- राहुल गांधी ने पूर्व सेना प्रमुख नरवणे की अप्रकाशित किताब का हवाला देते हुए कई सवाल उठाए
- राहुल के बयान के बीच बीजेपी ने जनरल थिमैया का जिक्र कर उनको कांग्रेस का इतिहास बताने की कोशिश की
- नेहरू और जनरल थिमैया के बीच चीन नीति और सेना के नागरिक नियंत्रण को लेकर गंभीर विचारभेद थे
लोकसभा में सोमवार को राहुल गांधी ने पूर्व सेना प्रमुख मनोज मुकंद नरवणे की एक ऐसी किताब का जिक्र करते हुए पीएम मोदी के साथ उनके संबंधों पर सवाल उठाया, जो कभी छपी ही नहीं. उन्होंने पूर्व सेना प्रमुख की तथाकथित किताब के कुछ अंशों का हवाला दिया, जिस पर रक्षा मंत्री और गृह मंत्री ने आपत्ति जताई. राहुल गांधी ने नरवणे का जिक्र किया तो बीजेपी ने उनको जनरल थिमैया की याद दिलाई. उनका जिक्र पीएम मोदी ने साल 2018 में अपनी कर्नाटक रैली में भी किया था. आखिर जनरल थिमैया थे कौन, जो एक बार फिर चर्चा में हैं.
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क्यों हो रहा जनरल थिमैया का जिक्र
बता दें कि जनरल थिमैया साल 1957 से 1961 के बीच भारतीय सेना के प्रमुख रहे. कहा जाता है कि उनको आर्मी चीफ नेहरू ने अपनी निजी पसंद से बनाया और उसके साथ किसी विवाद के चलते ही थिमैया ने इस्तीफा दिया था. थिमैया का जिक्र कर बीजेपी राहुल गांधी को ये बताने की कोशिश कर रही है कि पीएम मोदी और नरवणे के संबंधों पर सवाल उठाने से पहले वह अपनी ही सरकार का इतिहास जरूर देख लें. जनरल थिमैया और पीएम नेहरू के संबंधों पर नजर जरूर डाल लें.
1957 में नेहरू ने बनाया था सेना प्रमुख
1947-48 में कश्मीर में कबाइली पाकिस्तानी सैनिकों को धूल चटाने के लिए हैदराबाद अभियान का नेतृत्व करने वाले थिमैया से तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू काफी खुश थे. जिसके बाद 1957 में नेहरू ने उनको सेना प्रमुख बना दिया. ये कहा जाता है कि नेहरू ने अपनी व्यक्तिगत पसंद के तौर पर उनको आर्मी चीफ बनाया था. उसी साल उनका विवाद रक्षा मंत्री कृष्ण मेनन के साथ हो गया, इस सबके बीच थिमैया ने इस्तीफा देने की पेशकश कर दी. फिर वक्त वो भी आया जब उन्होंने पद से इस्तीफा दे दिया. इस दौरान जमकर सियासत हुई थी. इसे लेकर नेहरू पर भी आरोप लगाए गए थे.
नेहरू और जनरल थिमैया के बीच क्यों हुआ विवाद ?
पीएम नेहरू को लगता था कि नए भारत में सेना की भूमिका पर फिर से विचार करने की जरूरत है.उनका जोर ऐसी नीति पर था जो सेना को नागरिक प्राधिकार के अधीन करने वाली थी. नेहरू चीन के साथ अच्छे संबंधों पर जोर दे रहे थे. जबकि थिमैया ने 1959-60 में ही सरकार को चीन सीमा की स्थिति और खतरे के बारे में आगाह कर दिया था. लेकिन नेहरू को चीन पर भरोसा था. वह चीन के साथ 1954 में ही पंचशील समझौता कर चुके थे. यहां दोनों के विचार एक दूसरे से मेल नहीं खा रहे थे.
नेहरू के रक्षा मंत्री के साथ भी था थिमैया का विवाद
दूसरी तरफ रक्षा मंत्री वीके कृष्ण मेनन का सेना के मामलों में दखल देना थमैया को पसंद नहीं था. उनका मानना था कि रणनीतिक मामलों में सेना को स्वायत्तता मिली चाहिए. लेकिन नेहरू को लगता था कि सैन्य तंत्र पर नागरिक-राजनीति कंट्रोल होना चाहिए. माना जाता है कि इसी टकराव के बीच जनरल थिमैया ने आर्मी चीफ के पद से इस्तीफा दे दिया.
ये सब बातें किसी से छिपी नहीं हैं. लेकिन वर्तमान समय में राहुल गांधी पीएम मोदी और पूर्व सेना प्रमुख नरवणे के बीच संबंधों पर सवाल उठा रहे हैं, जिसके बाद बीजेपी सांसदनिशिकांत दुबे ने कहा, "मैं आपको नेहरू का यह पुराना पत्र दिखाना चाहता हूं. जिसमें उन्होंने जनरल कारियाप्पा के बारे में लिखा था कि वे मानसिक रूप से भटक गए हैं. निशिकंत ने कहा कि नेहरू परिवार का जनरल थिमैया से विवाद था, जनरल कारियाप्पा से विवाद था। और बांग्लादेश युद्ध का नेतृत्व करने वाले फील्ड मार्शल मानेकशॉ से विवाद था. उनका इतिहास कायरता और भागने का इतिहास है. राहुल खुद भी चार घंटों से वे सिर्फ बेबुनियाद और झूठ बोल रहे हैं, ऐसी बातें जो किसी किताब में प्रकाशित नहीं हुई हैं, निराधार हैं.
जनरल थिमैया के बारे में और जानें
'कर्नाटक के रहने वाले जनरल थिमैया को प्यार से लोग टिमी कहते थे. थिमैया का जन्म 30 मार्च, 1906 को कोडागु के मदिकेरी में हुआ था. शुरुआती शिक्षा के बाद परिवार ने उनको आठ साल की उम्र में पढ़ाई के लिए कुन्नूर के सेंट जोसेफ कॉलेज भेज दिया था. कुछ साल बाद उन्हें बेंगलुरू के बिशप कॉटन ब्वायज़ स्कूल में भेजा गया. स्कूली पढ़ाई खत्म करने के बाद उन्होंने प्रिंस ऑफ वेल्स रॉयल इंडियन मिलिटरी कॉलेज में दाखिला लिया, जो उस समय तक भारतीय सेना में शामिल होने के लिए जरूरी कदम था. RIMC से ग्रेजुएट हो जाने के बाद थिमैया उन छह भारतीय कैडेटों में शामिल थे, जिन्हें आगे की ट्रेनिंग के लिए सैंडहर्स्ट स्थित रॉयल मिलिटरी कॉलेज में दाखिला दिया गया.
जनरल थिमय्माैया ऐसे अकेले भारतीय हैं, जिन्होंने द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान एक इन्फैन्ट्री ब्रिगेड की कमान संभाली.भारतीय सेना से सेवानिवृत्त होने के बाद उन्हें जुलाई, 1964 में साइप्रस में संयुक्त राष्ट्र शांतिसेना का कमांडर नियुक्त किया गया, और उनका देहांत 18 दिसंबर, 1965 को साइप्रस में ही ड्यूटी पर रहने के दौरान हुआ.
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