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'ऐसा कोई सबूत नहीं...' : आत्महत्या के लिए उकसाने के आरोप में वरिष्ठ वन अधिकारी को SC से राहत

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री धारा 306 के तहत आत्महत्या के लिए उकसाने के अपराध को साबित नहीं करती. अदालत ने स्पष्ट किया कि आत्महत्या के लिए उकसाने का अपराध तभी बनता है जब आत्महत्या से ठीक पहले आरोपी की ओर से कोई प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष उकसावा और स्पष्ट आपराधिक मंशा दिखाई दे.

'ऐसा कोई सबूत नहीं...' : आत्महत्या के लिए उकसाने के आरोप में वरिष्ठ वन अधिकारी को SC से राहत
सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने एक महिला वन रेंज अधिकारी की आत्महत्या के मामले में उकसाने (IPC की धारा 306) के आरोपी वरिष्ठ वन अधिकारी को राहत देते हुए उनके खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही खत्म कर दी है. कोर्ट ने कहा कि किसी अधीनस्थ कर्मचारी को आत्महत्या के लिए उकसाने का आरोप साबित करने के लिए केवल दुखद परिणाम यानी आत्महत्या पर्याप्त नहीं है, बल्कि यह दिखाना भी जरूरी है कि आरोपी का स्पष्ट इरादा था और उसने प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से आत्महत्या के लिए उकसाया या मदद की थी.

न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा और न्यायमूर्ति एन. कोटिश्वर सिंह की पीठ ने कहा कि धारा 306 के तहत आपराधिक जिम्मेदारी केवल आत्महत्या की घटना के आधार पर तय नहीं की जा सकती. इसके लिए यह साबित होना चाहिए कि आरोपी ने जानबूझकर ऐसे कदम उठाए जिनसे पीड़ित आत्महत्या करने के लिए मजबूर हुआ हो.

मामले में तत्कालीन उप वन संरक्षक विनोद शिवकुमार ने बॉम्बे हाईकोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें हाईकोर्ट ने उनके खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया था. सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट और ट्रायल कोर्ट दोनों के आदेश रद्द करते हुए शिवकुमार को मामले से मुक्त कर दिया.

यह मामला महाराष्ट्र के हरिसाल रेंज में तैनात एक महिला वन क्षेत्राधिकारी की 25 मार्च 2021 को हुई आत्महत्या से जुड़ा है. महिला अधिकारी ने अपनी सरकारी बंदूक से खुद को गोली मार ली थी. उन्होंने तीन सुसाइड नोट छोड़े थे, जो अतिरिक्त प्रधान मुख्य वन संरक्षक एवं क्षेत्र निदेशक, अपनी मां और पति के नाम लिखे गए थे. इन नोटों में उन्होंने अपनी मौत के लिए विनोद शिवकुमार को जिम्मेदार ठहराया था.

अभियोजन पक्ष का आरोप था कि शिवकुमार ने महिला अधिकारी को मानसिक रूप से प्रताड़ित किया, उन्हें फटकार लगाई, कारण बताओ नोटिस जारी किए और फील्ड ड्यूटी के लिए मजबूर किया. आरोपों में मार्च 2020 की एक घटना का भी जिक्र था, जिसमें अतिक्रमण हटाने और आरोपियों की गिरफ्तारी शामिल थी. इसी प्रकरण से जुड़ा अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत दर्ज एक मामला भी सामने आया था.

महिला अधिकारी ने आरोप लगाया था कि गर्भावस्था के दौरान उन्हें जंगल में पैदल ट्रैकिंग करने के लिए मजबूर किया गया, जिसके कारण उनका गर्भपात हो गया. सुसाइड नोट में उन्होंने लिखा था कि शिवकुमार ने स्टाफ और ग्रामीणों के सामने उनका अपमान किया, लगातार परेशान किया और उनका वेतन रुकवाने के लिए जिम्मेदार थे.

अभियोजन ने इन आरोपों और गवाहों के बयानों के आधार पर दलील दी कि लगातार अपमान और कथित उत्पीड़न की वजह से महिला अधिकारी ने आत्महत्या की. इसके अलावा एक वन कर्मचारी की पुरानी शिकायत का भी हवाला दिया गया, जिसमें शिवकुमार पर अधीनस्थ कर्मचारियों के साथ कठोर व्यवहार करने का आरोप था.

हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री धारा 306 के तहत आत्महत्या के लिए उकसाने के अपराध को साबित नहीं करती. अदालत ने स्पष्ट किया कि आत्महत्या के लिए उकसाने का अपराध तभी बनता है जब आत्महत्या से ठीक पहले आरोपी की ओर से कोई प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष उकसावा और स्पष्ट आपराधिक मंशा दिखाई दे.

अदालत ने कहा कि गर्भपात अक्टूबर 2020 में हुआ था, जबकि आत्महत्या मार्च 2021 में हुई. इसी तरह अतिक्रमण हटाने और एससी-एसटी एक्ट के मामले से जुड़ी घटनाएं मार्च 2020 की थीं. यानी अभियोजन जिन घटनाओं पर भरोसा कर रहा था, वे आत्महत्या से काफी समय पहले की थीं.

पीठ ने कहा, “आत्महत्या से ठीक पहले ऐसी कोई घटना सामने नहीं आई, जिसे उकसावे की कार्रवाई माना जा सके और जिसने मृतका को यह कदम उठाने के लिए मजबूर किया हो.” अदालत ने यह भी कहा कि किसी वरिष्ठ अधिकारी द्वारा प्रशासनिक निर्देश देना, अनुशासनात्मक निगरानी रखना, कार्य निष्पादन पर प्रतिकूल टिप्पणी करना या कठोर व्यवहार करना, भले ही अधीनस्थ को अप्रिय लगे, उसे आत्महत्या के लिए उकसाना नहीं माना जा सकता, जब तक कि आत्महत्या के लिए प्रेरित करने की स्पष्ट मंशा साबित न हो.

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि सुसाइड नोट मृतका की पीड़ा को दर्शाते हैं, लेकिन केवल उनके आधार पर आरोपी की आपराधिक मंशा साबित नहीं की जा सकती. अदालत के अनुसार ऐसा कोई सबूत नहीं है, जिससे यह साबित हो कि आरोपी ने अपने शब्दों या व्यवहार से मृतका को ऐसी स्थिति में पहुंचा दिया था, जहां उसके पास आत्महत्या के अलावा कोई और विकल्प न बचा हो.

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