यूपी में दो ऐसे मंत्री हैं, जिनमें बहुत कुछ एक जैसा है. दोनों एक जाति के हैं, दोनों एक ही सरकार में मंत्री हैं, वो भी कैबिनेट स्तर के, दोनों एक ही इलाके से आते हैं और दोनों बयानबाजी में माहिर. बस दोनों के दल भी अलग हैं और दिल भी नहीं मिलता. अब आप सोच रहे हैं कि आखिर ये कौन हैं? ये हैं ओम प्रकाश राजभर और अनिल राजभर. इन दोनों नेताओं में अदावत पुरानी है लेकिन अब खुलकर दिखाने में दोनों गुरेज नहीं कर रहे.
पूरा मामला क्या है?
कुछ दिन पहले अनिल राजभर एक कार्यक्रम में बोल रहे थे. तभी पीला गमछा पहने कुछ लोग नारेबाजी करने लगे. मंत्री जी को गुस्सा आया तो उन्होंने इन लोगों को ओपी राजभर का बताते हुए कहा कि जैसे इनका नेता चोर, वैसे ये भी चोर. इसके बाद मंत्री जी ने अपने समर्थकों से कहा कि इन्हें निकाल बाहर करो तो नारेबाजी करने वाले धकेलकर फेंक दिए गए. इनके बाद जब इस घटना पर ओपी राजभर से जवाब मांगा गया तो उन्होंने अनिल राजभर को चुनौती देते हुए कहा कि उंगली उठाने वाले 23 साल पहले लोहे की दुकान चलाते थे और चोरी करते थे. उन्होंने कहा कि अगर मर्द हैं और मां का दूध पिया है तो बतायें कि वोट बेचने की दुकान कहां है.
कौन हैं ये दो राजभर नेता?
सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के अध्यक्ष ओम प्रकाश राजभर यूपी में बीजेपी के सहयोगी हैं और सरकार में पंचायती राज के साथ साथ अल्पसंख्यक कल्याण के कैबिनेट मंत्री भी हैं. दूसरे मंत्री हैं बीजेपी नेता और श्रम एवं सेवायोजन मंत्री अनिल राजभर. दोनों पूर्वांचल से आते हैं. एक की जन्मभूमि वाराणसी है तो दूसरे की कर्मभूमि. दोनों राजभर समाज से आने वाले पिछड़ों के नेता हैं. अनिल राजभर बीजेपी के नेता हैं तो वहीं ओम प्रकाश राजभर बीजेपी के सहयोगी दल के अध्यक्ष हैं.
दोनों नेताओं में लड़ाई कितनी पुरानी?
ओम प्रकाश राजभर और अनिल राजभर की लड़ाई को नई नहीं है. एक ही जाति और इलाके से आने की वजह से दोनों में आपस में तलवारें खिंचीं रहती हैं. ये लड़ाई साल 2022 में तब और बढ़ गई जब बीजेपी में अनिल राजभर को वाराणसी की शिवपुर विधानसभा सीट से उम्मीदवार बनाया. तब ओपी राजभर समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन में थे. ओपी राजभर ने शिवपुर सीट से अपने बेटे अरविंद राजभर को चुनाव लड़ा दिया. जीत अनिल राजभर की हुई लेकिन चुनाव बाद ओपी राजभर फिर बीजेपी के साथ आए और दो बड़े मंत्रालय लेकर मंत्री बन गए.
राजभरों का नेता कौन?
अनिल राजभर और ओम प्रकाश राजभर में अगर तुलना को जाए तो ओम प्रकाश राजभर हर लिहाज से भारी पड़ते दिखाई देते हैं. बीजेपी के लोग ही मानते हैं कि राजभरों को मुख्यधारा की राजनीति में लाने का काम ओम प्रकाश राजभर ने ही किया है. उनकी जमीनी पकड़ अपनी जाति में है. इसी वजह से साल 2017 में ओपी राजभर बीजेपी के सहयोगी दल बने और सरकार में मंत्री भी बनाए गए. इसके बाद बीजेपी का साथ छोड़ने के बाद भी बीजेपी ने ना सिर्फ उन्हें वापस अपने साथ लाए बल्कि सो बड़े विभाग देकर उनका कद ऊंचा कर दिया.
अनिल राजभर कितने हेवीवेट?
बात करें अनिल राजभर की तो यूपी की राजनीति में ये कहा जाता है कि अनिल राजभर की राजनीति ओके प्रकाश राजभर की वजह से चल रही है. ओम प्रकाश राजभर की जमीनी पकड़ की वजह से बीजेपी ने कई राजभर नेताओं को बढ़ाने की कोशिश की. इनमें एक अनिल राजभर हैं. माना जाता है कि ओम प्रकाश राजभर को कंट्रोल में रखने के लिए बीजेपी अनिल राजभर को बढ़ाती रही है. ये सही है कि विधानसभा चुनाव में अनिल राजभर जीते लेकिन ये भी सच है कि वो ताक़त उनकी नहीं बल्कि बीजेपी की थी.
ये लड़ाई कहां तक जाएगी?
यूपी के अगले एक साल में विधानसभा का चुनाव होना है. इस चुनाव से पहले दो ओबीसी समाज के नेताओं का आपस में टकराना बीजेपी के लिए शुभ संकेत नहीं है. ऐसे में संभव है जल्द इन दोनों नेताओं से संयम बरतने के लिए कहा जाए. लेकिन सवाल ये है कि दोनों मंझे हुए खिलाड़ी हैं. ओम प्रकाश राजभर तो जाने ही अपने बयानों के लिए जाते हैं. ऐसे में ओपी राजभर पहले चुप होंगे, इसकी गुंजाइश तो बेहद कम है. हालांकि अनिल राजभर तो बीजेपी अगर चुप करा दे तो हो सकता है ओपी राजभर भी खुद को रोक लें. हालांकि ये राजनीति है और राजनीति में कब क्या हो जाए, ये कहा नहीं जा सकता.
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