- SC ने कैंसर की जीवनरक्षक दवाओं की कीमतों में प्राइस टू रिटेलर और एमआरपी के बीच भारी अंतर पर स्पष्टीकरण मांगा
- अदालत ने सवाल किया कि जरूरी दवाओं को कीमत नियंत्रण व्यवस्था से बाहर क्यों रखा गया है
- हाई कोर्ट ने सरकार को पेटेंट एक्ट के तहत सस्ती और बिना लाभ वाली जीवनरक्षक दवाएं तैयार करने का अधिकार बताया
कैंसर की दवाओं को जीवनरक्षक ड्रग्स में शामिल किया जाता है. फिर भी उनकी कीमतें बहुत अधिक होने को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने तीखे सवाल सरकार से पूछे हैं. खासतौर पर प्राइस टू रिटेलर और बिक्री मूल्य में भारी अंतर को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने सवाल दागे. अदालत ने पूछा कि दवाओं की कीमत तय करने की व्यवस्था में ऐसा अंतर क्यों है. बेंच ने कहा कि आखिर ऐसी जरूरी दवाओं को मूल्य नियंत्रण से बाहर कैसे रखा जा सकता है. बेंच में शामिल जस्टिस संदीप मेहता ने कहा , '27 हजार रुपये MRP वाली कैंसर की एक दवा का प्राइस टू रिटेलर करीब 3,000 रुपये है. जरा इस भारी अंतर को देखिए.'
इसके अलावा जस्टिस मेहता ने पूछा कि ड्रग्स प्राइस कंट्रोल ऑर्डर यानी DPCO में आवश्यक और गैर-आवश्यक दवाओं के बीच अंतर क्यों किया गया है? पीठ ने कहा कि कॉरपोरेट अस्पताल मरीजों को अकसर अपनी इन-हाउस फार्मेसी से ही दवा खरीदने के लिए कहते हैं. इसके आगे अदालत ने सरकारी अस्पतालों में इलाज को लेकर भी सवाल किया. बेंच ने पूछा कि अगर मरीज का इलाज किसी सरकारी योजना के तहत हो रहा है, तो इन दवाओं की महंगी कीमत का भुगतान कौन करता है? पीठ ने कहा- 'टैक्सपेयर'. पीठ ने यह भी सवाल उठाया कि 16% का एक समान मानदंड क्यों नहीं हो सकता और इसके ऊपर कुछ भी क्यों हो?
कोर्ट ने कहा कि हर मेडिकल डिवाइस और हर दवा एसेंशियल कमोडिटीज एक्ट के दायरे में आती है. ऐसे में सवाल है कि अगर कोई वस्तु आवश्यक है तो उसे DPCO से बाहर कैसे रखा जा सकता है? केंद्र की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने इससे पहले कहा कि इस मामले में कोई रास्ता निकालना होगा. उन्होंने कहा कि वह यह नहीं कह रहे कि याचिकाकर्ता गलत हैं, लेकिन ऐसा समाधान तलाशना होगा जो सभी पक्षों के हितों में संतुलन बनाए. सॉलिसिटर जनरल ने यह भी कहा कि उनकी समझ के मुताबिक इस व्यवस्था से फार्मा कंपनियां लाभ पाने वाली पक्ष नहीं हैं. सुप्रीम कोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई 12 अक्टूबर को तय की है.
केरल हाई कोर्ट बोला- सरकार खुद तैयार करा सकती है सस्ती दवाएं
सोमवार को केरल हाई कोर्ट ने एक अहम मामले में फैसला यह दिया. यह मामला एक कैंसर पीड़िता की अर्जी पर था, जिसने महंगी दवाओं को लेकर अर्जी डाली थी. लेकिन मामले में सुनवाई पूरी होने से पहले ही पीड़िता की मौत हो गई. इस मामले में सोमवार को अदालत ने कहा कि पेटेंट्स एक्ट के तहत केंद्र सरकार के पास शक्ति है कि वह जीवन रक्षक दवाएं तैयार कर सके. इसके अलावा वह इन दवाओं को बिना किसी लाभ के बेच सकती है ताकि मरीजों के लिए उनकी खरीद कर पाना संभव हो. इस मामले में याचिका दाखिल करने वाली पीड़िता की मौत सुनवाई से पहले ही चुकी थी.
सुनवाई से पहले ही मर गई पीड़िता, 57 बार अपील के बाद शुरू हुआ केस
उच्च न्यायालय ने कहा कि केंद्र सरकार लाइव सेविंग मेडिसिन तैयार कर सकती है. वह ऐसा करने के लिए किसी कंपनी को भी आदेश दे सकती है. इसके अलावा जरूरतमंद मरीजों को बिना किसी लाभ के उन्हें दे सकती है. यह केस जून 2022 में अदालत में दाखिल हुआ था, लेकिन 57 बार अपील के बाद सुनवाई शुरू हो सकी. वह भी तब जबकि अर्जी दायर करने वाली कैंसर पीड़िता की मौत हो गई थी. अब 4 साल बाद हाई कोर्ट ने केंद्र सरकार को सस्ती दवाएं बनाने को कहा है और पेटेंट एक्ट के तहत ऐसा करना उसका अधिकार बताया है.
अदालत बोली- सरकार को सस्ती दवाएं तैयार करके बांटने का अधिकार
जस्टिस हरीशंकर वी मेनन ने पेटेंट्स एक्ट 1970 का जिक्र करते हुए कहा कि इसके तहत सरकार को अधिकार है कि वह मरीजों के लिए सस्ती दवाएं तैयार कर सके. बस इसका उद्देश्य सरकारी स्तर से किसी की मदद करना हो. अदालत ने कहा कि इस प्रावधान के तहत सरकार पेटेंटेड दवाओं को भी जरूरतमंद मरीजों को सप्लाई कर सकती है. हालांकि अदालत ने सरकार को तत्काल दवाएं तैयार करने का आदेश नहीं दिया है. बेंच ने कहा कि इस मामले में अफोर्डेबिलिटी का डेटा जुटाने के बाद सरकार आखिरी फैसला ले सकती है. उसे पहले यह सर्वे कर लेना चाहिए कि कितने मरीजों को ऐसी उचित दरों पर दवाओं की जरूरत है. कितने लोगों को इस सब्सिडी वाली स्कीम से फायदा मिलेगा.
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