दुनिया का नक्शा करीब 450 साल बाद बदल रहा है. दरअसल संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) ने 164-1 मतों से एक ऐसे ऐतिहासिक प्रस्ताव को मंजूरी दी है जो अबतक प्रचलित मर्केटर (Mercator) प्रोजेक्शन को हमेशा के लिए बदल देगा. अब दुनिया के नक्शे में भारत सहित कई देश अपने वास्तविक आकार में दिखाई देंगे. पहली नजर में लग सकता है कि नक्शा बदलने से क्या फर्क पड़ जाएगा? भारत की सीमा वही रहेगी, क्षेत्रफल वही रहेगा और जमीन का एक इंच भी न बढ़ेगा, न घटेगा तो फिर इस बदलाव का मतलब क्या है...तो इसका सीधा जवाब ये है कि दुनिया देशों को सिर्फ आंकड़ों से नहीं, नक्शों के जरिए भी समझती है.भारत के लिए यह सिर्फ नक्शे का बदलाव नहीं, बल्कि दुनिया की नजर में उसकी भौगोलिक मौजूदगी को नए तरीके से देखने का मौका भी हो सकता है.इसका असर स्कूलों की किताबों से लेकर Google Maps तक पड़ेगा...इस रिपोर्ट में समझिए इस बदलाव की अहमियत को
आखिर क्या है पूरा मामला?
1569 में तैयार किया गया मर्केटर प्रोजेक्शन समुद्री नेविगेशन के लिए बेहद उपयोगी था, लेकिन इसकी सबसे बड़ी समस्या यह है कि यह भूमध्य रेखा से दूर स्थित क्षेत्रों को वास्तविक आकार से बड़ा और भूमध्य रेखा के आसपास के क्षेत्रों को अपेक्षाकृत छोटा दिखाता है. यही वजह है कि कई नक्शों में ग्रीनलैंड लगभग अफ्रीका जितना बड़ा दिखता है, जबकि वास्तव में अफ्रीका उसका लगभग 14 गुना बड़ा है.
इसके मुकाबले भारत, अफ्रीका, दक्षिण अमेरिका और दक्षिण-पूर्व एशिया के कई हिस्से अपेक्षाकृत छोटे दिखाई देते हैं.UNGA के प्रस्ताव में Equal Earth और अन्य equal-area मानचित्रों के उपयोग को बढ़ावा देने की बात कही गई है ताकि देशों और महाद्वीपों का आकार वास्तविक क्षेत्रफल के अधिक करीब दिखाया जा सके.

भारत के लिए क्यों अहम है यह फैसला?
पहली नजर में यह बदलाव सिर्फ एक तकनीकी सुधार लग सकता है, लेकिन भारत जैसे देशों के लिए इसका अलग महत्व भी है. दुनिया के ज्यादातर लोगों की भौगोलिक समझ स्कूल की किताबों, एटलस और डिजिटल मैप्स से बनती है. दशकों तक इस्तेमाल किए गए मर्केटर प्रोजेक्शन में यूरोप, रूस और उत्तरी गोलार्ध के कई देशों का आकार अपेक्षाकृत बड़ा दिखाई देता रहा, जबकि भारत, अफ्रीका और दक्षिण अमेरिका के बड़े हिस्से वास्तविक क्षेत्रफल से छोटे नजर आते थे. नए equal-area मानचित्रों में देशों का आकार वास्तविकता के ज्यादा करीब दिखेगा. इससे कम से कम देखने के लेवल पर दुनिया की भौगोलिक तस्वीर अधिक संतुलित होगी. ये अपने आप में काफी बड़ा बदलाव है.
स्कूलों की किताबों में क्या बदलेगा?
इस फैसले का सबसे बड़ा असर आने वाले वर्षों में शिक्षा व्यवस्था पर दिख सकता है. दुनिया भर के छात्र जिस नक्शे को देखकर भूगोल सीखते हैं, उसमें देशों के आकार और उनके आपसी अनुपात की उनकी समझ बनती है. यदि नए मानचित्र बड़े तौर पर अपनाए जाते हैं तो भविष्य की किताबों, एटलस और दूसरी चीजों में महाद्वीपों और देशों की तस्वीर अलग दिखाई दे सकती है. छात्र यह समझ पाएंगे कि अफ्रीका वास्तव में कितना विशाल है, दक्षिण अमेरिका का आकार क्या है और भारत दुनिया के नक्शे में कहां और कितना महत्वपूर्ण स्थान रखता है. यानी यह सिर्फ नक्शे की नहीं, भूगोल को समझने की भाषा बदलने जैसा है.
Google Maps और डिजिटल मैप्स पर क्या असर पड़ेगा?
आम लोगों के मन में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या Google Maps, Apple Maps या दूसरे डिजिटल प्लेटफॉर्म तुरंत बदल जाएंगे? इसका जवाब इतना सीधा नहीं है. नेविगेशन के लिए आज भी कई डिजिटल प्लेटफॉर्म वेब मर्केटर आधारित सिस्टम का इस्तेमाल करते हैं क्योंकि उससे रास्ते, दिशा और दूरी दिखाना आसान होता है. हालांकि एजुकेशन, सांख्यिकीय और प्रजेंटेंशन संबंधी नक्शों में नए प्रोजेक्शन का उपयोग बढ़ सकता है. सबसे बड़ी बात ये है कि UNGA का ये प्रस्ताव बाध्यकारी नहीं है. लेकिन संभव है कि भविष्य में जब कोई दुनिया का मानचित्र देखे तो उसे देशों का आकार पहले से अलग और वास्तविकता के ज्यादा करीब दिखाई दे. यानी रोजमर्रा की दिशा बताने वाली मैप सेवाएं शायद वैसी ही रहें, लेकिन दुनिया को दिखाने का तरीका बदल सकता है.
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क्या बदल जाएगी दुनिया की धारणा?
नक्शा सिर्फ जमीन का चित्र नहीं होता, वह हमारी सोच भी प्रभावित करता है. हम किन देशों को बड़ा, प्रभावशाली या अहम मानते हैं, उसमें दो दिखाई दे रहा है उसके प्रभाव की भी भूमिका होती है. जब कोई बच्चा बार-बार एक ऐसा नक्शा देखता है जिसमें कुछ देश वास्तविकता से कहीं बड़े नजर आते हैं, तो उसके मन में दुनिया के बनावट की एक खास छवि बनती है. नए मानचित्र इसी खामी को कम करने की कोशिश हैं. इसलिए यह बदलाव जमीन पर सीमाएं नहीं बदलता, लेकिन दुनिया को देखने और समझने का नजरिया जरूर बदल सकता है.
भारत के लिए सिर्फ नक्शा नहीं, नजरिए का बदलाव
भारत की सीमा, जनसंख्या और क्षेत्रफल पहले जैसे ही रहेंगे. लेकिन यदि दुनिया के आधिकारिक और शैक्षणिक नक्शों में देशों को उनके वास्तविक आकार के अधिक करीब दिखाया जाता है तो भारत सहित ग्लोबल साउथ के कई देशों की भौगोलिक मौजूदगी पहले से ज्यादा सटीक रूप में सामने आएगी. इसलिए यह फैसला सिर्फ कार्टोग्राफी का विषय नहीं है, बल्कि इस बात से भी जुड़ा है कि आने वाली पीढ़ियां दुनिया को किस नजर से देखेंगी.
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