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अवैध कॉलोनियों को पक्का करने या बुलडोजर चलाने पर अलग-अलग नीति क्यों? याचिका पर सुप्रीम कोर्ट का दखल देने से इनकार

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अलग-अलग राज्यों में परिस्थितियां और स्थानीय जरूरतें अलग हैं. ऐसे में सभी राज्यों में एक ही नीति लागू करना व्यावहारिक या उचित नहीं हो सकता.

अवैध कॉलोनियों को पक्का करने या बुलडोजर चलाने पर अलग-अलग नीति क्यों? याचिका पर सुप्रीम कोर्ट का दखल देने से इनकार
अवैध कॉलोनियों से जुड़ी याचिका पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई. (File Photo)
नई दिल्ली:

सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को एक ऐसी याचिका पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया, जिसमें लंबे वक्त से बने अवैध निर्माणों को रेगुलर करने या गिराने के लिए पूरे देश में एक जैसी पॉलिसी बनाने की मांग की गई थी. भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच ने कहा कि ऐसे मामले असल में पॉलिसी बनाने के दायरे में आते हैं. इसलिए, उन्होंने इस मुद्दे पर एक जैसी गाइडलाइंस बनाने के लिए कोर्ट की तरफ से अधिकार प्राप्त कमेटी बनाने की मांग को ठुकरा दिया.

कोर्ट ने इसे नीतिगत मामला बताते हुए केंद्र और राज्य सरकारों को विचार करने के लिए कहा है. सुनवाई कर रही बेंच ने कहा कि ऐसे मामले मुख्य रूप से नीति निर्धारण के दायरे में आते हैं. इसलिए पूरे देश के लिए एक समान दिशा-निर्देश तैयार करने के लिए अदालत द्वारा समिति गठित करना उचित नहीं होगा. 

सुप्रीम कोर्ट ने कहा, "अलग-अलग राज्यों में परिस्थितियां और स्थानीय जरूरतें अलग हैं. ऐसे में सभी राज्यों में एक ही नीति लागू करना व्यावहारिक या उचित नहीं हो सकता. विभिन्न राज्यों में अलग-अलग परिस्थितियों को देखते हुए अलग नीति ढांचा जरूरी हो सकता है."

हालांकि, कोर्ट ने राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को याचिका में उठाए गए मुद्दों पर विचार करने की सलाह दी. अदालत ने कहा कि सक्षम प्राधिकारी मौजूदा नीतियों की समीक्षा करते वक्त इन मुद्दों पर उचित विचार कर सकते हैं. कोर्ट ने उम्मीद जताई कि संबंधित सक्षम प्राधिकारी याचिका में उठाए गए सभी पहलुओं पर उचित ध्यान देंगे. नियमितीकरण या ध्वस्तीकरण का फैसला संबंधित राज्य की नीति, स्थानीय कानून और लागू कानूनी प्रक्रिया के मुताबिक ही होगा.

क्या है पूरा मामला?

दरअसल, सेंटर फॉर लॉ एंड गुड गवर्नेंस की ओर से दायर याचिका में कहा गया कि आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और दिल्ली में अनधिकृत निर्माणों के निपटारे और नियमितीकरण के लिए अलग-अलग नीतियां लागू की गई हैं. याचिका में आरोप लगाया गया कि कई मामलों में अनधिकृत कॉलोनियों को अचानक, कभी नोटिस के साथ और कभी बिना नोटिस के ध्वस्त कर दिया जाता है.

याचिकाकर्ता के वकील ने दलील देते हुए कहा कि ध्वस्तीकरण एक बेहद कठोर और अपरिवर्तनीय कदम है, इसलिए इसे ऐसी नीति के बिना नहीं किया जाना चाहिए, जो नगर नियोजन कानूनों के पालन के साथ संविधान के अनुच्छेद-21 के तहत मिले आवास, आजीविका और गरिमापूर्ण जीवन के अधिकार के बीच संतुलन स्थापित करे.

वकील ने कहा कि अलग-अलग राज्य सरकारों की नीतियां एक-दूसरे से काफी अलग हैं और कई जगह ध्वस्तीकरण जल्दबाजी, अनियमित और बिना व्यवस्थित प्रक्रिया के किया जाता है. उन्होंने कहा कि कई मामलों में सरकारें पहले लोगों को आश्वासन देती हैं कि अनधिकृत निर्माण नियमित किए जाएंगे, उनसे नगर निगम और संपत्ति कर वसूलती हैं और बिजली कनेक्शन भी दिए जाते हैं. लेकिन 30, 40 या 50 साल बाद अचानक इन्हीं निर्माणों को अवैध घोषित कर ध्वस्त कर दिया जाता है, बिना यह देखे कि वहां रहने वाले लोगों के पास वैकल्पिक आवास है या नहीं. वकील ने अदालत से कहा कि इस पूरे क्षेत्र में मानवाधिकारों से जुड़े न्यायशास्त्र को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए. 

चीफ जस्टिस ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट पहले ही अवैध और अनधिकृत ध्वस्तीकरण के खिलाफ व्यापक निर्देश जारी कर चुका है. हालांकि, याचिकाकर्ता के वकील ने कहा कि अलग-अलग फैसलों में स्थिति कुछ हद तक विरोधाभासी दिखाई देती है. उन्होंने ओल्गा टेलिस के सिद्धांत का हवाला देते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने पहले माना है कि आश्रय का अधिकार गरिमापूर्ण जीवन के अधिकार का हिस्सा है.

वहीं, 14 जुलाई 2026 के एक फैसले में दूसरी पीठ ने कहा कि किसी कॉलोनी का लंबे वक्त तक अस्तित्व अपने आप में कोई कानूनी अधिकार पैदा नहीं करता और सिर्फ समय बीत जाने या अधिकारियों की निष्क्रियता से अवैधता समाप्त नहीं होती. मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट का मानवतावादी न्यायशास्त्र, जिसकी शुरुआत ओल्गा टेलिस मामले से हुई, यह मानता है कि लंबे वक्त से कब्जे में रह रहे शख्स को उचित कानूनी प्रक्रिया के बिना बेदखल नहीं किया जा सकता. उन्होंने यह भी कहा कि कोर्ट ने निर्देश दिया है कि पूरी तरह अनधिकृत कब्जाधारी को भी सामान्यतः ध्वस्तीकरण से पहले कम से कम 15 दिन का नोटिस दिया जाना चाहिए.

सुप्रीम कोर्ट में दी गईं कई दलीलें...

याचिकाकर्ता के वकील ने सवाल उठाया कि क्या राज्य सरकार कम से कम प्रभावित लोगों को न्यूनतम वैकल्पिक आवास उपलब्ध कराने के लिए बाध्य नहीं है. इस पर जस्टिस बागची ने कहा कि याचिका में मांगी गई राहत बहुत व्यापक है और इससे अदालत के कार्यपालिका के नीति-निर्धारण क्षेत्र में प्रवेश करने की स्थिति पैदा हो सकती है.

बेंच ने यह भी कहा कि कुछ अवैध निर्माण व्यावसायिक फायदे के मकसद से भी किए जाते हैं. ऐसे मामलों को देखते हुए अदालत राज्य सरकार को कोई विशेष नीति अपनाने से रोक नहीं सकती. हालांकि, अदालत ने माना कि ऐसी परिस्थितियां भी होती हैं, जहां बड़ी तादाद में आर्थिक रूप से कमजोर लोग जमीन पर रह रहे होते हैं और उन्हें वैकल्पिक आवास की जरूरत होती है. अदालत ने कहा कि यह नीति संबंधी फैसला है और राज्य को अपनी नीति बनाने से नहीं रोका जा सकता. 

आखिरकार, सुप्रीम कोर्ट ने याचिका में मांगी गई समान राष्ट्रीय नीति या कोर्ट-नियंत्रित समिति गठित करने की मांग स्वीकार नहीं की. अदालत ने इसके बजाय सरकारों से याचिकाकर्ता द्वारा उठाए गए सुझावों पर विचार करने को कहा और इसी के मुताबिक आदेश पारित किया.

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