सुप्रीम कोर्ट के 'समाधान समारोह-2026' ने दशकों से लंबित मुकदमों को आपसी सहमति और मध्यस्थता के जरिए समाप्त करने की दिशा में महत्वपूर्ण मिसाल कायम की है. समारोह के दौरान ऐसे कई पुराने विवादों का समाधान हुआ, जिनमें कुछ मामले चार से सात दशक पुराने थे.
खास बात यह रही कि एक मामले में दुबई में रह रहे पक्षकार ने व्हाट्सऐप के जरिए हस्ताक्षरित समझौता भेजकर सीमा पार से डिजिटल सहमति दर्ज कराई.
1978 के व्यापारिक विवाद को मिली मंजिल
अल मस्तानीर एस्टाब्लिशमेंट फॉर ट्रेड बनाम सिंडिकेट बैंक (जो अब कैनरा बैंक का हिस्सा है) से जुड़े करीब पांच दशक पुराने कर्मिशियल विवाद का भी समाधान हो गया. मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा था और कोर्ट नंबर-2 में जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ के समक्ष लिस्टेड था.
इस विवाद की शुरुआत साल 1978 में हुई थी. सऊदी अरब की कंपनी अल मस्तानीर एस्टाब्लिशमेंट फॉर ट्रेड ने करीब 6.80 लाख अमेरिकी डॉलर मूल्य के 2,000 मीट्रिक टन एमएस राउंड बार की आपूर्ति का ऑर्डर दिया था.
लेटर ऑफ क्रेडिट के जरिए से भुगतान की व्यवस्था की गई थी और उसके एक हिस्से को मैसर्स कुपाल मैटरियल एंड मेटल प्राइवेट लिमिटेड को ट्रांसफर किया गया था.
माल भेजे जाने की जानकारी मिलने पर खरीदार ने करीब 2,71,748.40 अमेरिकी डॉलर का भुगतान किया, लेकिन दस्तावेजों में जिस जहाज का जिक्र था वह जहाज होदायाह पोर्ट पर नहीं पहुंचा और माल खरीदार को नहीं मिला.
इसके बाद विवाद दिल्ली हाईकोर्ट पहुंचा 13 फरवरी 1998 को एकल पीठ ने डिक्री पारित की और फिर बाद में बैंक और अन्य पक्षों ने अपील की.
2 मार्च 2012 को दिल्ली हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने अपील को आंशिक तौर से स्वीकार करते हुए ब्याज की दर में संशोधन किया .
समाधान समारोह-2026 के तहत इस पुराने विवाद को समझौते के लिए मार्क किया गया. जुलाई 2026 में मध्यस्थता केंद्र में पक्षकारों के बीच कई दौर की बातचीत और विचार-विमर्श हुआ. आखिरकार दोनों पक्षों ने समझौता कर लिया. समझौते की राशि का भुगतान भी कर दिया गया और मामले को समझौते की शर्तों के तहत बंद कर दिया गया.
दुबई से व्हाट्सऐप पर आई सहमति
समाधान समारोह का एक अन्य मामला तकनीक और न्याय के अद्भुत मेल की मिसाल बना. कानूनी वारिस के माध्यम से हरि हर दत्त लाल (मृतक) बनाम कानूनी वारिस के माध्यम से वारिश अला ( मृतक ) में अयोध्या की खेती की भूमि को लेकर दशकों पुराना विवाद खत्म हुआ.
22 अगस्त 2026 को सुप्रीम कोर्ट के कोर्ट नंबर-9 में लिस्टेड इस मामले की सुनवाई जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस श्री चंद्रशेखर की पीठ के समक्ष हुई.
विवाद की जड़ साल 1972 के एक समझौते से जुड़ी थी. स्थानीय स्तर पर पक्षकारों ने अयोध्या में जिला विधिक सेवा प्राधिकरण के जरिए से भूमि के बंटवारे पर सहमति बनाई. लेकिन प्रतिवादी नंबर-3 मोहम्मद तौसीफ, जो वर्तमान में दुबई में रहते हैं, व्यक्तिगत रूप से उपस्थित नहीं हो सके.
समझौता अटकने न पाए, इसके लिए उन्होंने दुबई में हिंदी में तैयार समझौता-पत्र का प्रिंट निकाला, उस पर हस्ताक्षर किए और उसकी स्कैन कॉपी व्हाट्सऐप के जरिए भारत में अपने कानूनी प्रतिनिधियों को भेज दी. इस डिजिटल तरीके से उनकी सहमति को समझौते में शामिल किया गया.
यह मामला बताता है कि वैकल्पिक विवाद समाधान की प्रक्रिया बदलते समय और तकनीक के साथ किस तरह अधिक लचीली और सुलभ बन रही है.
47 साल की मुकदमेबाजी के बाद किरायेदारी विवाद का अंत
समाधान समारोह में एक और मामला जयपुर की एक दुकान से जुड़े किरायेदारी विवाद का रहा. दुकान साल 1952 से किराएदारी में थी और मकान मालिक ने साल 1979 में बेदखली की कार्यवाही शुरू की थी. मामला कई स्तरों की कानूनी प्रक्रिया से गुजरता हुआ साल 2017 में सुप्रीम कोर्ट पहुंचा.
23 अगस्त 2026 को कोर्ट नंबर-4 में जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ के समक्ष मामला लिस्टेड था.
मुकदमे के दौरान साल 2003 में मकान मालिक ने विवादित दुकान को अपीलकर्ता को बेचने पर सहमति जताई थी और बिक्री की रकम का एक हिस्सा भी भुगतान किया गया था. इसके बावजूद विवाद खत्म नहीं हुआ और अगले दो दशक तक मुकदमा चलता रहा.
समाधान समारोह-2026 के तहत DLSA जयपुर, राजस्थान की सहायता से दोनों पक्ष समझौते पर पहुंचे. तय शर्तों के अनुसार प्रतिवादी ने विवादित दुकान को एक सहमत राशि पर अपीलकर्ता को बेचने पर सहमति दे दी.
इस तरह करीब 47 सालों से चली आ रही मुकदमेबाजी का अंत किसी नए फैसले से नहीं, बल्कि आपसी सहमति और समझौते से हुआ.
'तारीख पर तारीख' से समाधान की ओर बढ़ता न्याय
सुप्रीम कोर्ट की ओर से जारी रिलीज के मुताबिक, समाधान समारोह-2026 में सामने आए ये मामले यह संदेश देते हैं कि लंबी कानूनी लड़ाई का अंत हमेशा अदालती फैसले से ही हो, यह जरूरी नहीं है.
मध्यस्थता, लोक अदालत और आपसी समझौते जैसे वैकल्पिक विवाद समाधान तंत्र पक्षकारों को समय, धन और सालों की अनिश्चितता से बचाने में अहम भूमिका निभा सकते हैं.
इन मामलों का समाधान न केवल लंबित मुकदमों के बोझ को कम करने की दिशा में अहम कदम है, बल्कि यह भी दिखाता है कि न्याय का सबसे संतोषजनक नतीजा कई बार जीत-हार नहीं, बल्कि दोनों पक्षों की सहमति से मिलने वाला स्थायी समाधान होता है.
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