उज्जैन की खड़े हनुमान प्रतिमा इन दिनों सिर्फ श्रद्धा का केंद्र नहीं, बल्कि जिज्ञासा का विषय भी बन गई है. सड़क चौड़ीकरण के लिए मंदिर का ढांचा हटाया जा चुका है, लेकिन प्रतिमा अब भी वहीं खड़ी है. सोशल मीडिया पर इसे चमत्कार बताया जा रहा है, मगर एक्सपर्ट्स की नजर में इसकी वजह कहीं ज्यादा दिलचस्प है. मामला उस पत्थर, उसकी बनावट और जमीन के भीतर छिपे उसके आधार से जुड़ा है, जिसने प्रशासन की चुनौती बढ़ा दी है. विशेषज्ञों का मानना है कि प्रतिमा मालवा क्षेत्र के बेसाल्ट पत्थर से बनी हो सकती है और यही इसकी सबसे बड़ी ताकत है. इस रिपोर्ट में जानते हैं इसकी इनसाइड स्टोरी
आखिर क्या होता है बेसाल्ट पत्थर?
अगर आप मध्य प्रदेश के मालवा क्षेत्र में कहीं भी खुदाई करें तो काले रंग की ज्वालामुखीय चट्टानें दिखाई देती हैं. इन्हें बेसाल्ट कहा जाता है. करोड़ों साल पहले डेक्कन ट्रैप्स के ज्वालामुखी विस्फोटों से बने इस पत्थर को दुनिया की सबसे मजबूत प्राकृतिक चट्टानों में गिना जाता है. भूगर्भ वैज्ञानिकों के मुताबिक बेसाल्ट का घनत्व आमतौर पर 2.7 से 3 ग्राम प्रति घन सेंटीमीटर के बीच होता है. आसान भाषा में कहें तो समान आकार के कई दूसरे पत्थरों की तुलना में इसका वजन अधिक होता है. यही वजह है कि बेसाल्ट से बनी बड़ी प्रतिमाएं देखने में जितनी लगती हैं, वास्तविकता में उनका वजन उससे कहीं ज्यादा हो सकता है.

Ujjain Khade Hanuman Statue: अब प्रतिमा के सामने श्रद्धालु जुटने लगे हैं और भजन-कीर्तन भी शुरु हो चुका है.
Photo Credit: शिवेन्द्र परमार
ऊपर दिखाई दे रही मूर्ति ही पूरी कहानी नहीं
उज्जैन की खड़े हनुमान प्रतिमा को लेकर सबसे बड़ा सवाल यह है कि जमीन के नीचे उसका हिस्सा कितना गहरा है?
यही कारण है कि प्रशासन खुदाई और तकनीकी परीक्षणों के जरिए यह समझने की कोशिश कर रहा है कि प्रतिमा का वास्तविक आधार आखिर कितना गहरा है. यदि नीचे का हिस्सा भी उसी शिला का विस्तार निकला तो चुनौती कई गुना बढ़ सकती है.
हजार साल पुराने शिल्पकारों की इंजीनियरिंग आज भी चुनौती
विक्रम विश्वविद्यालय के पुरातत्व विशेषज्ञ प्रो. रमण सोलंकी ने संभावना जताई है कि यह प्रतिमा परमारकालीन परंपरा और राजा भोज के समय से जुड़ी हो सकती है. हालांकि इसकी उम्र पर अंतिम निष्कर्ष अभी नहीं निकाला गया है, लेकिन यदि यह वास्तव में सदियों पुरानी है तो इसे सुरक्षित रखना प्राथमिकता बन जाता है. रमण सोलंकी के ही मुताबिक उस दौर के शिल्पकार सिर्फ मूर्तियां नहीं बनाते थे, बल्कि उन्हें इस तरह स्थापित करते थे कि वे प्राकृतिक आपदाओं और समय की मार को भी झेल सकें. यही वजह है कि कई प्राचीन मूर्तियां आज भी अपने मूल स्थान पर मजबूती से खड़ी हैं.
पहले भी ऐसी प्रतिमाओं को हटाने में मुश्किलें आई हैं
भारत में भी ऐसे कई मामले सामने आए हैं, जब विकास परियोजनाओं की वजह से सदियों पुरानी धरोहरों को बचाने की बड़ी चुनौती खड़ी हो गई. नागार्जुन सागर बांध बनने के दौरान आंध्र प्रदेश और तेलंगाना के कई प्राचीन मंदिरों, बौद्ध अवशेषों और ऐतिहासिक संरचनाओं के डूबने का खतरा पैदा हो गया था.
इसके बाद ही उसके हटाने का काम शुरू होता है. यही वजह है कि उज्जैन की खड़े हनुमान प्रतिमा के मामले में भी प्रशासन जल्दबाजी नहीं कर रहा. अधिकारियों की सबसे बड़ी चिंता यह है कि कहीं जल्दबाजी में उठाया गया कोई कदम सदियों पुरानी इस धरोहर को नुकसान न पहुंचा दे.
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एक दरार भी बन सकती है बड़ी समस्या
खड़े हनुमान प्रतिमा पर वर्षों से सिंदूर की मोटी परत चढ़ी हुई है. रमण सोलंकी का कहना है कि मूल शिल्प और पत्थर की वास्तविक स्थिति का वैज्ञानिक अध्ययन किए बिना विस्थापन जोखिम भरा हो सकता है. सबसे बड़ा डर क्रैक यानी दरार का है. यदि उठाने या खिसकाने के दौरान पत्थर में तनाव बढ़ा तो प्रतिमा में सूक्ष्म दरारें आ सकती हैं. शुरुआती दौर में ये दिखाई नहीं देतीं, लेकिन समय के साथ बड़ी क्षति का कारण बन जाती हैं. सोशल मीडिया पर यह सवाल पूछा जा रहा है कि जब बड़ी इमारतें गिराई जा सकती हैं तो एक प्रतिमा क्यों नहीं हटाई जा रही. जवाब यह है कि इमारत को गिराना और ऐतिहासिक प्रतिमा को सुरक्षित बचाकर दूसरी जगह पहुंचाना दो बिल्कुल अलग काम हैं. प्रशासन की कोशिश प्रतिमा को हटाने की नहीं, बल्कि उसे बिना नुकसान पहुंचाए सुरक्षित स्थान पर स्थापित करने की है. यही वजह है कि हर कदम पर विशेषज्ञों की राय ली जा रही है और प्रक्रिया अपेक्षा से ज्यादा समय ले रही है.
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