- देश के स्कूलों में हर रोज प्रेयर में संविधान की प्रस्तावना पाठ की मांग वाली याचिका खारिज.
- याचिका में अनुच्छेद 21A और 51A(a) का हवाला दिया गया था.
- राष्ट्रगान की तरह प्रस्तावना के सामूहिक पाठ से संवैधानिक मूल्य बढ़ने की दलील दी गई थी.
सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को देशभर के स्कूलों में सुबह की प्रार्थना सभा के दौरान रोजाना संविधान की प्रस्तावना का पाठ अनिवार्य करने की मांग वाली जनहित याचिका खारिज कर दी है. जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की बेंच ने याचिका पर सुनवाई से इनकार करते हुए कहा कि संविधान की प्रस्तावना पहले से ही स्कूलों के सिलेबस का हिस्सा है और देशभर में क्लास 6 से छात्रों को इसे पढ़ाया जाता है. यह याचिका दिल्ली विश्वविद्यालय के राजधानी कॉलेज के असिस्टेंट प्रोफेसर धीरज कुमार ने दाखिल की थी.
याचिका क्या मांगें की गई थीं?
याचिका में केंद्र के शिक्षा मंत्रालय और CBSE को निर्देश देने की मांग की गई थी कि स्कूली छात्रों में संवैधानिक साक्षरता बढ़ाने के लिए देशभर में एक समान नीति बनाई जाए. याचिका में कहा गया था कि जिस तरह स्कूलों में राष्ट्रगान का सामूहिक रूप से पाठ किया जाता है, उसी तरह नियमित रूप से संविधान की प्रस्तावना का सामूहिक पाठ कराने से बच्चों में न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुता जैसे संवैधानिक मूल्यों की समझ विकसित होगी.
सुप्रीम कोर्ट में दाखिल की गई याचिका में CBSE के मई 2025 के सर्कुलर का भी हवाला दिया गया, जिसमें सुबह की सभाओं के दौरान दैनिक सकारात्मक प्रतिज्ञाओं को प्रोत्साहित किया गया था.
याचिकाकर्ता का कहना था कि संविधान की प्रस्तावना का पाठ नागरिक चेतना विकसित करने की दिशा में सबसे प्रभावी सकारात्मक संकल्प हो सकता है. हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने याचिका को स्वीकार नहीं किया और इसे खारिज कर दिया.
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