देश में सरकारी स्कूलों की स्थिति को लेकर नई बहस छिड़ गई है. नीति आयोग की रिपोर्ट के आंकड़े बताते हैं कि पिछले सात वर्षों में देशभर में करीब 84 हजार सरकारी और सरकारी सहायता प्राप्त स्कूल बंद हो गए. इसी दौरान इन स्कूलों में पढ़ने वाले छात्रों की संख्या भी करीब 1.5 करोड़ घट गई. ये रिपोर्ट 'School Education System in India: Temporal Analysis and Policy Roadmap for Quality Enhancement' और यूडीआईएसई+ (UDISE+) ने जारी किया है. जिसमें 2018-19 से 2025-26 के बीच की स्थिति का आंकलन किया गया है. रिपोर्ट मई 2026 में जारी हुई थी, लेकिन इसके निष्कर्ष अब फिर चर्चा में हैं और सरकारी शिक्षा व्यवस्था की मौजूदा स्थिति पर गंभीर सवाल खड़े कर रहे हैं.रिपोर्ट में इस बदलाव को शिक्षा व्यवस्था में हो रहे संरचनात्मक परिवर्तनों और स्कूलों के युक्तिकरण यानि रैशनलाइजेशन से जोड़कर देखा जा रहा है.
आखिर क्यों घट रहे हैं दाखिले?
नीति आयोग की रिपोर्ट के मुताबिक 2018-19 से 2025-26 के बीच सरकारी और सहायता प्राप्त स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों की संख्या 15.9 करोड़ से घटकर 14.4 करोड़ रह गई. यानी सात साल में करीब 1.5 करोड़ बच्चों की कमी दर्ज हुई. इसी दौरान लगभग 84 हजार सरकारी और सहायता प्राप्त स्कूल भी कम हो गए. रिपोर्ट बताती है कि कम छात्र संख्या वाले कई स्कूलों को आपस में जोड़ दिया गया, जबकि कई जगहों पर अब भी बुनियादी सुविधाओं और पढ़ाई के स्तर को लेकर सवाल बने हुए हैं. ऐसे में बड़ी संख्या में अभिभावक निजी स्कूलों की ओर रुख कर रहे हैं.
सिर्फ घटती आबादी की वजह से नहीं घटी संख्या
सरकारी पक्ष का तर्क है कि स्कूल जाने वाली उम्र के बच्चों की संख्या कम होने का असर दाखिलों पर पड़ा है. रिपोर्ट में भी बताया गया है कि 3 से 17 साल की उम्र के बच्चों की आबादी में करीब 2 करोड़ की कमी आई है. लेकिन शिक्षा क्षेत्र से जुड़े लोगों का कहना है कि पूरी कहानी सिर्फ इतनी नहीं है.
कई गांवों में स्कूल की दूरी बढ़ने के बाद परिवार बेटियों को रोजाना इतना दूर भेजने में सहज महसूस नहीं करते. यही वजह है कि स्कूलों को आपस में जोड़ने की नीति को लेकर लगातार बहस होती रही है.
कुछ राज्यों ने रास्ता भी दिखाया
रिपोर्ट यह भी बताती है कि जहां सरकारों ने बच्चों के स्कूल पहुंचने की समस्या कम की, वहां अच्छे नतीजे देखने को मिले. बिहार में छात्राओं को साइकिल देने की योजना और तमिलनाडु, केरल व कर्नाटक में रियायती परिवहन सुविधाओं से सरकारी स्कूलों में दाखिले बढ़ाने और बच्चों को पढ़ाई से जोड़े रखने में मदद मिली. रिपोर्ट का संकेत साफ है कि अगर स्कूल तक पहुंच आसान हो, पढ़ाई का माहौल बेहतर बने और बुनियादी सुविधाएं मजबूत हों तो सरकारी स्कूलों में बच्चों की वापसी संभव है.
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देश के लिए ये चेतावनी भी, मौका भी
आज भी ग्रामीण भारत के करीब 66 फीसदी बच्चे सरकारी स्कूलों में पढ़ते हैं. ऐसे में सरकारी स्कूलों से बच्चों का लगातार दूर होना सिर्फ शिक्षा का नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक विकास का भी बड़ा मुद्दा है. नीति आयोग की रिपोर्ट बताती है कि आने वाले वर्षों में सिर्फ स्कूलों की संख्या बढ़ाना काफी नहीं होगा. सरकारों को बच्चों और अभिभावकों का भरोसा जीतने के लिए पढ़ाई, सुविधाओं और पहुंच पर एक साथ काम करना होगा. नीति आयोग का ही मानना है कि स्कूलों की संख्या कम होने का मतलब यह नहीं है कि हर जगह शिक्षा की पहुंच घटी है, क्योंकि कई स्कूलों को संसाधनों के बेहतर इस्तेमाल के लिए आपस में जोड़ा गया. लेकिन आंकड़े यह भी बताते हैं कि सरकारी स्कूलों से बच्चों का लगातार दूर होना चिंता की बात है. बच्चों और अभिभावकों का भरोसा जीतने के लिए पढ़ाई, सुविधाओं और पहुंच तीनों पर एक साथ काम करना होगा.
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