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भारत में हर 2 में से 1 कर्मचारी नई नौकरी की तलाश में, Gen Z ने बढ़ाई कंपनियों की टेंशन: रिपोर्ट

भारत में हर 2 में से 1 कर्मचारी नई नौकरी की तलाश में है, जबकि 75% कर्मचारी अगले 12 महीनों में कंपनी छोड़ने की योजना बना रहे हैं. 1.1 लाख कर्मचारियों और 130 से ज्यादा संगठनों पर आधारित ग्रेट प्लेस टू वर्क की रिपोर्ट में Gen Z की बढ़ती हिस्सेदारी और कंपनियों के सामने बढ़ती रिटेंशन चुनौती का खुलासा हुआ है.

भारत में हर 2 में से 1 कर्मचारी नई नौकरी की तलाश में, Gen Z ने बढ़ाई कंपनियों की टेंशन: रिपोर्ट

भारत के प्रोफेशनल सर्विसेज सेक्टर में कर्मचारियों को कंपनी से जोड़े रखना पहले से ज्यादा मुश्किल होता जा रहा है. दरअसल, 130 से ज्यादा संगठनों और 1.1 लाख से अधिक कर्मचारियों के बीच किए गए सर्वे पर आधारित 'ग्रेट प्लेस टू वर्क' की नई रिपोर्ट में कई चौंकाने वाले संकेत मिले हैं. इस वैश्विक संस्था की रिपोर्ट के मुताबिक देश में हर दो में से एक कर्मचारी नई नौकरी की तलाश में है, जबकि चार में से तीन कर्मचारी अगले 12 महीनों के भीतर अपनी मौजूदा कंपनी छोड़ने की योजना बना रहे हैं.दिलचस्प बात ये है कि इसी दौरान वर्कफोर्स में Gen Z यानी युवा कर्मचारियों की हिस्सेदारी भी तेजी से बढ़ी है. अब ये कुल वर्कफोर्स का 34 फीसदी हो गए हैं. ऐसे में कंपनियों के सामने सिर्फ लोगों को भर्ती करने की नहीं, बल्कि उन्हें रोके रखने की भी बड़ी चुनौती खड़ी हो गई है. 

 नौकरी छोड़ने का मन क्यों बना रहे हैं कर्मचारी?

'ग्रेट प्लेस टू वर्क' की रिपोर्ट के अनुसार, भारत में लगभग हर दूसरा कर्मचारी सक्रिय रूप से नई नौकरी खोज रहा है. वहीं 75 प्रतिशत कर्मचारी अगले एक साल के भीतर अपनी मौजूदा कंपनी छोड़ने की योजना बना रहे हैं. रिपोर्ट बताती है कि कार्यस्थलों पर सुविधाएं और माहौल पहले की तुलना में बेहतर जरूर हुए हैं, लेकिन कर्मचारियों को अब सिर्फ अच्छी सैलरी या ऑफिस सुविधाएं ही नहीं चाहिए. वे अपने काम की पहचान, करियर ग्रोथ, पारदर्शिता और बेहतर कार्य संस्कृति की भी उम्मीद कर रहे हैं.

Gen Z अब वर्कफोर्स में बड़ी ताकत

रिपोर्ट का सबसे बड़ी चीज ये है कि प्रोफेशनल सर्विसेज सेक्टर में Gen Z की हिस्सेदारी दो साल में दोगुनी हो गई है. 2023 में जहां इनकी हिस्सेदारी 17 प्रतिशत थी, वहीं अब यह बढ़कर 34 प्रतिशत पहुंच गई है.

यानी दफ्तरों में अब बड़ी संख्या ऐसे कर्मचारियों की है, जो 1997 के बाद जन्मे हैं और जिनकी प्राथमिकताएं पिछली पीढ़ियों से काफी अलग हैं. यह पीढ़ी वेतन, प्रमोशन, करियर ग्रोथ और पहचान को लेकर ज्यादा साफ जवाब चाहती है.

अगर उम्मीदें पूरी नहीं होतीं तो ये पीढ़ी नौकरी बदलने का फैसला लेने में भी ज्यादा समय नहीं लगाती.

'जितना कहा गया है, उतना ही काम' वाला ट्रेंड बढ़ा

रिपोर्ट में एक और दिलचस्प बात सामने आई है. कर्मचारियों की अपने तय दायरे से बाहर जाकर अतिरिक्त योगदान देने की इच्छा लगातार कम हो रही है.मतलब यह कि लोग अब सिर्फ नौकरी बचाने या बॉस को खुश करने के लिए अतिरिक्त जिम्मेदारियां उठाने के मूड में नहीं हैं.वे अपने काम और निजी जिंदगी के बीच संतुलन को ज्यादा अहमियत दे रहे हैं. रिपोर्ट के मुताबिक कार्यस्थलों पर कुछ सुधार तो हुए हैं, लेकिन ऐसे व्यापक बदलाव अभी भी महसूस नहीं हो रहे हैं जो कर्मचारियों को लंबे समय तक किसी संगठन से जोड़े रख सकें.

सबसे ज्यादा दबाव में हैं मैनेजर

आमतौर पर माना जाता है कि जूनियर कर्मचारी नौकरी बदलने के बारे में ज्यादा सोचते हैं, लेकिन 'ग्रेट प्लेस टू वर्क' रिपोर्ट अलग तस्वीर दिखाती है.इसके मुताबिक 86 प्रतिशत फ्रंटलाइन मैनेजर और सुपरवाइजर सक्रिय रूप से नई नौकरी की तलाश में हैं. वहीं व्यक्तिगत योगदान देने वाले कर्मचारियों में यह आंकड़ा 53 प्रतिशत है.

रिपोर्ट का कहना है कि ये मैनेजर एक तरह से 'शॉक एब्जॉर्बर' की भूमिका निभा रहे हैं. उन्हें एक साथ क्लाइंट की मांग, प्रोजेक्ट की डेडलाइन, टीम की समस्याएं और कंपनी के बदलावों को संभालना पड़ता है. ऐसे में उन पर काम का दबाव अपेक्षाकृत ज्यादा है.

AI ऑफिस में पहुंच गया, लेकिन समझ अभी भी कम

रिपोर्ट के अनुसार लगभग 60 प्रतिशत संगठन अब अपने रोजमर्रा के कामकाज में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का इस्तेमाल कर रहे हैं.हालांकि AI का इस्तेमाल बढ़ने के बावजूद कर्मचारियों में इसे लेकर स्पष्टता की कमी है. सिर्फ 20 प्रतिशत कर्मचारियों ने माना कि उन्हें AI टूल्स के फायदे और जोखिमों के बारे में पर्याप्त जानकारी दी गई है. इसका मतलब है कि कंपनियां तकनीक तो तेजी से अपना रही हैं, लेकिन कर्मचारियों को उसके लिए तैयार करने की रफ्तार अभी धीमी है.

कंपनियों के लिए सबसे बड़ा सबक क्या है?

ग्रेट प्लेस टू वर्क इंडिया के प्रबंध निदेशक अक्षत शाह का कहना है कि कंपनियों को कर्मचारियों को जोड़कर रखने की अपनी रणनीति पर दोबारा विचार करना होगा. अब एक जैसी नीति से काम नहीं चलेगा. अलग-अलग पीढ़ियों और कर्मचारियों की अलग-अलग अपेक्षाओं को समझना होगा.दरअसल, नौकरी छोड़ने की बढ़ती इच्छा सिर्फ सैलरी का मामला नहीं रह गई है. अब कर्मचारी यह भी देख रहे हैं कि कंपनी उन्हें कितना सम्मान देती है, कितना सीखने का मौका देती है और भविष्य को लेकर कितनी स्पष्टता रखती है.
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बदल रहा है भारतीय वर्कप्लेस

कुछ साल पहले तक कर्मचारी लंबे समय तक एक ही कंपनी में काम करना पसंद करते थे. लेकिन अब तस्वीर तेजी से बदल रही है. Gen Z की बढ़ती भागीदारी, AI का बढ़ता इस्तेमाल और काम के प्रति बदलता नजरिया भारतीय वर्कप्लेस को नए दौर में ले जा रहा है.रिपोर्ट का कहना है कि ऐसे में आने वाले वर्षों में वही कंपनियां आगे निकल सकती हैं जो सिर्फ कर्मचारियों की भर्ती करने पर नहीं, बल्कि उन्हें समझने, विकसित करने और लंबे समय तक अपने साथ बनाए रखने पर फोकस करेंगी.
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