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This Article is From Jun 04, 2019

मेडिकल दाखिलों में लचर व्यवस्था को लेकर सुप्रीम कोर्ट गंभीर, कही ये बात

सुप्रीम कोर्ट ने महाराष्ट्र सरकार और केंद्र सरकार की खिंचाई की. कोर्ट ने कहा कि आप आगे क्यों नहीं आते और शिक्षा प्रणाली को साफ क्यों नहीं करते हैं.

मेडिकल दाखिलों में लचर व्यवस्था को लेकर सुप्रीम कोर्ट गंभीर, कही ये बात
प्रतीकात्मक तस्वीर
नई दिल्ली:

सुप्रीम कोर्ट ने महाराष्ट्र सरकार और केंद्र सरकार की खिंचाई की. कोर्ट ने कहा कि आप आगे क्यों नहीं आते और शिक्षा प्रणाली को साफ क्यों नहीं करते हैं. जस्टिस एमआर शाह ने कहा, ''हर साल छात्र सुप्रीम कोर्ट में किसी न किसी तरह की राहत के लिए आते हैं. सरकार को छात्रों की दुर्दशा पर विचार करना चाहिए. सरकार इस व्यवस्था को दुरुस्त क्यों नहीं करती है. अगर हम इस समय कुछ आदेश पारित करते हैं. ऐसे अन्य छात्र हैं जो प्रभावित होंगे.''

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जस्टिस इंदु मल्होत्रा ने कहा कि मेरिट के क्रम में सभी छात्रों को मौका मिलना चाहिए. मेडिकल व डेंटल पीजी दाखिलों में सामान्य वर्ग के लिए सुप्रीम कोर्ट ने महाराष्ट्र सरकार को दोबारा काउंसलिंग करने के आदेश दिए. कोर्ट ने कहा कि ये काउंसलिंग मैन्यूअल होगी और सरकार इसके लिए विज्ञापन जारी करेगी. दाखिला प्रक्रिया 14 जून तक खत्म हो. कुछ छात्रों की अर्जी पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला सुनाया है. सुप्रीम कोर्ट ने दाखिला प्रक्रिया को चार जून तक बढ़ाया था.

इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया था कि इस साल EWS कोटा लागू नहीं होगा. 25 छात्रों पर इस फैसले का असर हुआ और  महाराष्ट्र सरकार को भी झटका लगा. वहीं महाराष्ट्र सरकार ने  EWS  के लिए 10% कोटा को चुनौती देने वाली याचिका को खारिज करने की मांग की थी. राज्य सरकार ने कोर्ट में कहा था कि कोई भी अंतर्विरोध प्रवेश की पूरी प्रक्रिया को बाधित करेगा. लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि दाखिला प्रक्रिया नवंबर 2018 में शुरू हुई जबकि EWS आरक्षण जनवरी में लागू हुआ.

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महाराष्ट्र सरकार ने सात मार्च को इसके लिए नोटिफिकेशन जारी किया. दाखिला प्रक्रिया शुरू होने के बाद इसे लागू नहीं किया जा सकता सुप्रीम कोर्ट ने नोटिफिकेशन पर रोक लगा दी. दरअसल जनहित अभियान नामक संगठन ने महाराष्ट्र में मेडिकल व डेंटल पीजी दाखिलों में सामान्य वर्ग के आर्थिक रूप से कमजोर छात्रों को 10 फीसदी आरक्षण देने का विरोध किया है और इसे रद्द करने की मांग की. इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने इस संबंध में महाराष्ट्र सरकार से उसका पक्ष पूछा था.
 

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