एक IAS ने 14 साल तक कलेक्टर बनने का इंतजार किया. जनवरी 2025 में पहली बार डिंडौरी कलेक्टर बनीं लेकिन आठ महीने बाद वहां से हटा दी गईं. फिर एक के बाद एक नई जिम्मेदारियां मिलीं और अब महज 50 दिन में फिर तबादला हो गया. हम बात कर रहे हैं मध्य प्रदेश की IAS अधिकारी नेहा मारव्या की जो इन दिनों अपने ट्रांसफर से ज्यादा उस व्हाट्सऐप मैसेज को लेकर चर्चा में हैं, जिसमें उन्होंने सिस्टम, अधीनस्थ कर्मचारियों और IAS एसोसिएशन तक पर सवाल उठा दिए. लेकिन नेहा मारव्या की कहानी सिर्फ एक तबादले की नहीं है. यह उस अफसर की कहानी है जिसने पहले फील्ड पोस्टिंग न मिलने का दर्द झेला, फिर राजनीतिक विरोध का सामना किया, चर्चित जांच रिपोर्ट तैयार की और अब एक साल के भीतर चौथे ट्रांसफर के बाद खुलकर अपनी नाराजगी जाहिर कर रही है. क्या नेहा मारव्या का पूरा दर्द जानिए इस रिपोर्ट में
14 साल तक नहीं मिली कलेक्टरी
नेहा मारव्या 2011 बैच की IAS अधिकारी हैं. इलाहाबाद के MNNIT से कंप्यूटर साइंस में बीटेक करने के बाद उन्होंने यूपीएससी क्रैक किया और मध्य प्रदेश कैडर मिला. लेकिन उनके करियर की शुरुआत वैसी नहीं रही जैसी आमतौर पर IAS अधिकारियों की होती है. जनवरी 2025 से पहले वह राजस्व विभाग में उप सचिव थीं. उस दौरान उन्होंने सार्वजनिक तौर पर यह पीड़ा जाहिर की थी कि 14 साल की सेवा के बाद भी उन्हें कलेक्टर बनने का अवसर नहीं मिला है.
जाहिर है कि यह उनके लिए एक तरह से सपने के पूरा होने जैसा पल था. लेकिन यह पोस्टिंग ज्यादा लंबी नहीं चल सकी. डिंडौरी में उनकी कार्यशैली को लेकर स्थानीय राजनीतिक विरोध शुरू हुआ. बीजेपी विधायक और पूर्व मंत्री ओम प्रकाश धुर्वे समेत कई नेताओं ने खुले तौर पर उनके खिलाफ मोर्चा खोला. प्रशासनिक फैसलों पर सवाल उठने लगे. नतीजा ये हुआ कि महज आठ महीनों बाद उन्हें वहां से हटा दिया गया.
डिंडौरी के बाद भोपाल और नए विवाद
डिंडौरी से हटने के बाद उन्हें आदिम जाति क्षेत्रीय विकास योजनाओं का संचालक बनाया गया. इसके साथ MAPCET, अनुसूचित जनजाति वित्त एवं विकास निगम और आदिम जाति अनुसंधान एवं विकास संस्थान जैसी अहम जिम्मेदारियां भी दी गईं. यहीं से उनके और विभागीय कर्मचारियों के बीच टकराव की खबरें सामने आने लगीं. हाल में IAS एसोसिएशन के व्हाट्सएप ग्रुप में उन्होंने दावा किया कि कुछ कर्मचारी उनके खिलाफ बगावत जैसा माहौल बना रहे थे. उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि विभाग में अनुशासनहीनता और फाइल रोकने जैसी शिकायतों पर कार्रवाई की जगह उनका तबादला कर दिया गया.
एक जांच रिपोर्ट जिसने बढ़ा दी चर्चा
नेहा मारव्या का नाम सिर्फ तबादलों की वजह से नहीं, बल्कि एक चर्चित जांच रिपोर्ट की वजह से भी सुर्खियों में रहा. पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग से जुड़े एक मामले में उन्होंने ललित मोहन बेलवाल के कार्यकाल की जांच की थी.
यही कारण है कि नौकरशाही के गलियारों में उनकी पहचान सिर्फ एक अफसर नहीं, बल्कि सवाल उठाने वाली अधिकारी की भी रही है.
अब 50 दिन में फिर तबादला
5 सितंबर 2026 की ट्रांसफर सूची में एक बार फिर उनका नाम आया. इस बार उनसे कई अतिरिक्त प्रभार वापस ले लिए गए और उन्हें सिर्फ मध्य प्रदेश अनुसूचित जनजाति वित्त एवं विकास निगम के प्रबंध संचालक की जिम्मेदारी दी गई. यही वह ट्रांसफर था जिसके बाद उनका व्हाट्सएप संदेश वायरल हुआ. जिसमें उन्होंने लिखा कि जॉइन किए अभी 50 दिन ही हुए थे और फिर तबादला हो गया. साथ ही उन्होंने IAS एसोसिएशन की भूमिका पर भी सवाल उठा दिए और पूछा कि क्या ये एसोसिएशन सिर्फ बर्थ डे विश करने वाला संगठन भर ही है क्या....
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असल सवाल ट्रांसफर नहीं, सिस्टम है
नेहा मारव्या का मामला इसलिए चर्चा में है क्योंकि इसमें कई परतें हैं. एक अधिकारी जिसे 14 साल तक फील्ड पोस्टिंग नहीं मिली और फिर पहली कलेक्टरी मिली तो राजनीतिक विरोध झेलना पड़ा. बाद में संवेदनशील विभाग मिला तो कर्मचारियों से टकराव की खबरें सामने आने लगी. नतीजा ये हुआ कि एक साल के भीतर उनका चार बार तबादला हो गया. इसीलिए उनका व्हाट्सएप मैसेज सिर्फ व्यक्तिगत नाराजगी नहीं, बल्कि प्रशासनिक स्थिरता, फील्ड पोस्टिंग और बार-बार होने वाले तबादलों पर बड़ी बहस का कारण बन गया है.
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