रमुख के रूप में कमान संभाली. उन्होंने मुख्यमंत्री पद के लिए दावेदारी ठोकी, लेकिन 2021 की नाकामी का दाग उनके आड़े आ गया. इस बार उन्हें मुख्यमंत्री का पद तभी मिल सकता था, जब सतीशन और वेणुगोपाल के बीच गतिरोध इस हद तक पहुंच जाता कि सुलह की कोई संभावना नहीं बनती.
कांग्रेस हाईकमान का धर्मसंकट
कांग्रेस आलाकमान के सामने धर्मसंकट यह था कि वो अपने वफादार वेणुगोपाल को चुनें, जो पार्टी के हर फैसले को मानने के लिए तैयार रहते हैं, या फिर सतीशन जैसे जननेता को जो अक्सर अपनी शर्तों पर राजनीति करते हैं. सतीशन ने कड़ा रुख अपना लिया था. वह टस से मस होने को तैयार नहीं थे. उन्होंने साफ कर दिया था कि वह विधानसभा से इस्तीफा दे देंगे और किसी दूसरे के नेतृत्व में सरकार का हिस्सा नहीं बनेंगे. अगर ऐसा होता तो ये पार्टी के लिए किसी आपदा से कम नहीं होता. पार्टी में अस्थिरता से लेकर जनता की बगावत तक का डर था. प्रचंड बहुमत से सत्ता में आई पार्टी इसके लिए तैयार नहीं थी. सतीशन के फेवर में दूसरी चीज आईयूएमएल का समर्थन रहा, जिसके 22 विधायकों ने पलड़ा सतीशन के पक्ष में झुका दिया.

मौके का फायदा उठाने में जुटी बीजेपी
उधर बीजेपी ने मौके का फायदा उठाया और सतीशन की नियुक्ति को आईयूएमएल के दबाव का नतीजा बताकर कांग्रेस पर निशाना साधना शुरू कर दिया है. बीजेपी केरलम में कांग्रेस को 'अल्पसंख्यक संचालित' पार्टी के रूप में पेश करके हिंदू वोट बैंक को गोलबंद करने की ताक में है, ताकि एलडीएफ की करारी हार से बने वैक्यूम का फायदा उठाया जा सके.
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सतीशन की कट्टर सेक्युलर नेता की पहचान
राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोपों का अलग रख दें तो सतीशन की व्यापक पहचान एक कट्टर धर्मनिरपेक्ष और वैचारिक नेता की रही है. वह यूडीएफ को एक विस्तृत सामाजिक गठबंधन के रूप में देखते हैं. पिछले नेताओं के उलट, उन्होंने एनएसएस या एसएनडीपी जैसे ताकतवर सांप्रदायिक या जाति आधारित समूहों का तुष्टीकरण नहीं किया. इसका एक मतलब ये भी है कि उन्हें इन प्रभावशाली ताकतों के कड़े विरोध का सामना करना पड़ सकता है, जो शासन में हस्तक्षेप की आदी रही हैं.
कर्नाटक जैसा 'नाटक' नहीं चाहती थी कांग्रेस
कांग्रेस पार्टी कर्नाटक में नेतृत्व के संकट और 'गृहयुद्ध' जैसी स्थिति को देख चुकी है. वैसे ही हालात केरलम में बनने की आशंका ने कांग्रेस आलाकमान को सचेत कर दिया था. हाईकमान को इस बात का अच्छी तरह अंदाजा था कि सतीशन को हाशिए पर धकेलने का खामियाजा उसे भुगतना पड़ सकता है. ऐसे में पार्टी ने वो फैसला लिया, जिसने न सिर्फ राजनीतिक स्पष्टता दी बल्कि नेतृत्व पर छाए धुंध के बादल भी छंट गए. अब केरलमम को उम्मीद है कि आने वाले पांच वर्षों तक यही स्थिरता और स्पष्टता बनी रहेगी.
गांधी परिवार के विश्वासपात्र होने के नाते के.सी. वेणुगोपाल को सतीशन के नाम पर मनाना ज्यादा मुश्किल नहीं रहा. दिलचस्प बात ये है कि वेणुगोपाल जब सीएम पद की रेस में उतरे थे, तब माना गया था कि दिल्ली से हरी झंडी के बाद ही उन्होंने अपनी दावेदारी ठोकी थी.

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सतीशन की 'विद्रोही' शैली से चिंता
वी.डी. सतीशन के व्यक्तित्व में एक तरह का अधिनायकवाद झलकता है. पश्चिमी घाट की दुर्गम चोटियों को नापने वाले प्रकृति प्रेमी और शब्दों के गहरे पारखी सतीशन स्वभाव से कुछ एकांतप्रिय हैं और अपनी राजनीतिक पटकथा खुद लिखने में यकीन रखते हैं. उनकी यही स्वतंत्र और संभवतः विद्रोही कार्यशैली आलाकमान की पेशानी पर बल डालती है. हाईकमान को डर है कि कहीं तिरुवनंतपुरम की सत्ता पर उसकी पकड़ उसी तरह ढीली न पड़ जाए जैसा कि बेंगलुरु में हुआ.
अब जबकि सतीशन शपथ लेने की तैयारी कर रहे हैं, उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती सबको साथ लेकर आगे बढ़ने की है. अपनी कामयाबी सुनिश्चित करने के लिए उन्हें वेणुगोपाल और चेन्निथला जैसे दोनों ही खेमों के दिग्गजों को सत्ता के गलियारों में एडजस्ट करना होगा. उन्हें 'नृत्य मंडली' में सबसे आगे रहना होगा. सबके साथ ताल मिलाते हुए दिल्ली से लेकर तिरुवनंतपुरम तक की धुनों पर नाचना होगा.
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