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पद्मश्री तीजनबाई का पीएम इंदिरा को जवाब और पेरिस की चिट्ठी, पढ़ें महान पंडावनी गायिका की अनोखी कहानी

पद्मविभूषण और प्रसिद्ध पंडवानी गायिका तीजनबाई का निधन लोककला जगत के लिए अपूरणीय क्षति है. संघर्षों से भरे जीवन में उन्होंने महाभारत की कथाओं को देश-दुनिया तक पहुंचाया. पढ़िए तीजनबाई की अनोखी कहानी...

पद्मश्री तीजनबाई का पीएम इंदिरा को जवाब और पेरिस की चिट्ठी, पढ़ें महान पंडावनी गायिका की अनोखी कहानी
फाइल फोटो
  • तीजनबाई ने छत्तीसगढ़ की लोकसंस्कृति को विश्व स्तर पर महाभारत की कथाओं के माध्यम से पहचान दिलाई है.
  • उनका जीवन संघर्षों, साहस और आत्मसम्मान से भरा रहा, जिसमें उन्होंने पुरुष प्रधान पंडवानी कला को नई पहचान दी.
  • तीजनबाई ने 13 वर्ष में पहली सार्वजनिक पंडवानी प्रस्तुति दी और अपने दम पर अंतरराष्ट्रीय मंचों तक पहुंची.

छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति को दुनिया के सबसे बड़े मंचों तक पहुंचाने वाली पंडवानी गायिका तीजनबाई अब हमारे बीच नहीं रहीं. उनके निधन के साथ ही लोककला का एक ऐसा युग समाप्त हो गया, जिसने महाभारत की कथाओं को गांव की चौपाल से लेकर अंतरराष्ट्रीय सभागारों तक पहुंचाया. तीजनबाई सिर्फ एक कलाकार नहीं थीं, बल्कि छत्तीसगढ़ की पहचान थीं. 

उनकी जिंदगी संघर्ष, साहस, आत्मसम्मान और असाधारण प्रतिभा की ऐसी कहानी है, जिसमें प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को दिया बेबाक जवाब भी है और पेरिस से बिना पूरे पते के पहुंची एक चिट्ठी भी. उनकी पूरी यात्रा किसी लोकगाथा से कम नहीं रही.

बारिश भरी रात में हमेशा के लिए खामोश हुई आवाज

4 और 5 जुलाई की दरम्यानी रात करीब 3:15 बजे तीजनबाई ने अंतिम सांस ली. उनकी आवाज में महाभारत के पात्र जीवित हो उठते थे. जब वह हाथ में तंबूरा लेकर मंच पर खड़ी होती थीं तो श्रोता कथा की दुनिया में खो जाते थे. छत्तीसगढ़ में लोग उन्हें केवल कलाकार नहीं, बल्कि स्नेह से "तीजन दाई" कहकर पुकारते थे. दाई मतलब मां...छत्तीसगढ़ की वो मां, जो लोकसंस्कृति की ऐसी प्रतिनिधि थीं, जिन्होंने पूरी दुनिया को छत्तीसगढ़ की मिट्टी की पहचान कराई.

रणबीर कपूर से मुलाकात और जीवन को लेकर उनका नजरिया

अगस्त 2014 में फिल्म अभिनेता रणबीर कपूर और निर्देशक इम्तियाज अली भिलाई स्थित उनके घर पहुंचे थे. इसी दौरान तीजनबाई ने अपनी जिंदगी को बेहद सादगी से बयान किया था. उन्होंने कहा था कि वह कभी स्कूल नहीं गईं, पढ़-लिख नहीं सकीं, लेकिन बाद में कई विश्वविद्यालयों ने उन्हें मानद उपाधियां दीं. उन्होंने दुनिया के कई देशों की यात्राएं कीं, बड़े सम्मान हासिल किए, लेकिन उनके लिए सबसे बड़ा सुख अपनी कला और लोगों का प्यार था. वह मुस्कुराते हुए अक्सर कहती थीं, "मोर बर त इही सरग हे", यानी मेरे लिए तो यही स्वर्ग है.

जब इंदिरा गांधी को दिया बेबाक जवाब

तीजनबाई के जीवन से जुड़े कई रोचक किस्से आज भी लोगों को याद हैं. एक बार दिल्ली में प्रस्तुति के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने उनसे कहा, "आप बहुत अच्छा महाभारत करती हैं." इस पर तीजनबाई ने तुरंत मुस्कराकर जवाब दिया, "मैडम, मैं महाभारत नहीं करती हूं, महाभारत की कथा सुनाती हूं." उनकी यह सादगी और हाजिरजवाबी इंदिरा गांधी को भी प्रभावित कर गई थी.

पेरिस से आई थी बिना पते वाली चिट्ठी

साल 1985-86 में तीजनबाई ने फ्रांस की राजधानी पेरिस में आयोजित भारत महोत्सव में पंडवानी की प्रस्तुति दी थी. उनकी कला का प्रभाव इतना गहरा था कि कुछ समय बाद पेरिस से उन्हें एक चिट्ठी भेजी गई. हैरानी की बात यह थी कि लिफाफे पर न गांव का नाम था, न जिला और न ही पूरा पता. सिर्फ इतना लिखा था "Teejan Bai, India". इसके बावजूद वह चिट्ठी सही जगह पहुंच गई. यह उनकी लोकप्रियता और पहचान का अनोखा उदाहरण था.

नाना से मिली पंडवानी की प्रेरणा

तीजनबाई का जन्म छत्तीसगढ़ के लोकपर्व 'तीज' के दिन हुआ था, इसलिए उनका नाम तीजन रखा गया. बचपन में उन्होंने अपने नाना बृजलाल पार्थी को पंडवानी गाते हुए सुना. उस प्रस्तुति ने उनके जीवन की दिशा बदल दी. महाभारत की कथा, पात्रों का अभिनय और नाना की शैली इतनी गहराई से उनके मन में उतर गई कि उन्होंने तय कर लिया कि पंडवानी ही उनका जीवन बनेगी.

13 साल की उम्र में पहली प्रस्तुति

साल 1956 में जन्मी तीजनबाई ने महज 13 वर्ष की उम्र में चंद्रखुरी गांव में पहली सार्वजनिक पंडवानी प्रस्तुति दी. इसके बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा. भले ही उन्हें औपचारिक शिक्षा नहीं मिली, लेकिन अपनी कला के दम पर वह दुनिया भर में सम्मानित हुईं. बाद में उन्होंने अपना नाम लिखना और हस्ताक्षर करना भी सीखा, लेकिन असली शिक्षा उन्हें लोककथा और मंच से मिली.

संघर्षों से भरा रहा शुरुआती जीवन

पंडवानी सीखने का उनका फैसला आसान नहीं था. उस दौर में यह पुरुषों की कला मानी जाती थी और महिलाओं का मंच पर आना स्वीकार नहीं किया जाता था. परिवार और समाज दोनों ने उनका विरोध किया. यहां तक कि उन्हें घर से भी निकाल दिया गया. लेकिन तीजनबाई ने हार नहीं मानी. उनके लिए पंडवानी केवल कला नहीं, बल्कि जीवन का उद्देश्य थी.

आत्मसम्मान के लिए छोड़ा पति का साथ

तीजनबाई के जीवन का एक अध्याय उनकी निजी जिंदगी से भी जुड़ा है. उन्होंने बताया था कि एक बार मंच पर प्रस्तुति के दौरान उनके पति ने आकर अभद्र व्यवहार किया. उस घटना के बाद उन्होंने मंच से ही आत्मसम्मान के साथ रिश्ते को समाप्त करने का फैसला कर लिया. उनके इस साहस ने उन्हें सिर्फ एक कलाकार नहीं, बल्कि एक मजबूत व्यक्तित्व के रूप में भी स्थापित किया.

पुरुषों की कला को दी नई पहचान

1960 और 70 के दशक में पंडवानी पर पुरुष कलाकारों का वर्चस्व था. लेकिन तीजनबाई ने कापालिक शैली को अपनाकर इस परंपरा को बदल दिया. इस शैली में कलाकार खड़े होकर अभिनय, संवाद और भाव-भंगिमाओं के साथ प्रस्तुति देता है. यही शैली आगे चलकर उनकी पहचान बन गई और उन्होंने पंडवानी को नई ऊंचाइयों तक पहुंचा दिया.

सम्मानों से भरा रहा लंबा सफर

तीजनबाई को वर्ष 1988 में पद्मश्री, 1996 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, 2003 में डी.लिट., बाद में पद्मभूषण और फिर पद्मविभूषण जैसे देश के बड़े सम्मान मिले. दुनिया के कई देशों में उन्होंने पंडवानी की प्रस्तुति दी और हर जगह श्रोताओं को मंत्रमुग्ध किया. सम्मान बढ़ते गए, लेकिन उनकी पहचान हमेशा हाथ में तंबूरा लिए एक लोकगायिका की ही रही.

अंतिम वर्षों में स्वास्थ्य ने दिया साथ छोड़

साल 2018 में उन्हें दिल का दौरा पड़ा था, लेकिन स्वस्थ होते ही वह फिर मंच पर लौट आईं. हालांकि कोरोना काल के बाद उनका स्वास्थ्य लगातार गिरता गया. सिर में खून के थक्के जमने से उनकी याददाश्त कमजोर होने लगी. पिछले दो वर्षों से वह लगभग बिस्तर पर थीं. धीरे-धीरे मंच की तालियों और दर्शकों की भीड़ से दूर एक कमरे की खामोशी तक उनका सफर सिमट गया. 

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