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ग्लेशियर फटने पर तुरंत मिलेगा अलर्ट, उत्तराखंड में लगाए गए आठ सेंसर, कितने देर पहले मिलेगी खतरे की जानकारी?

उत्तराखंड आपदा प्रबंधन विभाग के सचिव विनोद कुमार सुमन ने बताया कि यह पहली ग्लेशियर झील है जिस पर कोई अर्ली वार्निंग सिस्टम लगाया गया है. इस अर्ली वार्निंग सिस्टम को विकसित करने का काम सीबीआरआई ने किया है.

ग्लेशियर फटने पर तुरंत मिलेगा अलर्ट, उत्तराखंड में लगाए गए आठ सेंसर, कितने देर पहले मिलेगी खतरे की जानकारी?
फाइल फोटो
NDTV

उत्तराखंड में 5 गलेशियर झीलों में से एक झील वसुंधरा ताल में अर्ली वार्निंग सिस्टम लगाया है. वसुंधरा ताल में अर्ली वार्निंग सिस्टम को सीबीआरआई रुड़की तथा वाडिया की टीम ने लगाया है. वैज्ञानिकों की टीम ने करीब आठ सेंसर लगाए गए हैं. और 2 घंटे पहले यह सिस्टम किसी भी खतरे से पहले अर्ली वार्निंग सिस्टम से जानकारी मिल पाएगी लगभग 15 दिनों के एक्सपीडिशन के बाद वसुंधरा लाल पर यह अर्ली वार्निंग सिस्टम लगाया गया है.

उत्तराखंड में नेशनल डिजास्टर मैनेजमेंट अथॉरिटी ने सबसे ज्यादा संवेदनशील 13 ग्लेशियर जिलों के भविष्य को लेकर रिसर्च की थी. ये जिले सबसे ज्यादा संवेदनशील थे. इस रिसर्च में पांच अति संवेदनशील ग्लेशियर झील है, चमोली में वसुंधरा ताल, चमोली जिले में सरस्वती झील, पिथौरागढ़ में मबांग झील और प्यूंगरु झील, उत्तरकाशी जिले की केदारताल झील है. 

करीब 15 वैज्ञानिकों की टीम चमोली जिले की वसुंधरा झील में अर्ली वार्निंग सिस्टम लगाया है.ये 4700 मीटर से अधिक ऊंचाई पर स्थित है. राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण ने वसुंधरा झील को  'श्रेणी ए' जो सबसे अधिक जोखिम वाली श्रेणी  में रखा है. यदि यह झील टूटी, तो नीचे बसे इलाकों में कुछ ही मिनटों में भारी तबाही आ सकती है.

• उत्तराखंड में पांच हाई रिस्क ए कैटेगरी झीलें हैं
• वसुंधरा ग्लेशियर झील चमोली जिले के नीति घाटी में मौजूद है
• वसुंधरा ग्लेशियर झील ईस्ट कामेट ग्लेशियर के पास 4700 मीटर से अधिक ऊंचाई पर मौजूद है
•   एक किलोमीटर लंबी ,600 मीटर चौड़ी,38.5 मीटर गहरी है
• वसुंधरा झील में 1 करोड़ 10 लाख क्यूसेक पानी है
• जोखिम और खतरे के लेवल के हिसाब से यह झील ए कैटेगरी के हाई रिस्क में शामिल है

अर्ली वॉर्निंग सिस्टम कैसे लगाए गए हैं?

उत्तराखंड आपदा प्रबंधन विभाग के सचिव विनोद कुमार सुमन ने बताया कि यह पहली ग्लेशियर झील है जिस पर कोई अर्ली वार्निंग सिस्टम लगाया गया है. इस अर्ली वार्निंग सिस्टम को विकसित करने का काम सीबीआरआई ने किया है.

सचिव विनोद सुमन ने बताया कि उत्तराखंड में ग्लेशियल झीलों से होने वाले संभावित खतरे को कम करने और उच्च हिमालयी क्षेत्रों में ग्लेशियल झीलों की निगरानी एवं पूर्व चेतावनी तंत्र को मजबूत करने की दिशा में कदम आगे बढ़े हैं.

वसुंधरा ताल में स्थापित प्रणाली के अंतर्गत ऑल-इन-वन मौसम सेंसर लगाया गया है, जो हवा की गति एवं दिशा, वर्षा, सौर विकिरण, वायु तापमान और वायुदाब से संबंधित आंकड़े मापेगा.

झील के जलस्तर की निगरानी के लिए फ्लोटिंग और पानी के भीतर सेंसर स्थापित किए गए हैं. संभावित बाढ़ के प्रभाव से उत्पन्न तात्कालिक कंपन, झुकाव और भू-गतिविधियों की निगरानी के लिए 2 एक्सेलेरोमीटर और टिल्ट सेंसर लगाए गए हैं.

 
हिमस्खलन से संबंधित गतिविधियों की निगरानी के लिए एक अतिरिक्त एक्सेलेरोमीटर और टिल्ट सेंसर स्थापित किया गया है. इसके अतिरिक्त, बर्फ की गहराई मापने के लिए स्नो डेप्थ सेंसर, बर्फ की सतह के नीचे विभिन्न गहराइयों पर तापमान मापने के लिए सात तापमान सेंसर तथा झील की सतह के तापमान की निगरानी के लिए एक तापमान सेंसर लगाया गया है.

इन उपकरणों से हासिल आंकड़े झील के जलस्तर, स्थानीय मौसम, बर्फ की स्थिति और आसपास होने वाली संभावित भू-गतिविधियों में बदलाव को समझने में सहायक होंगे.

सेंसर सामान्य परिस्थितियों में प्रत्येक दो घंटे में आंकड़े सीबीआरआई, रुड़की तथा उत्तराखण्ड राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (यूएसडीएमए) में स्थापित डैशबोर्ड पर भेजेंगे. दोनों स्थानों पर प्राप्त आंकड़ों की नियमित निगरानी की जाएगी. किसी भी आपातकालीन स्थिति में निर्धारित दो घंटे के अंतराल की प्रतीक्षा किए बिना सेंसर तत्काल आंकड़े भेज सकेंगे, जिससे संभावित असामान्य परिस्थितियों की समय रहते पहचान करने में सहायता  मिलेगी.                   

सौर ऊर्जा और बैटरी से मिलेगा विद्युत बैकअप

दुर्गम क्षेत्र में उपकरणों को निर्बाध विद्युत आपूर्ति उपलब्ध कराने के लिए सौर पैनल और बैटरी की व्यवस्था की गई है. सिस्टम में 280 एम्पीयर की क्षमता की बैटरी लगाई गई है, जो सौर पैनल को पर्याप्त धूप नहीं मिलने की स्थिति में लगभग 10 दिनों तक बैकअप देने में सक्षम है.

उपकरणों की स्थापना के लिए स्टील के मॉड्यूलर डिजाइन पर आधारित फाउंडेशन तैयार किया गया है. इसमें स्थानीय स्तर पर उपलब्ध सामग्री का उपयोग किया गया है. सीमेंट का प्रयोग नहीं किया गया है. 

फाउंडेशन को स्थानीय पत्थरों के माध्यम से मजबूती प्रदान की गई है. क्षेत्र में हवा की गति लगभग 15 से 50 किलोमीटर प्रति घंटा आंकी गई है, जबकि फाउंडेशन का डिजाइन 100 किलोमीटर प्रति घंटा तक की हवा की गति को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है.

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