IVF Buffalo Calf Maharashtra: गाय-भैंस पालन से जुड़े पशुपालकों के लिए एक ऐसी टेक्निक आई है, जो उनके मुनाफे को कई गुना बढ़ा सकती है. महाराष्ट्र में पहली बार ऐसा एक्सपेरिमेंट (Experiment) हुआ है, जहां सरोगेट टेक्निक से मुर्रा नस्ल की चार बछड़ों (Murrah Buffalo Calves) ने जन्म लिया है, जिनमें से तीन मादा और एक नर है. यूं तो एक भैंस अपने पूरी लाइफ में केवल 8 से 10 बच्चे ही दे पाती है, लेकिन अब इस मॉडर्न एम्ब्रियो ट्रांसफर टेक्निक (Embryo Transfer Technology) की मदद से एक ही बढ़िया ब्रीड की भैंस से साल भर में 50 से ज्यादा हाइब्रिड के बच्चे पैदा किए जा सकते हैं.

क्या है ये एम्ब्रियो टेक्निक और कैसे हुआ यूज (What is embryo transfer technology and how it worked)
पुणे के तथावड़े स्थित ईटी-आईवीएफ लैब (ET-IVF laboratory) में शोधकर्ताओं (Researchers) ने स्वप्निल कलाटे नाम के किसान की सबसे ज्यादा दूध देने वाली मुर्रा भैंस को चुना. 11 सितंबर को इस डोनर भैंस से 16 अंडे (utilized egg cells) निकाले गए और उन्हें लैब में अच्छी नस्ल वाले सांड के सीमन से फर्टिलाइज कराया गया. 6 दिनों के भीतर 5 बेहतरीन भ्रूण यानी कि एम्ब्रियो तैयार हो गए. इसके बाद 19 सितंबर को तथावड़े के सरकारी ब्रीडिंग फार्म (Cattle Breeding Farm) में इन भ्रूणों को 5 सरोगेट (surrogate buffaloes) यानी किराए की मां बनने वाली भैंसों में ट्रांसफर कर दिया गया.
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महीनों की मेहनत के बाद मिला शानदार रिजल्ट (Months of hard work led to successful results)
दो और ढाई महीने बाद जब जांच की गई तो पांच में से चार सरोगेट भैंसें प्रेग्नेंट पाई गईं. पूरे 10 महीने और 10 दिनों के बाद 11 जुलाई से 20 जुलाई के बीच चार बेहद तंदुरुस्त बच्चों का जन्म हुआ. इनमें तीन मादा और एक नर बच्चा शामिल है. महाराष्ट्र लाइवस्टॉक डेवलपमेंट बोर्ड (Maharashtra Livestock Development Board CEO) के सीईओ डॉ. शीतलकुमार मुकाने (Dr. Shitalkumar Mukane) ने बताया कि, 'गायों के मुकाबले भैंसों में आईवीएफ और एम्ब्रियो ट्रांसफर करना बहुत मुश्किल काम होता है.'

टेक्निक हुई सस्ती, अब किसानों को मिलेगा फायदा (Technology becomes cheaper giving direct benefit to farmers)
तथावड़े लैब के प्रमुख (Tathawade Laboratory Head) डॉ. विष्णु जावणे (Dr. Vishnu Jawane) के मुताबिक, 'पारंपरिक तरीके से सुधार करने में जहां 20 से 25 साल लग जाते थे, वहीं इस टेक्निक से कुछ ही सालों में कमाल हो जाएगा. सबसे राहत की बात तो ये है कि, जो एम्ब्रियो ट्रांसफर टेक्निक 10 से 15 साल पहले 75 हजार रुपये प्रति एम्ब्रियो पड़ती थी, उसकी लागत अब घटकर 8 हजार रुपये से भी कम रह गई है.
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