वह खुद को IAS बताती थी. लोग भरोसा कर लेते थे. नौकरी दिलाने का वादा किया जाता था फिर पैसे लेकर वो फरार हो जाती...बाद में पुलिस की एंट्री होती है.ये कहानी है मध्य प्रदेश की तृप्ति सिंह राजपूत का जो इन दिनों बेहद चर्चा में है. पहली नजर में ये मामला एक सामान्य ठगी जैसा लग सकता है. लेकिन अगर पिछले कुछ महीनों की घटनाओं को जोड़कर देखें तो तस्वीर कहीं ज्यादा गंभीर दिखाई देती है. बिहार में मनीष कुमार गुप्ता उर्फ चिक्कू खुद को IAS अधिकारी और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल का अंडरकवर एजेंट बताता रहा. उत्तर प्रदेश में साधना नाम की महिला पर खुद को IAS बताकर शादी करने का आरोप लगा. इंदौर में हिमांशु पांचाल पर मैट्रिमोनियल प्लेटफॉर्म पर फर्जी IAS बनकर महिलाओं को निशाना बनाने का आरोप लगा. ऐसे में सवाल ये है कि आखिर देश में फर्जी डॉक्टर, फर्जी इंजीनियर या फर्जी प्रोफेसर के मुकाबले फर्जी IAS और IPS के मामले इतनी चर्चा क्यों बटोरते हैं? क्या इसके पीछे बेरोजगारी है? क्या असफलता का डर है? या फिर यह उस सामाजिक मनोविज्ञान का नतीजा है जिसमें प्रशासनिक सेवा आज भी सफलता का अंतिम प्रतीक मानी जाती है?
पहले समझिए IAS बनने का गणित
इस सवाल का जवाब UPSC के आंकड़ों में छिपा है. सिविल सेवा परीक्षा 2025 में 9,37,876 उम्मीदवारों ने आवेदन किया. इनमें से 5,76,793 उम्मीदवार परीक्षा में शामिल हुए.

मेन्स तक पहुंचने वालों की संख्या 14,161 रही. इंटरव्यू तक 2,736 उम्मीदवार पहुंचे और आखिर में केवल 958 अभ्यर्थियों का चयन हुआ.सीधी भाषा में कहें तो 9.37 लाख दावेदारों में सिर्फ 958 सफल हुए. यानी सफलता दर करीब 0.10 प्रतिशत रही. दूसरे शब्दों में कहें तो हर 1000 उम्मीदवारों में लगभग 999 उम्मीदवारों को असफलता का सामना करना पड़ा. यही वह प्वाइंट है जहां से इस कहानी की अगली परत शुरू होती है.
तृप्ति सिंह अकेली नहीं हैं
यहीं से इस कहानी का दूसरा अध्याय शुरू होता है.दरअसल तृप्ति सिंह अकेली नहीं है....ऐसे कई मामले हाल-फिलहाल में सामने आए हैं. मसलन
- तृप्ति सिंह राजपूत और उनके भाई सुधांशु राजपूत पर आरोप है कि उन्होंने खुद को IAS अधिकारी बताकर लोगों को नौकरी दिलाने का झांसा दिया और लाखों रुपये लिए. पुलिस के अनुसार शिकायतकर्ताओं से करीब 9.8 लाख रुपये लिए गए थे.
- बिहार के खगड़िया में गिरफ्तार मनीष कुमार गुप्ता उर्फ चिक्कू खुद को न सिर्फ IAS अधिकारी बल्कि NSA अजीत डोभाल का अंडरकवर एजेंट भी बताता था. पुलिस के अनुसार वह अपने कथित सरकारी प्रभाव का प्रदर्शन कर लोगों को प्रभावित करता था.
- उत्तर प्रदेश के बरेली में साधना नाम की महिला पर सोशल मीडिया के जरिए खुद को IAS अधिकारी दिखाने और बाद में पैसों की मांग करने का आरोप लगा.
- वहीं, मध्य प्रदेश के इंदौर में हिमांशु पांचाल पर आरोप है कि उसने मैट्रिमोनियल प्लेटफॉर्म पर खुद को IAS अधिकारी बताकर महिलाओं को निशाना बनाया.
चार राज्य. चार आरोपी. चार अलग-अलग तरीके. लेकिन पैटर्न लगभग एक जैसा रहा. कहीं नौकरी का झांसा दिया गया, कहीं शादी के लिए झूठी पहचान बनाई गई और कहीं सरकारी रुतबे का इस्तेमाल कर लोगों को प्रभावित किया गया. यानी पहले अफसर बनो, फिर भरोसा हासिल करो और उसके बाद उसी भरोसे को पैसे, प्रभाव या सामाजिक लाभ में बदल दो.
क्या इसकी वजह बेरोजगारी है?
जब ये सवाल उठता है तो फिर यहां कहानी दिलचस्प हो जाती है. आर्थिक सर्वेक्षण और PLFS के मुताबिक जुलाई-सितंबर 2025 में भारत की बेरोजगारी दर 5.2 प्रतिशत थी. बिहार में 4.8 प्रतिशत, उत्तर प्रदेश में 3.7 प्रतिशत, मध्य प्रदेश में 5.1 प्रतिशत और झारखंड में 2.8 प्रतिशत बेरोजगारी दर्ज की गई. लेकिन सवाल ये है कि यदि बेरोजगारी ही वजह होती तो करोड़ों बेरोजगार युवाओं में से हजारों लोग फर्जी IAS बन रहे होते. साफ जाहिर है कि बेरोजगारी इस कहानी का पूरा सच नहीं है.
असली वजह है 'स्टेटस इकॉनमी'
भारत में IAS सिर्फ सरकारी नौकरी नहीं है, बल्कि एक सामाजिक ब्रांड है. छोटे शहरों और कस्बों में जिला कलेक्टर या एसपी अक्सर सरकार का सबसे दिखाई देने वाला चेहरा होते हैं. उनके साथ अधिकार, शक्ति, पहचान, सुरक्षा और सामाजिक सम्मान एक साथ जुड़े होते हैं.यही वजह है कि जब कोई ठग लोगों पर प्रभाव जमाना चाहता है तो वह खुद को बैंक क्लर्क, प्रोफेसर या अकाउंटेंट नहीं, बल्कि IAS या IPS बताता है.
सोशल मीडिया ने तैयार की 'नकली फैक्ट्री'
देखा जाएतो सोशल मीडिया ने ही नकली अफसरी की फैक्ट्री बनाने में अहम रोल अदा किया है. पिछले दशक में एक और बड़ा बदलाव आया है. अब किसी के लिए अपनी नकली पहचान गढ़ना पहले से कहीं आसान हो गया है.एक फर्जी आईकार्ड. कुछ तस्वीरें. कुछ सरकारी अंदाज की पोस्ट और कुछ प्रभावशाली दावे. इसके जाल में और कई लोग भरोसा कर लेते हैं.बरेली के मामले में सोशल मीडिया प्रोफाइल का इस्तेमाल सामने आया. तृप्ति सिंह और अन्य मामलों में भी सरकारी पहचान के दावों का इस्तेमाल भरोसा बनाने के लिए किया गया.
ठगी का सबसे बड़ा हथियार पिस्तौल नहीं, बल्कि पहचान है.
तृप्ति सिंह, मनीष गुप्ता, साधना और हिमांशु पांचाल के मामले अलग-अलग अपराध नहीं हैं. ये उस सामाजिक मानसिकता का प्रतिबिंब हैं जिसमें IAS आज भी भारत के सबसे बड़े स्टेटस सिंबल के रूप में देखा जाता है. UPSC में लाखों आवेदन और हजार से भी कम अंतिम चयन यह बताते हैं कि यह पहचान कितनी दुर्लभ है. जब दुर्लभता बढ़ती है तो उसके आकर्षण की कीमत भी बढ़ती है. और शायद यही वजह है कि कुछ लोग परीक्षा पास करने की बजाय अफसर होने का फर्जीवाड़ा चुन लेते हैं. असली चिंता यही है कि फर्जी IAS का यह ट्रेंड केवल कानून-व्यवस्था की चुनौती नहीं, बल्कि समाज में पहचान और सफलता को लेकर बढ़ती अधीरता का भी संकेत है. दूसरी शब्दों में कहें तो आज के दौर में ठगी का सबसे बड़ा हथियार पिस्तौल नहीं, बल्कि पहचान है.
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