दिल्ली के जंतर-मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) का विरोध-प्रदर्शन अब खत्म हो चुका है. लेकिन इस प्रदर्शन ने सामाजिक न्याय, समानता और मेरिट को लेकर एक राष्ट्रीय बहस शुरू की है. बहस अभी भी जारी है. उत्तर प्रदेश में 2027 में विधानसभा चुनाव होना है. यूपी में यह बहस सीधे चुनावी गणित से जुड़ती दिखाई दे रही है. इस समय उत्तर प्रदेश में तीन बड़े राजनीतिक पहलू एक साथ सामने हैं, बीजेपी का पारंपरिक सवर्ण वोट बैंक, समाजवादी पार्टी की बढ़ती जातीय पहुंच और पूरे देश में सामाजिक न्याय को लेकर चल रही बहस. देश के बहुत कम राज्यों में ये तीनों बातें एक साथ और इतने बड़े स्तर पर दिखाई देती हैं.
क्या कहते हैं जातियों के आंकड़े
माना जाता है कि उत्तर प्रदेश की आबादी में ब्राह्मण करीब 10 फीसद है. इनकी सबसे अधिक संख्या मध्य और पूर्वी उत्तर प्रदेश में है. अगर राजपूत, बनिया और अन्य सवर्ण समुदायों को भी जोड़ दिया जाए, तो यह एक बड़ा और प्रभावशाली वोट बैंक बन जाता है. पिछले दो चुनाव में इस वर्ग ने बड़े पैमाने पर बीजेपी का समर्थन किया है.
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सीएसडीएस-लोकनीति के सर्वे के मुताबिक 2022 विधानसभा चुनाव में ब्राह्मण, राजपूत और वैश्य जैसे सवर्ण मतदाताओं में से 79 फीसद ने एनडीए को वोट दिया था. जबकि विपक्षी गठबंधन को केवल 16 फीसद वोट मिले थे. इसके बाद 2024 लोकसभा चुनाव में भी यह समर्थन करीब-करीब बना रहा. इस सर्वे में पाया गया कि 10 में से नौ राजपूत मतदाताओं ने बीजेपी का साथ दिया.हालांकि, 2024 के चुनाव में दूसरी तरफ एक बड़ा बदलाव भी देखने को मिला.विपक्षी इंडिया गठबंधन ने उत्तर प्रदेश में 43 सीटें जीतीं. वहीं बीजेपी को 33 सीटें मिलीं. इसका मुख्य कारण ओबीसी, दलित और मुस्लिम वोटों का एकजुट होना था. विपक्ष ने संविधान और आरक्षण खत्म होने की आशंका को मुद्दा बनाया. बीजेपी इसका ठीक से जवाब नहीं दे पाई. यानी सवर्ण वोट अभी भी बीजेपी के साथ हैं, लेकिन बाकी सामाजिक गठबंधन ने दिखा दिया कि बीजेपी को हराया जा सकता है.
क्या यूजीसी के कानून से खफा हैं सवर्ण मतदाता
इस साल विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के इक्विटी विवाद ने पहली बार बीजेपी के इस सवर्ण वोट बैंक में कुछ असंतोष पैदा किया. उत्तर प्रदेश में इसका खास असर देखने को मिला. बरेली के एक मजिस्ट्रेट ने विरोध में इस्तीफा दे दिया और लखनऊ में बीजेपी के 10 से अधिक सदस्यों ने पार्टी छोड़ दी. यह केवल विपक्ष का प्रचार नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे बीजेपी के मजबूत समर्थन आधार में आई हल्की दरार के रूप में देखा जा रहा है.
पूर्वी उत्तर प्रदेश, जहां ब्राह्मणों की संख्या अधिक है और जो मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का राजनीतिक क्षेत्र भी है. वहां इस बदलाव पर खास नजर रहेगी. अगर यहां ब्राह्मण वोटों में कमी आती है, तो इसका सबसे ज्यादा असर बीजेपी पर पड़ेगा.
बीजेपी ने इस चुनौती का जवाब मनोज पांडेय को आगे करके दिया है. वह पहले अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी में थे. अब वो योगी सरकार में मंत्री हैं. उन्हें 2027 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी का प्रमुख सवर्ण चेहरा माना जा रहा है.
उत्तर प्रदेश में कैसी है ब्राह्मण वोटों की राजनीति
समाजवादी पार्टी ने माता प्रसाद पांडेय को आगे किया है. उन्हें विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष बनाया गया. सात बार के विधायक पांडेय दो बार विधानसभा अध्यक्ष रह चुके हैं. अखिलेश यादव अब अपनी PDA (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) रणनीति को आगे बढ़ाते हुए इसमें 'अगड़ा' (सवर्ण) वर्ग को भी जोड़ने की कोशिश कर रहे हैं. इसी रणनीति के तहत वो गोरखपुर के वरिष्ठ ब्राह्मण नेता रहे हरिशंकर तिवारी को श्रद्धांजलि देने के लिए आयोजित समारोह में शामिल हुए थे.
2022 विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी के नेतृत्व वाले गठबंधन ने 402 सीटों पर चुनाव लड़ते हुए 40 ब्राह्मण उम्मीदवार उतारे थे. वहीं बीजेपी ने 68 ब्राह्मणों को टिकट दिया था, यह किसी एक जाति को दिए गए सबसे अधिक टिकट थे. इससे साफ है कि दोनों पार्टियां ब्राह्मण वोटों को बेहद महत्वपूर्ण मानती हैं. अब सवाल यह है कि क्या 2027 में समाजवादी पार्टी इस वर्ग में अपनी हिस्सेदारी बढ़ा पाएगी?
बहुजन समाज पार्टी भी इस मुकाबले से बाहर नहीं है. साल 2022 के चुनाव से पहले मायावती ने पार्टी के महासचिव सतीश चंद्र मिश्र के नेतृत्व में ब्राह्मणों को जोड़ने का अभियान चलाया था. उनका कहना था कि बीजेपी ब्राह्मणों के हितों की रक्षा नहीं कर सकती. हालांकि इससे चुनाव नतीजों में ज्यादा फर्क नहीं पड़ा, लेकिन इससे यह साफ हो गया कि उत्तर प्रदेश में ब्राह्मण वोटों के लिए अब तीनों बड़ी पार्टियां कोशिश कर रही हैं.
बसपा का दलित ब्राह्मण समीकरण
मायावती ने 2007 में 'सर्वजन' रणनीति के तहत रिकॉर्ड 86 ब्राह्मणों को टिकट दिया था. दलित-ब्राह्मण गठजोड़ की बदौलत बसपा ने 403 में से 206 सीटें जीतकर पूर्ण बहुमत हासिल किया था. यह उदाहरण आज भी इस बात के प्रमाण के रूप में दिया जाता है कि उत्तर प्रदेश में ब्राह्मण मतदाता किसी एक पार्टी के स्थायी समर्थक नहीं हैं. सही परिस्थितियां और प्रभावी संदेश मिलने पर उनका रुख बदल सकता है.
अब सबसे महत्वपूर्ण सवाल ये है कि क्या सपा का ब्राह्मणों को अपने साथ जोड़ने का प्रयास वोटों में बदलेगा या सिर्फ सहानुभूति तक सीमित रहेगा? क्या मनोज पांडेय की मौजूदगी बीजेपी के सवर्ण वोटों को बनाए रख पाएगी या यूजीसी विवाद का असर ज्यादा होगा? क्या समाजवादी पार्टी 2027 में 2022 के मुकाबले कहीं अधिक ब्राह्मण उम्मीदवार उतारेगी? अगर 2027 में सपा और कांग्रेस मिलकर चुनाव लड़ते हैं, तो कांग्रेस यूजीसी विवाद और आरक्षण के मुद्दे पर क्या रुख अपनाएगी? इन सवालों के जवाब ही तय कर सकते हैं कि 2027 का उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव किसके पक्ष में जाएगा. कई राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह पिछले एक दशक का सबसे कड़ा और दिलचस्प चुनाव हो सकता है.
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